सलमान तासीर का क़त्लः कौन ज़िम्मेदार?
सलमान तासीर की हत्या को दुखदायक घटना क़रार देने वाले टीवी ऐंकर और विश्लेषक झूठ बोलते हैं.
उन में से कई दबे दबे शब्दों में खुल यह कह चुके हैं और कई यह लिख चुके हैं कि सलमान तासीर ईश-निंदा पर बयान दे कर ऐसी सीमा पार कर चुके हैं जिस के दूसरी तरफ़ मौत है.
वह मौत क़ादरी के हाथ से आ सकती है, मुहल्ले के किसी मौलवी के हाथों हो सकती है, एक भीड़ के हाथों हो सकती है, किसी जज के क़लम से लिखी जा सकती है.
यह मौत गर्वनर का सुरक्षा कवच तोड़ कर उन तक पहुँच सकती है और जैसा कि पहले हो सकता जेल की किसी कोठरी में भी आ सकती है.
यह सीमा किसी मुस्लिम विद्वान के फ़तवे से नहीं बनी थी न यह जनरल ज़ियाउलहक़ ने बनाई थी न ही सारा दोष धार्मिक गुटों का है.
यह ईमानी रेखा हम सब के दिलों के अंदर खिंची हुई है.
हमें आख़िर अपने देश में दो प्रतिशत से भी कम ग़ैर-मुसलमानों से इतना ख़ौफ़ क्यों आता है?
आख़िर हमें उस महरबान नबी(मोहम्मद) की इज़्ज़त के नाम पर गले काटने का इतना शौक़ क्यों है जिन ख़ुद एक हत्या को समूचे मावनता की हत्या क़रार दिया था.
आख़िर हम रोज़ा रखने से ले कर सूर्यग्रहण के कारण जानने के लिए मुफ़्ती मुनीबुर्रहमान के पास क्यों भागे भागे जाते हैं?
आख़िर हमें किस ने आश्वासन दिया है कि राष्ट्र की बेटी डॉक्टर आफिया को बचाने के लिए राष्ट्र की बेटी आसिया का सर तन से जुदा करना ज़रुरी है?
उस इस्लामाबाद शहर में जहाँ सलमान तासीर की हत्या हुई केवल दो सप्ताह पहले नामूसे रिसालत कॉंफ्रंस में कौन कौन शामिल था. क्या उस में वह लोग शामिल नहीं थे जिन के पार्टी घोषणापत्र में हर शिया, अहमदी, हिंदू, यहूदी की हत्या करने के संकेत नहीं दिए गए.
क्या ऐसे लोग हमारे समाज में, मीडिया में और सरकारी संस्थाओं में शामिल नहीं हैं? क्या ऐसे लोगों के साथ हम शादियों और मेंहदियों में खाना नहीं खाते?
सलमान तासीर ने जो सीमा पार की वह हम सब के अंदर मौजूद है. कभी कभी हम डरते हैं कि हम ने इस सीमा के दूसरी ओर तो क़दम नहीं रख दिया?
हमें अपना ईमान इतना कमज़ोर लगता है कि उस की सलामती के लिए किसी को बलि का बकरा बनाना ज़रूरी है.
और अगर हमारा दिल इतना कमज़ोर है कि हम ख़ुद छुरी नहीं चला सकते तो चलाने वाले की प्रशंसा तो कर सकते हैं.
वह जो अपने आप को लिबरल मुसलमान समझते हैं वह ज़्यादा से ज़्यादा अपनी नाक पकड़ कर मुँह दूसरी तरफ़ फेर लेते हैं.
क्या अल्लामा इक़बाल ने ग़ाज़ी इलमदीन शहीद के जनाज़े पर नहीं फ़रमाया था कि यह अनपढ़ हमसे बाज़ी ले गया?

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काफ़ी उलझन है आपके ब्लॉग में. कोई बड़ा विद्वान या मौलवी ही समझे. आपकी बात आम आदमी की समझ से बाहर है. बातें जलेबी या इमरती की तरह...जैसे कि लीडर लोग...इस प्रकार की बात करते हैं. कोई नतीजा नहीं निकलता. आपको क्या मालूम कि ग़रीबी, भूख किस पेड़ की चिड़िया है.
वाह, क्या नज़रिया है. आपने वही सब लिखा जो एक आम मुसलमान या आम पाकिस्तानी या भारतीय सोचता है.
क्या लिखें. हम सब कुछ समझ रहे हैं और कुछ भी नहीं समझ रहे हैं.
हनीफ़ साहब के बहुत से लेख बीबीसी उर्दू पर पढ़ता हूं लेकिन इस लेख में आपने बीबीसी श्रोताओं को क्या समझाने की कोशिश की है समझ से परे है. कितनी बदनसीबी है कि कुछ फ़ीसदी हिंदू या ईसाई भाई आपके मुल्क में अपने-आप को सुरक्षित नहीं मानते हैं. और सच या हमदर्दी करने पर गवर्नर साहब को जान से हाथ धोना पड़ा है. क्या यही इस्लाम का क़ानून है. इस्लाम के नाम पर आपका मुल्क मज़ाक़ बना हुआ है. हर इंसान को अपने मज़हब में रहने का अधिकार है लेकिन शायद आपके मुल्क में ऐसा नहीं हो रहा है और आपके मुल्क की ग़लती की सज़ा हिंदुस्तान का मुसलमान निर्दोष होकर भी भुगत रहा है लेकिन आपके मुल्क पर जूं तक नहीं रेंगती.
माफ़ कीजिएगा, आप क्या कहना चाह रहे हैं स्पष्ट नहीं हो पाया.
भाई, आप कहना क्या चाहते हैं ये समझ नहीं आता है. सलमान तासीर की हत्या बेमतलब नहीं है. नबी की शान में गुस्ताख़ी का ये अंजाम सही है.
जिस नबी के नाम पर मुसलमान अपना सबकुछ क़ुर्बान कर सकते हैं, उस नबी की तौहीन कैसे बर्दाश्त की जा सकती है. और किसी को क्या हक़ है कि कोई किसी के मज़हब की तौहीन करे या तौहीन ऐ रिसालत करे. और अगर कोई ये गुनाह करता है तो उसे सज़ा तो मिलनी ही चाहिए. ताकि कोई और लोगों के जज़बात से खेलने और क़ानून तोड़ने की हिम्मत न करे. किसी निर्दोष की हत्या सारे मानवता की हत्या है, दोषी की नहीं. "सलमान तासीर ने जो सीमा पार की वह हम सब के अंदर मौजूद है" ये आपकी सोच है.
सज़ा देना इमान के कमज़ोर होने की निशानी नहीं बल्कि इंसाफ़ की निशानी है. ऐसा काम क्यों किया जाए जिससे हमें सज़ा मिले और लोगों के जज़बात कुचले जाएं.
विचार और सभ्यता प्रवाह की तरह है. अफ़सोस कुछ लोग इसे नहीं समझते. पाकिस्तान या पूरा मुस्लिम समाज तेज़ी से एक अंधेरे की तरफ़ बढ़ रहा है. गवर्नर साहब की हत्या निसंदेह हिला देने वाली है. और ये मैं तब कह रहा हूं जब मैं हिंदुस्तान में बैठा हूं. पता नहीं पाकिस्तान में कितना ख़ौफ़नाक मंज़र है. मैं पाकिस्तान की अवाम, मुल्लाओं से निवेदन करता हूं कि वह दूसरे दार्शनिकों को भी पढ़े. इससे उनकी सोच व्यापक होगी. सलमान तासीर के प्रयास उनकी हत्या से वयर्थ नहीं जाएगी.
क़त्ले हुसैन अस्ल में मर्गे-यज़ीद है
इस्लाम ज़िंदा होता है हर करबला के बाद
भीम सिंह जी, इसमें उलझा हुआ कुछ भी नहीं है. मोहम्मद हनीफ़ भी उसी समाज में रहते हैं जहां आप, मैं और सलमान. जब सवाल जान का हो तो स्वभाविक है कि वो भी सीमा पार नहीं करना चाहेंगे. बात तो सीधी है क्या किसी के कुछ कह देने से ईश्वरीय दूत की गरिमा कम हो जाएगी. अगर नहीं तो फिर लड़ाई किस बात की है?
बहुत अच्छा कहा. क्या नुकता निकाला है, हम लोग पहले इंसान फिर हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई हैं.
सुबहान अल्लाह, ठीक कहा है.
ये सब कंफ़्यूज़िंग है! आम आदमी की कुछ समझ में नहीं आने वाला की ये साहब क्या कहना चाहते हैं.
ये बहुत आसान और स्पष्ट भाषा में लिखा हुआ है. मेरे विचार से कोई ग़रीब और भूखा इंसान राजनीतिक हत्या नहीं करता. पाकिस्तान में हिंदू, सिख, ईसाई, अहमदी, बहाई और अन्य ग़ैर मुस्लिम ग़रीब और मजबूर हैं. उन्होंने कड़वा लेकिन सच लिखा है.
ये बयान अपने आपमें बहुत भ्रामक है. क्यों न जनमत संग्रह कर लिया जाए कि लोग इस हत्या के पक्ष में हैं या इसके ख़िलाफ़. मुझे समझ में नहीं आता कि इसे बीबीसी में जगह क्यों मिली.
सलमान तासीर की हत्या केवल यही बताती है कि हम अपने अपने मज़हब को लेकर कितने अंधे हो चुके हैं. न हम किसी बात को मज़हब के ऊपर उठकर एक इंसान के नाते सोचना चाहते हैं और न ही किसी को सोचने देते हैं. और जब भी सलमान तासीर जैसी कोई आवाज़ हमें एक बार सोचने का इशारा देती है तो हम 'शूटिंग द मैसेंजर' के रोल में आ जाते हैं. और दुःख की बात ये है कि ऐसा केवल पाकिस्तान में ही नहीं लगभग पूरी दुनिया बिन बे रोक टोक हो रहा है. और हम इसे होते हुए देख रहे हैं. चुपचाप.
सही फ़रमाया आपने.
मित्र आज हम और आप सरहदों के आर-पार खड़े हैं. विगत 63 सालों ने हमारे बीच सदियों की दूरियां बना दी हैं. मैं जहाँ तक समझता हूँ यह पाकिस्तान जिन्ना और इक़बाल वाला पाकिस्तान तो नहीं है. कट्टरपंथ ने इस देश को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है और इस प्रक्रिया में सबसे ज्यादा मूल्य अगर किसी को चुकाना पड़ा है तो वे हैं वहां के दो फीसदी अल्पसंख्यकों को. पाकिस्तान में उनकी हालत ठीक वैसी ही है जैसी हिटलर के राज में यहूदियों की थी. अंतरराष्ट्रीय समुदाय कब तक मूकदर्शक बना रहेगा खुदा जाने. कहाँ गई हिटलर को विनष्ट करने का दंभ भरनेवाली शक्तियां? कहाँ है संयुक्त राष्ट्र संघ का मानवाधिकार का घोषणापत्र?
आप नबी पर सब कुछ क़ुर्बान करें या न करें ये आपकी आस्था का मामला है. लेकिन आप दूसरों की आस्था, विश्वास, अभिव्यक्तियों को कैसे रोक सकते हैं. धर्म निहायत ही निजी मामला है.
जिसके घर में आग लगाती है , दिल उसी का जलता है. एक पुरानी बात है, जब हम किसी को ज़िंदगी दे नहीं सकते, तो ज़िंदगी छीन लेने का हक़ भी हमको नहीं है, मसलों को समझने समझाने की बजाए अगर गोली से हल निकलता है तो विद्वान लोगों को दिमाग चलाने की क्या ज़रुरत थी? मरने मारने वाली स्थिति पैदा करके कुछ हासिल नहीं होता. पाकिस्तान से ज़्यादा बाहर रह रहे मुसलमान भाइयों के बारे में सोचना चाहिए.
फिरोज़ भाई अगर आप सही हैं तो फ़िदा हुसैन के साथ किस तरह का बर्ताव करना चहिए, आप बताएँ.
ज़िम्मेदार है इस्लाम. इतनी छोटी सी बात को आप क्यों घुमाकर कह रहे हैं आप ही जानें. वैसे सही भी है. आप सीधे कहेंगे तो आपकी भी जान को ख़तरा हो सकता है. वही इस्लाम की पुरानी कहानी है इसके पीछे. जिससे भी मतांतर हो उसे मार डालो. मुसलसान आज भी वैचारिक दृष्टिकोण से सातवीं शताब्दी में हैं. आप सबों को बात घुमाने के बदले अपने आपसे घृणा करनी चाहिए कि आप लोगों ने एक देशभक्त निर्दोष की हत्या कर दी.
आपके ब्लॉग में पाकिस्तान के राजनीतिक हालात पर काफ़ी कुछ दबे शब्दों में कहा गया. यहाँ खुद स्पष्ट बात ना कहना अपने आप में उस देश के हालातों पर एक मुकम्मिल तस्वीर बना देता है. अगर पत्रकारिता को भी चुप अल्फाजों में अपने को बयां करना पड़े तो चुप भी एक मानी बात हो जाएगी. इस्लाम के नाम पर क़त्ल तो आम हो गए हैं. परन्तु कोई मुल्ला इसके ख़िलाफ़ फ़तवा देने से डरता क्यों है?
जनाब लेखक साहब, आपकी बात कुछ अस्पष्ट है. यह आपकी मानसिकता को भी दर्शाता है कि आप किस तरह सोच रहे हैं. सलमान तासीर की मौत के लिए ज़िम्मेदार है वो आदमी जिसने उन्हें मारा और उसकी वो गंदी सोच जिसने उसे उकसाया. सिर्फ़ कट्टर सोच ही इसकी वजह है. आप लोगों को ज़रा मक़बूल फ़िदा हुसैन के बारे में भी लिखना चाहिए जो सरेआम हिंदुओं की इज़्ज़त की धज्जियाँ उड़ाईं और क़तर की सरकार ने उन्हें ईनाम के तौर पर नागरिकता दे दी.
मैं गुंजन से सहमत हूँ. ज़रुर भारतीय मुसलमान कहते हैं कि वो पाकिस्तानियों की तरह नहीं हैं. लेकिन ऐसे मुसलमान हैं कितने. इसी पोस्ट पर देख लीजिए कई लोगों ने हनीफ़ की बात को नकारा है और नबी की शान की बात की है. ये सब पढ़े लिखे लोग हैं. बेहतर होता कि अगर तासीर साहब ने नबी की शान में गुस्ताख़ी की थी तो सज़ा भी नबी पर ही छोड़ दी जाती.
ईश निंदा क़ानून सरासर ग़लत है. इसका अक्सर दुरुपयोग ही होता रहा है. कितने ही बेगुनाह लोग इस क़ानून के तहत मारे जा चुके हैं. सिवाय इस्लाम के और किसी धर्म में ऐसा क़ानून नहीं है. क़ानून और राज कभी धार्मिक लोगों के हाथ में नहीं होना चाहिए. समझदार मुसलमान भाई कितने आहत हैं, कितने परेशान और शर्मिंदा हैं, ये दूसरे मुसलमानों को सोचना चाहिए.
इसमें भारत का क्या लेना- देना? आपने जो कहा, "आपके मुल्क की ग़लती की सज़ा हिंदुस्तान का मुसलमान निर्दोष होकर भी भुगत रहा है" ग़लत है. भारत के बाहर किसी भी इस्लामिक देश में जो घटनाएँ होती हैं उसकी ज़िम्मेदारी यहाँ के मुसलमान पर नहीं है. आप जैसे लोगों की नासमझी से जगह जगह मुसलमानों को सफ़ाई देनी होती है.
कसाई और बकरा दोनों मरेंगे. कोई हमेशा नहीं रहेगा.
गुंजन जी का कहना बिलकुल ग़लत है. सलमान तासीर अपनी हत्या के खुद ज़िम्मेदार हैं. इस्लाम किसी निर्दोष की हत्या का आदेश नहीं देता. और दोषी को सज़ा देना ही इंसाफ़ है. अगर इस्लाम मतांतर वालों को मारने का हुक्म देता तो 1000 साल की हुकूमत के बाद हिंदुस्तान में कोई ग़ैर मुस्लिम शायद न बचा होता. मुसलमानों के विचार अगर सातवीं शताब्दी के हैं तो इससे किसी और को परेशानी क्यों होती है?
सलमान तासीर का क़त्लः कौन ज़िम्मेदार? मेरी समझ से तो ये प्रश्न ही नहीं है. इतना क्यों डरे हुए हैं ब्लॉग लिखते समय. इतना घुमा फिराकर लिखने की ज़रूरत ही नहीं है. इसके जिम्मेदार हैं तंग, संकीर्ण और दकियानूसी मानसिकता वाला समाज. इस समाज को खुली हवा में सांस दिलाने के लिए संघर्षरत लोगों में से सलमान तासीर की शहादत एक और कुर्बानी थी. देखना ये है कि ऐसे कितनी कुर्बानियों के बाद इस समाज की आँख खुलती है. अगर कभी भी इस समाज की आँख खुल सकी तो उस नवीन समाज के नीव की ईंट होंगे सलमान तासीर और तसलीमा नसरीन जैसे लोग. मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ.
सच तो ये है कि ऐसे मज़हबी जुनूनी लोगों को मज़हबी दहशतगर्द कहना चाहिए. ये लोग अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. ख़ुदा जो कि प्रेम और मोहब्बत का नाम है और इंसान के हर पाप और गुनाहों को माफ़ करने वाला है इन लोगों ने आज ख़ुदा को ख़ौफ़ बनाकर लोगों के सामने रखा है. ये किसी भी तरह से माफ़ी के हक़दार नहीं हैं. तासीर साहब ने न तो क़ुरआन की शान में कुछ कहा है न ही अल्लाह की शान में कोई बात कही है और उन्हें ज़रूरत भी क्या है क्योंकि वो ख़ुद मुसलमान हैं. उन्होंने तो ऐसे मुल्ले और मौलवियों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की है जिन्होंने आम मुसलमानों का जीना दोभर कर रखा है और जो आज मुसलमनों को ऐसी अंधेरी गुफा में ढकेल रहे हैं जिसका कोई अंत नहीं. आम मुसलमानों को भी यही सोचना चाहिए कि ऐसे लोग अपने मफ़ाद के लिए कुछ नहीं कर सकें. रही बात ख़ुदा की निंदा करने की तो यही वे लोग हैं जो रोज़ सुबह उठकर ग़ैर मुसलमानों के मज़हब और उनके दीन का मज़ाक़ उड़ाते हैं उन्हें काफ़िर कहते नहीं थकते हैं, अपने धर्म को सच्चा और दूसरे धर्मों को झूठा कहते नहीं थकते और अपने आपको जन्नत का ठेकेदार कहते हैं. ऐसे में तो फिर दूसरे मज़हब के लोगों को इन के ख़िलाफ़ खड़ा हो जाना चाहिए जिन्होंने अल्पसंख्यकों का जीना दोभर कर रखा है.
कराची हो या दिल्ली दोनों पर इस बयान 'सलमान तासीर की हत्या को दुखदायक घटना क़रार देने वाले टीवी ऐंकर और विश्लेषक झूठ बोलते हैं.' कमोबेश दोनों तरफ़ यही हालात हैं, मुद्दे अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन एक बड़ी बाधा 'धर्म' है इसी धर्म ने अधर्म की सारी मान्यताएं गढ़ीं हैं, सब कुछ करने को खुली इज़ाज़त देती है, अगर असल में कोई धार्मिक मानसिकता का आदमी क्या हिम्मत कर पाएगा 'मानव धर्म' के लिए सभी कट्ठ्मुल्लों, पंडितों और पादरियों का गला रेतने की हिम्मत कर सके? सारे विकास के रास्ते इन्ही मानव निर्मित 'धर्मस्थलों' में जाकर विलीन हो जाते है और वहीँ से भुखमरी, भ्रष्टाचार, जातीय विद्वेष, नारी शोषण का मार्ग प्रशस्त होता है. शायद यही भाव 'सलमान तासीर' के मान में भी रही हो!
मैं अख़तर ख़ान का जवाब देना चाहता हूं, जिन्होंने कहा है कि मुसलमानों के शासन काल में किसी का धर्म परिवर्तन नहीं किया गया. भारत में 99 प्रतिशत मुसलमान का हिंदू धर्म से धर्म परिवर्तन हुआ है. ये बात बाबरी मस्जिद के कंवेनर ने कही है. गुरू गोबिंद सिंह ने धर्म परिवर्तन के ख़िलाफ़ युद्ध किया. औरंगज़ेब ने बहुत सारे धर्म परिवर्तन कराए.
ख़ुदा और उसके रसूल के ठेकेदारों को कभी इजाज़त नहीं दी जा सकती कि उनके ही नाम पर उन्हीं के हुक्म की धज्जियाँ उड़ाएं. एक इंसान का ख़ून पूरी इंसानियत का ख़ून है यह ख़ुद क़ुरान और हदीस का ही कथन है. धर्म की ठेकेदारी करने वाले न जाने कब तक इंसानियत का ख़ून इसी तरह बहाते रहेंगे और देशों की कमज़ोर शासन व्यवस्था चुप बैठी रहेगी. लिखने को तो बहुत कुछ मन कर रहा है लेकिन इस जैसे एकाधिकार प्राप्त विषय पर लिखने के लिए हिम्मत जवाब दे जाती है कि कहीं इससे आफ़त न फट पड़े. ख़ुदा ख़ैर करे और मेरी यही दुआ है कि इन सिरफिरों को हिदायत बख़शे. आप सबको इसपर सुम्मा आमीन का नारा बुलंद करना चाहिए.
आप क्या कह रहे हैं साफ़ साफ़ पता नहीं चल पा रहा है.
पहले मैं सोचता था कि पहले पाकिस्तान ख़त्म होगा फिर पाकिस्तान के लोग, लेकिन अब लगता है पहले पाकिस्तान के लोग ख़त्म होंगे उसके बाद पाकिस्तान. आप समझ सकते हैं.
अतहर ख़ान जैसे लोगों को मदरसे से बाहर जाना चाहिए. सलमान तासीर की हत्या इस्लामी कट्टरपंथ की मिसाल है.
मुझे अतहर ख़ान की टिप्पणी पर आपत्ति है. शायद वह इतिहास भूल गए हैं. भारत में हिंदू इसलिए नहीं बचे क्योंकि मुस्लिम हुकूमत ने उन्हें नहीं मारा. हिंदू समाज हज़ार साल लड़ा है. सब जानते हैं कितने उदारवादी थे मुस्लिम शासक. लेकिन आप शायद अभी भी मुग़ल काल में रहते हैं. आप तुलना कीजिए अपनी और पाकिस्तान के हिंदुओं की, सोचिए कहां अल्पसंख्यक खुल कर जी रहे हैं. जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, पाकिस्तान ने नीव भेद-भाव पर ही डाली थी. तो पाकिस्तान में लोग कैसे सदभाव के साथ रह सकते हैं. मैं यह नहीं कहता कि सब पाकिस्तानी कट्टरपंथी हैं, पर जो उदारवादी हैं वो अपना मुंह नहीं खोल सकते.
मोहम्मद अतहर ख़ान जी, सबसे पहली बात कि अगर सलमान तासीर ने आत्महत्या नहीं की तो वे अपनी हत्या के खुद ज़िम्मेदार नही हैं. सलमान तासीर भारत के विरोधी और एक राष्ट्रभक्त थे. अगर वो किसी बात के दोषी थे तो पूरा पाकिस्तान किसी ना किसी बात का दोषी है. वैसे उनकी सज़ा का फ़ैसला भी क्या आपके जैसे करेंगे? और वो भी बंदूक़ उठाकर. किसने दिया आपको ये अधिकार? इस्लाम मतांतर वालों को मारने का हुक्म ही देता है. आप इतिहास देखें. 600 सालों की हुकूमत के बाद हिंदुस्तान में ग़ैर मुस्लिम बचे हैं क्योंकि अकबर जैसे कुछ शासक हुए जिन्होंने आपके हिसाब से इस्लाम के अनुसार काम नहीं किया. वरना औरंगज़ेब जैसों ने तो एक भी मंदिर नहीं छोड़ा. नालन्दा जैसे ज्ञानकेन्द्रों को जलाने की और क्या वजह देंगे आप? मुसलमानों के विचार सातवीं शताब्दी में होने से सलमान तासीर जैसे हर दिन मार दिए जा रहे हैं. चाहे वो किसी भी धर्म के हों हम सभी को दुख होता है. आप हत्याएं करने के बदले जिस दिन सभ्य मानवों की तरह बहस करने लगेंगे और देश एवम् मानवता के क़ानून मानने लगेंगे, हमें कोई परेशानी नहीं होगी.
अतहर जी, आपने कहा दोषी को सज़ा देना इन्साफ़ है, और दोषी कौन है, ये निर्धारित करते है कुछ आप जैसे दक़ियानूसी लोग और कुछ मौलवी, जो कि जानते हैं कि धर्म को कैसे अपने अनुसार तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाए. इस दुनिया में ऐसे कितने मुसलमान और कितने ही मौलवी भी होंगे जो ये स्वीकार करते होंगे कि सलमान तासीर जी दोषी नहीं हैं. उनका क्या? मेरे अनुसार कोई भी धर्म निर्दोष को मारने की इजाज़त नहीं देता. और किसी भी धर्म का भगवान् इतना कमज़ोर नहीं है कि अपने अपमान का बदला लेने के लिए बन्दों का मुंह देखता है. उसे सही ग़लत का अनुमान है और वह ख़ुद सज़ा देने के लिए सक्षम है. तुम कौन होते हो उनको इन्साफ़ दिलाने वाले. मैं गुंजन जी से भी असहमत हूँ कि किसी एक आदमी की कारिस्तानी को सारे समाज या मुल्क से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. और हाँ अतहर जी अगर किसी भी समाज की मानसिकता पिछाड़ी हुई है तो इससे सबको फ़र्क़ पड़ता है. फ़र्क़ पड़ता है समाज में रहने वाले लोगों को, आपके घर में रहने वाली औरतों, बच्चे, बच्चियों, निर्दोष और दूसरों का दर्द समझने वाले लोगों को. चाहे वो किसी देश, जाति या धर्म के हों.
शुक्रिया, ये कड़वा सच लिखने के लिए.
हनीफ़ साहब, आप सीधे से क्युँ नहीं कह पा रहे हो कि तासिर साहब के क़त्ल के लिए कौन ज़िम्मेदार है? आपने जिस टेढ़ी तरहसे पूरे ब्लागमें बात कही है उससे कोइ भी पालिटिशियन अपने आपको एलीमेन्टरी स्कूलका बच्चा महसूस करेगा. बात साफ़ है: क़ायदे-आज़म का पाकिस्तान मर चुका है. तासिर साहब जैसे उनके फ़लसफ़े के तलबगारों को इंसानियत को ज़िंदा रखने के बारे में सही बात कहने पर मार डाला जाता है. हनीफ़ साहब जैसे प्रॉमिनेन्ट ब्लागर की ज़िम्मेवारी बनती है कि अवाम तक क़ायदे-आज़म का धर्मनिर्पेक्षता का पैग़ाम पहुंचाएं. अगर अख़बार-नवीस की हैसियत निभाने की ताक़त नहीं है तो लिखना बंद कर देना चाहिए.
आज पाकिस्तान में जो कुछ हो रहा है समझ से परे है! इतना ज़रूर समझ में आ रहा है कि काँटों भरे रास्तों की नींव त्यार की जा रही है! मंज़िल कब आएगी यह तो सब करने वालों को भी पता न होगा?
पाकिस्तानी फ़ौज, समाज, जनता, और पाकिस्तानी सोच.
अतहर ख़ान जी की टिप्पणी शायद भारी पड़ी है. वैसे अगर आप इतिहास को ठीक से पढ़ें तो आपको पता लगेगा कि औरंगज़ेब को कटघरे में खड़ा करने का श्रेय अंग्रेज़ों को जाता है क्योंकि उसने अंग्रेज़ों की एक नहीं चलने दी थी. औरंगज़ेब के शासनकाल को आज के मूल्यों पर तो आंका नहीं जा सकता बल्कि एक निरंकुश राजतंत्र के आधार पर ही देखा जा सकता है. और रही बात बोलने की आज़ादी की तो जब हम महात्मा गांधी के ख़िलाफ़ कुछ बर्दाश्त नहीं कर सकते तो किसी और से दूसरी तरह की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. पाकिस्तान में मुशर्रफ़ के मुंह पर लोग उसे झूठा, देश द्रोही कहते हैं, क्या हमारे यहां ऐसा हो सकता है. बिनायक सेन को ही लें. हमारे यहां हर चीज़ को जायज़ ठहरा कर मीठे तरीक़े से मारा जाता है. हमरा समाज बड़ा महान है जिसका कहना है कि जो मीठे से मर रहा हो उसे ज़हर क्या देना. जय हो.
मैंने ये नहीं कहा कि किसी का धर्मं परिवर्तन नहीं हुआ, यह सही है कि भारत के अधिकांश मुस्लिम, हिंदू से मुस्लिम बने हैं, लेकिन इनके साथ ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं हुई बल्कि इन लोगों ने अपनी मर्ज़ी से इस्लाम क़ुबूल किया. क्योंकि इस्लाम धर्म के मामले में ज़ोर ज़बरदस्ती की अनुमति नहीं देता. और ये बात मैं इस लिए कह सकता हूँ, कि अपनी मर्ज़ी से इस्लाम क़ुबूल करने वालों में हमारे मोरिस-ए-आला भी थे.
सचिन जी, भारत में आज मुसलमानों की स्थिति अनुसूचित जाति से भी बदतर है, ये मैं नहीं बल्कि तमाम कमेटियाँ और रिपोर्टें कह रही हैं. 20 % मुसलमानों की सरकारी नौकरी में हिस्सेदारी 3 %, सेना में 2.5 % और व्यापार में 2 % है. न मुसलमान सुरक्षित हैं और न उनके धर्म स्थल, क्या यही खुलकर जीना है?
दिनेश/गुंजन जी, दोषी कौन है? ये देश का क़ानून निर्धारित करता है, ईशनिंदा करने वाले पाकिस्तान के क़ानून की नज़रों में दोषी हैं और वही क़ानून उन्हें सज़ा देता है. अगर कोई किसी धर्म स्थल पर जाकर मूर्तियां तोड़ दे तो क्या उसे कोई सज़ा नहीं मिलेगी, और भागवान के भरोसे छोड़ दिया जायेगा? कि अपने अपमान का बदला भागवान खुद लेंगे. पिछड़ी मानसिकता आख़िर है क्या? पश्चिमी मानसिकता के बिना भी अपने संस्कारों का पालन करते हुए प्रगति की जा सकती है.
सुल्तान औरंगजेब एक न्यायप्रिय शाषक थे, लोगों ने उनकी छवि को ख़राब कर दिया है. भारत में हज़ार साल की इस्लामिक हुकूमत के बावजूद सारे ऐतिहासिक मंदिर सुरक्षित हैं. आप जानते होंगे कि सनातन, यहूदी, पारसी और ईसाई आदि धर्मो के बाद इस्लाम ही सबसे नया धर्मं है और नए विचार है. इन्ही विचारों ने भारत को एक राष्ट्र बनाया, पहले भारत छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था. सरहदों पर लड़ाइयां ज़रूर हुईं लेकिन इस्लामी हुकूमत में हर धर्मं के लोग सुख चैन से रह रहे थे. कभी भी बग़ावत नहीं हुई. भारत सोने की चिड़िया कहलाया. देश का सबसे ज़्यादा विकास इसी समय हुआ.
भाई हनीफ़ साहब, आपका यह ब्लॉग कुछ साफ़ तो नहीं करता...क्या कहना चाहते हैं पर अगर मैं भारत में हूँ तो मुझे भारतीयों की भावनाओं की क़दर करनी चाहिए. जो चीज़ उन्हें बुरी लगती है वह नहीं करनी चाहिए. अब कोई मोहम्मद साहब के बारे में ग़लत बोले तो कोई मुसलमान कैसे बर्दाश्त करेगा. लेकिन आप काफ़ी मॉडर्न लगते हैं इसलिए यह बात आप नहीं समझेंगे.
गुंजन सौ प्रतिशत सही हैं. लेकिन सातवीं शताब्दी में रह रहे कट्टरपंथियों को यह बात समझने में 1350 साल और लगेंगे.
अतहर भाई आप सही कह रहे हैं. लेकिन ये बात इनके कानों और आंखों तक नहीं पहुंच सकती क्योंकि इनके सोचने और समझने की ताक़त सिर्फ़ बुराई है अच्छाई नहीं. इसलिए इनको आपकी बातें नहीं समझ आ रही हैं.
पाकिस्तान की बुनियाद ही इस्लाम के उसूलों के ख़िलाफ़ पड़ी थी. इस्लाम लोगों की हिदायत के लिए आया है हलाकत के लिए नहीं. सलमान तासीर ग़लत था या सही यह सवाल वैसा ही है कि जॉर्ज बुश सही था या नहीं. सही-ग़लत का फ़ैसला न हनीफ़ साहब कर पा रहे हैं न ही दुनिया के लोग.
क़सम से क्या कह दिया...एकदम हक़ीक़त.
मोहम्मद हनीफ़ साहब तो लिखते समय भटक गए पर बहस को सही दिशा मिल गई.
गुंजन साहब, राजीव रंजन भाई (अभिव्यक्तियों को कैसे रोक सकते हैं : राजीव रंजन ) यदि आप की बात सही है तो कृपया आप बताएँगे के आज मकबूल फ़िदा हुसैन देश के बाहर निर्वासित जीवन क्यों जी रहे है. मेरे को तो आप के मत पर एक बात याद आती है, ''हमारा खून खून और तुम्हारा खून पानी". देवी-देवताओं की बात तो छोड़े हम महात्मा गांधी की आलोचना करने और सुनने का साहस नहीं रखते है. रही बात अतहर भाई की तो 100 फ़ीसदी सही बात लिखी है. सूरज को आइना दिखाने के चक्कर में जो लोग अपनी आँख गवां देते है सलमान तासीर भी उनमे से ही एक है. रही बात सातवीं सदी की तो आज उसी निजाम पर दुनिया के 70 के करीब देशों में शासन चल रहा है और उन देशों में जाने का हर किसी का सपना होता है, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और खाड़ी देशों की व्यवस्था और निजाम की दुनिया कायल है और जो पांच हज़ार साल पुरानी सभ्यता का दावा कर रहे है वो पता करे कि उनका निजाम कैसा है और कहा पर चल रहा है. आज भी दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाला धर्म इस्लाम ही है और खास कर विकसित देशों में, तो क्या वो वापस सातवीं सदी की और जा रहे है. अगर औरंगजेब जैसा नैतिक स्तर हमारे आज के नेताओं का भी हो जाए तो देश में किसी भी तरह की परेशानी नहीं होगी.
क्या पैग़ंबर साहब का कोई अपमान कर सकता है? वह मान-सम्मान से बहुत ऊपर हैं और उनके नाम से ही लोग एक दूसरे को माफ़ कर देते हैं.