नव दशक की शुभकामनाएँ!
दूसरी सहस्राब्दी के दूसरे दशक की शुरुआत आप सबको मुबारक हो!
अब से दस वर्ष पूर्व हम सब एक इतिहास का हिस्सा बने. हमें वह श्रेय हासिल हुआ जो हमारे पूर्वजों और हमारी आने वाली कई नस्लों को नहीं मिलेगा. यानी एक सहस्राब्दी से निकल कर दूसरी सहस्राब्दी में प्रवेश.
आगे आने वाली पीढ़ियाँ शायद हमारा नाम न जान पाएँ लेकिन हम यदि वर्ष 2000 से पहले जन्मे हैं तो हमारा शुमार उन लोगों में ज़रूर है जो विलक्षण हैं, यानी इतिहास बदलता देख चुके हैं.
यह वरदान था. लेकिन इसके साथ आईं ज़िम्मेदारियाँ. हम कैसी दुनिया का निर्माण कर रहे हैं.
क्या हम अगली नस्ल को एक ऐसे विश्व की धरोहर दे कर जाएँगे जहाँ हिंसा न हो, जातीय और नस्ली भेदभाव न हों, बीमारियाँ न हों और न ही हो विद्वेष और बदले की भावना.
आप कहेंगे यह हमारा काम नहीं है और न ही हमारे बस में है.
मेरा कहना है यदि हममें से हर एक अपने आसपास का माहौल सुधार सके, अपने परिवार में यह बीज बो सके जो आगे चल कर एक फलदायक पेड़ का रूप ले ले तो यह काम कोई मुश्किल नहीं है.
बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के माध्यम से मेरी आपसे अपील है कि आज एक संकल्प कीजिए.
दूसरी सहस्राब्दी का दूसरा दशक आप संवारेंगे. जहाँ तक हो सकेगा इसमें हाथ बंटाएँगे. अपने को कमतर नहीं समझेंगे और इस बात को पहचानेंगे कि यह देश, यह दुनिया आपकी है और आप इसे रहने लायक़ बनाने की क्षमता रखते हैं.
क्या आप वह दिन ला पाएँगे जब हमारी नई पीढ़ियाँ पूछें कि बेईमानी, भ्रष्टाचार, रिश्वतख़ोरी, झूठ, लालच और धोखाधड़ी किस चिड़िया का नाम है?
आप वह दिन ला सकते हैं. आप बहुत कुछ कर सकते हैं!

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
जहाँ तक मुझे याद है महात्मा बुद्ध से प्रेरित हो कर सम्राट अशोक ने इस तरह का कुछ प्रयास किया था जो उसके मरणोपरांत कुछ साल तक समझ में सकारात्मकता बनाए भी रख सका था.
यह बात बिलकुल सही है कि हम बदलाव के दौर से गुज़र रहे हैं. लेकिन उम्मीद ही नहीं बल्कि विश्वास है कि यह दुनिया रहने के लिए बेहतर जगह बनेगी.
सलमा जी आपकी सोच और विचार तो बहुत सही हैं लेकिन आप ऐसा करने को कह रही हैं जो इंसान सपने में ही कर सकता है. मालिक जानता है कि आगे की नस्लें इस दुनिया में कैसे ज़िंदा रह पाएँगी. आपके पास तो साधन है लिखने के लिए इसलिए आपने विचार लिख दिए अपने. लेकिन उन ग़रीबों का क्या जिनको पूरे दिन में एक बार भी भरपेट खाना नहीं मिलता. यह दुनिया दलदल में जा रही है. इसे कोई भी नहीं बचा सकता है सिवाय मालक के. और मालिक को हम भूल गए हैं इसलिए यह सब कुछ देखना पड़ रहा है. आपके विचार सिर्फ़ ख़याली पुलाव के अलावा और कुछ नहीं हैं.
सपने देखना कोई ग़लत बात नहीं है पर अफ़सोस होता है...विकीलीक्स के पत्रकार को सताना, सकारात्मक नहीं कहा जा सकता. दुनिया का लुटेरा थानेदार बन गया है. ग्रीन हाउस गैस पर किसी की बात सुनता ही नहीं है. ख़ुद डिक्टेटर जैसी आदत है ग़रीब लोगों को डेमोक्रेसी बताता है. यह तो कुछ बड़ी बात नहीं. ग़रीब देश के लोगों के संसाधन छीन लेता है और ऊपर से उनको भिक्षा देता है. मीडिया के लोग भी उसीकी जयजय करते हैं. या डरते हैं. इन परिस्थितियों में आप किसे बेहतर दुनिया का ख़्वाब दिखा रही हैं, सुना रही हैं. चिराग़ तले अंधेरा है. उम्मीद की कोई किरण नहीं है.
सकारात्मक रवैया रखना और कुछ अच्छे सपने देखना अच्छा है लेकिन हमें ग़रीबों के उत्थान, आंतरिक सुरक्षा, सुशासन और जनतांत्रिक व्यवस्था को मज़बूत करने के लिए और अधिक कोशिश करनी होगी. हमारे नेताओं के सामने बड़ी समस्या भ्रष्टाचार से निमटने की है. इस बारे में मैं चीनी सरकार की नीति से सहमत हूं. कॉमनवेल्थ, 2-जी और इसी प्रकार कई बड़े घोटाले यह दिखाते हैं कि हम विकसित देश हो सकते हैं. इसलिए भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ काग़ज़ी के बजाए सख़्त कार्रवाई की ज़रूरत है.
ये सच है कि बहुत कुछ बदल चुका है. लोग बदले हैं, उनकी सोच बदली है. बहुत तरक़्क़ी की है हमने, लेकिन इंसानियत नाम की चीज़ खोती जा रही है. हम सिमट कर रहने लगे हैं, किसी से कोई वास्ता नहीं रखना चाहते हैं और यह है मुख्य बदलाव.
21वीं सदी- उज्जवल भविष्य. ये ऐसा नारा है जिसे पिछली सदी में ही महाविचारक पंडित सीताराम शर्मा आचार्य जी ने कहा था. आज नहीं तो कल अवश्य वह दिन आएगा जब यह दुनिया भ्रष्टाचार, जातीय भेद-भाव, ऊँच-नीच की समस्या से मुक्त होगी.
सलमा जी, वैसे तो हर कोई हर साल कुछ नए प्रण अवश्य लेता है. भले ही वह
ए. राजा जैसा ही क्यो न हो. इसलिए हमें भष्टाचार को जड़ से ख़त्म करने का प्रण
करना चाहिए. आपकी इस अपील को ध्यान में रखते हुए मैंने भी एक प्रण लिया है
देखना है, मैं इसे कितना निभा पाता हूं. मैं इसे बताऊँगा तो नहीं क्योकि संकल्प
टूटने के बाद ग्लानि होती है.
सलमा जी, आपने बिलकुल सच कहा आज से हम हिंसा और भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेकेंगे, इशांल्लाह...
सलमाजी भारतीय लोकतंत्र इन दिनों उलटबासी का शिकार है.जिस जनता के हाथों में सबकुछ है वही सबसे ज्यादा लाचार है. सचमुच हम चाहें तो क्या नहीं कर सकते?आपने उसी तरह हमें हमारी शक्ति की याद दिलाने का प्रयास किया है जैसे समुद्र लांघने से पहले अनमनस्क की तरह कोने में बैठे हनुमान को जाम्बवंत ने किया था.धन्यवाद् और पूरी बीबीसी टीम को नववर्ष की ढेर सारी शुभकामनायें.
सलमा जी ईमानदारी से देखा जाय तो जिस मुद्दे को आपने उठाया है वह मुद्दा जितना जमीनी है, उतना ही मुश्किल भी. मैं आपको विश्वास के साथ यह बताने का यत्न कर रहा हूँ की गत दशक में इन मूल्यों में/की जितनी गिरावट आयी है वह संभवतः इस सदी का महत्त्व पूर्ण अभिलेख / रिकार्ड बने जैसे हर युग का एक इतिहास बनता है वैसे ही यह दौर जितनी बातें आपने गिनाई है का रेकोर्ड बनने जा रहा हैं. क्योंकि आपकी चिंता सहज नहीं है कहीं न कहीं आपको भी इनकी आंच जरुर आयी होगी आपके बगल में बैठा हुआ आपको/आपकी कितनी बुराईयाँ ढूंढ़ रहा है जबकि आपकी अच्छाईयाँ उसके गले से नीचे जा ही नहीं रही है. इनका क्या होगा ! मुझे याद आ रहा है मेरे गाँव में एक पंडित जी हुआ करते थे और बहुत सारी 'कहावतें' सुनाते थे जिनमे 'नैतिकता,चरित्र,नियति,इमान आदि को वो रेखांकित करती थीं' आश्चर्य और धैर्य सहज समझ आ जाता था, पर आज घर घर में विज्ञान के प्रवेश ने जहाँ हमें 'भूमंडलीक्रित' किया है वहीँ उस पर परोसे जा रहे अधिकतर 'कु-संस्कार' युक्त 'प्रोग्राम' ज्यादा असर डाल रहे हैं और संस्कारित कार्यक्रम कम. मिडिया के इन माध्यमों का विस्तार कभी भी संस्कारित प्रोग्राम की लोकप्रियता बढ़ाने पर शोध नहीं कराता, बल्कि उनके नियंत्रण के लिए जिन्हें भी जिम्मेदारी सौपता है वही गैर जिम्मेदार हो जाते हैं. काश इनको समझ आती की क्या वह वो दिन ला पाएँगे जब हमारी नई पीढ़ियाँ पूछें कि बेईमानी, भ्रष्टाचार, रिश्वतख़ोरी, झूठ, लालच और धोखाधड़ी किस चिड़िया का नाम है? और शायद नहीं क्योंकि अधिकांश की जड़ें तो बेईमानी, भ्रष्टाचार, रिश्वतख़ोरी, झूठ, लालच और धोखाधड़ी में ही गहरे तक धसीं हुयी हैं ?
सलमा जी नववर्ष व दूसरी सहस्राब्दी दूसरे दशक के आगमन पर बी. बी. सी. हिन्दी परिवार को भी शुभ मंगल कामनाएं ! मेरा यह मानना है कि आधे से ज्यादा समस्याएं हमारी सकारात्मक सोच रखने से खत्म हो सकती हैं ! इस वक्त पूरे विश्व में बेईमानी, भ्रष्टाचार, रिश्वतख़ोरी, झूठ, लालच और धोखाधड़ी पूरे उफान पर है ! लेकिन जिस प्रकार से महासागर में आने वाले उफान ,वापस समुन्द्र में समाजाते है और शिखर पर विजय पाने वाले भी वापस नीचे आते हैं उसी तरह आने वाले समय में ईमानदारी ,सच्चाई और भाईचारे का उदगम आवश्य होने वाला है ! कुदरत अपने हर रंग को ,हर नज़ारे व् विधाओं को संतुलित कर के चलती है ! ये बात भी सच्च है कि आज इंसान कुदरत पर विजय पाने का दुस्साहस कर रहा है और परिणाम भी भुगत रहा है ! मेरे ख्याल से अब पूर्ण उफान के बाद शान्ति का आभास होता दिखाई देता है ! और हम मानव जाति को भी सकारत्मक कदम तो उठाने ही चाहिए ! सारे संसार में शान्ति व भाईचारा हो ऐसी कामना है ! बाकी मैं खुद को बदलूँ यह वादा कर सकता हूँ ! तभी तो अपने आस पास के माहौल को बदल पाउँगा ! हम जिस देश का खाते हैं उसकी बुराई में घंटों बिता देते हैं ! इस दौड़ में मैं भी शामिल हूँ ! कोशिश होगी कि इस बुराई से छुटकारा मिले !
कैसी बदली हुई हक़ीक़त है
कैसा बदला हुआ ज़माना है
जिनको होना था जेल-ख़ाने में
उनके हाथों में जेल-ख़ाना है.
नव वर्ष की शुभकामनाएं.
मेरी बेटी बड़ी होकर पूछेगी: पापा आपने शायद सुना या देखा होगा ये "ईमानदारी" किस चिड़िया का नाम था?
मेरा जवाब: हां बेटा हमने इसे पिछली सदी में मरती हुई हालत में देखा था, धीरे धीरे कब उसके प्राण निकल गए पता ही नहीं चला. इसीलिए ईमानदारी नाम की चिड़िया की कोई पुण्यतिथि नहीं है. हां ये सच है कि वह मर चुकी है.
पापा आप लोगों ने उसे बचाया नहीं?
नहीं बेटा हम सब उसके पर नोच नोच कर या तो खा रहे थे या उसे बेचकर पैसा बना रहे थे.
मैं पिछले 25 साल से बीबीसी को सुन रहा हूं और आपके ब्लाग मे मु्झे बहुत प्रभावित किया. हमें हमेशा कोशिश करनी चाहिए कि हम अपनी परंपराओं और संस्कारों को बचा कर रखें. ताकि हमारा आने वाली पीढ़िया हमसे ये सवाल न पूछें कि ईमानदारी किया चीज़ होती है और वो कहां मिलती. किसी भी एक व्यक्ति की सफलता दूसरे के नुकसान से न जुड़ी हो. हमारे आध्यात्मिक गुरु पूरी कोशिश कर रहे हैं कि ऐसा न हो. उम्मीद है कि यह मुमकिन होगा.
लेख पर साधुवाद. बीबीसी परिवार को मेरी ओर से नववर्ष 2011 की बहुत शुभकामनाएं.
कौन कहता है कि आसमाँ में छेद नहीं हो सकता...एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो...
सलमा जी कथनी और करनी में फर्क नहीं होना चाहिए. सकारात्मक लिखना और सोचना लेकिन व्यवहार में फ़र्क ? प्रेमचंद के साहित्य में ये धूर्तता कहलाती है. अखबार, वेबसाइट और रेडियो को सुनकर जो छवि उभरती है उसके मुताबिक दुनिया में थानेदार बनने वाली मीडिया खुद शोषण का प्रतीक बन गई है.
सच कहा आपने सलमा जी, वो सुनहरा दिन हम नहीं लाएंगे तो कौन लाएगा. बहुत बहुत धन्यवाद आपका. एक त्रुटि की तरफ आपका ध्यान खींचना चाहूँगा और वो ये की यह तीसरी सहस्राब्दी है न की दूसरी.
सलमा जी, नव वर्ष आपको भी मुबारक हो और नए साल पर ब्लॉग लिखने पर धन्यवाद. आपने सही लिखा है कि आप वह दिन ला सकते हैं, आप बहुत कुछ कर सकते हैं. ये बात एक बार बीबीसी पर योगेंद्र यादव जी ने भी श्रोताओं के सवाल पर कही थी. सभी क़ायदे क़ानून जनता की सुविधा के लिए बनाते हैं और कुछ ग़लत है तो उसका मुक़ाबला डटकर करना चाहिए क्योंकि कोई जनता से ऊपर नहीं है.