पाकिस्तान की वो सड़क जहां सिकंदर की सेना के 15 हज़ार जवानों की मौत हुई थी

इमेज स्रोत, Muhammad Owais Khan
- Author, साइमन उरविन
- पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
विश्व विजेता कहलाने वाले सिकंदर की सेना एक समय में जिस रास्ते के ज़रिये भारत से लौटी थी, आज उसी रास्ते पर बने मकरान समुद्रतटीय राजमार्ग को दक्षिण एशिया के सबसे सुंदर और दिलकश रास्तों में एक माना जाता है.
मध्य कराची से तीस किलोमीटर पश्चिम में, बलूचिस्तान प्रांत की सीमा पर, पाकिस्तान के आतंकवाद विरोधी दस्ते के जवान मेरा इंतज़ार कर रहे थे. हाथों में एके-47 लिए वे मेरी कार तक आए और मेरा पासपोर्ट और अनापत्ति प्रमाण पत्र जांचा.
यह प्रमाण पत्र एक तरह का परमिट होता है जिसके बाद कोई विदेशी, पाकिस्तान के संवेदनशील इलाकों की यात्रा कर सकता है. जब वे अपनी जांच से संतुष्ट हो गए तब मैं अपने गाइड और आंतकवाद विरोधी दस्ते के सदस्यों के साथ काफ़िले में मकरान की ओर रवाना हुआ, जहां से ईरान की सीमा तक मुझे सड़क यात्रा करनी थी.
मेरे गाइड आमिर अकरम ने कहा, "दशकों से, मकरान या कहें कि वास्तव में पूरा बलूचिस्तान, न केवल पश्चिमी लोगों के लिए बल्कि प्रांत के बाहर के पाकिस्तानियों से भी कटा हुआ था."
कराची के विशाल उपनगरीय इलाकों से निकलते हुए जब पेड़-पौधों की संख्या बढ़ने लगी तो अकरम ने बताया, "यहां होने वाले अलगाववादी आंदोलनों और इस्लामिक चरमपंथियों की सक्रियता के चलते मैं तो पहले इधर आने की हिम्मत भी नहीं कर सकता था. लेकिन आजकल बलूचिस्तान सेना के नियंत्रण में है और हम सुरक्षित हैं. लेकिन इन इलाके में सुरक्षा विवरण की जानकारी के साथ चलने की मानक प्रक्रिया अपनानी होती है. मकरान के समुद्री तट को देखने का यही एक विकल्प मौजूद है और मैं आपको पाकिस्तान के सबसे सुंदर और सांस्कृतिक तौर पर समृद्ध क्षेत्र की विशेषता दिखाऊंगा."

इमेज स्रोत, Muhammad Owais Khan/Getty Images
दक्षिण एशिया की सबसे रोमांचक यात्रा
हालांकि, अकरम ने यह भी बताया कि इस इलाके की यात्रा की व्यवस्था करना अभी भी एक जटिल प्रक्रिया है.
हम लोग राष्ट्रीय राजमार्ग 10 पर बढ़ रहे थे, जिसे आमतौर पर मकरान समुद्रतटीय राजमार्ग के रूप में जाना जाता है. बलूचिस्तान के दक्षिणी हिस्से में मौजूद यह राजमार्ग करीब 584 किलोमीटर लंबा है जो ईरान के साथ सीमा पर समाप्त होता है. इस राजमार्ग से यात्रा को दक्षिण एशिया की सबसे नाटकीय यात्रा भी माना जाता है, इसका अधिकांश हिस्सा अरब सागर के तटों से गुजरता है. इसके नीले आसमानी और चमचमाते पानी में ढेरों नाव दिखाई देती हैं जो ईल, सार्डिन एवं झींगा जैसी छोटी-बड़ी मछलियों और केकड़े की तलाश में हैं.
अकरम ने मुझे बताया, "मछली पकड़ना सदियों से मकरान की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार रहा है. यहां तक कि मकरान नाम ही 'मछली खाने वालों' के लिए फारसी शब्द के अपभ्रंश से निकला है. आज भी यह उतना ही महत्वपूर्ण है, लेकिन स्थानीय लोग दूसरे काम धंधों में भी शामिल हैं जैसे समुद्री जहाज से जुड़े काम धंधे और तस्करी."
कराची से लगभग 200 किमी दूर हम राजमार्ग पर अपने पहले मुख्य ठिकाने पर पहुंचे, यह पाकिस्तान के सबसे बड़े पार्क यानी हिंगोल नेशनल पार्क का ही ऊबड़-खाबड़ विस्तार है, जहां की ख़ासियत मकरान की तेज़ समुद्री हवाएं, भट्टी जैसी झुलसाने वाली गर्मी और कभी-कभार आने वाले समुद्री तूफ़ान हैं.
पार्क की परिधि के ठीक अंदर मौजूद उतार चढ़ाव भरे रास्ते से हम एक दुर्लभ जगह पहुंचे. दरअसल यहां एक ही जगह दो ज्वालामुखी मौजूद हैं जिनसे लावा के बजाए कीचड़ निकलता है. यह भूवैज्ञानिक नज़रिए से बेहद दुर्लभ ज्वालामुखी हैं.

इमेज स्रोत, Simon Urwin
हिंदू धर्म का पवित्र स्थल
हर साल, तीर्थयात्रियों का एक दल आध्यात्मिक खोज की तलाश में ज्वालामुखी के शिखर पर चढ़ता है, इसे हिंदू धर्म में सबसे पवित्र माना जाता है.
अकरम ने बताया, "माता हिंगलाज यात्रा के लिए पूरे बलूचिस्तान और सिंध प्रांतों से दसियों हज़ार लोग आते हैं. वे मोमबत्तियां जलाते हैं और नारियल को गड्ढे में फेंकते हैं, अपने पापों के बारे में ज़ोर ज़ोर से बताते हैं और हिंगोल नदी में नहाने से पहले माफ़ी की प्रार्थना करते हैं. सक्षम और शारीरिक तौर पर चुस्त दुरुस्त लोग हिंगलाज माता के मंदिर तक जाते हैं. इस यात्रा को जीवन में अच्छे कामों के लिए प्रेरित करने के साथ साथ आत्मा की शुद्धि वाला माना जाता है."
हमने एक शांत और अंधेरे वाले घाटी की गहराई में जाने के रास्ते का अनुसरण किया. वहां एक चट्टानी छत के नीचे हमारी मुलाकात महाराज गोपाल नाम के एक बुज़ुर्ग सज्जन से हुई, जो एक एकदम सुसज्जित कांच के बक्से जैसे दिखने वाले हिंगलाज माता मंदिर की पहरेदारी कर रहे थे.

इमेज स्रोत, Simon Urwin
उन्होंने हमें मंदिर की कहानी सुनाने से पहले बैठने को कहा.
गोपाल ने बताया, "पहले युग यानी सतयुग (मानव जाति के पहले युग) में लाखों साल पहले जब देवी सती की मृत्यु हो गई थी तब देवता विष्णु ने उनके शरीर को 51 हिस्सों में काट दिया था."
"यह सभी टुकड़े पृथ्वी पर गिरे थे और ज़्यादातर हिस्सा भारत में ही गिरा था. उनके सिर का एक हिस्सा यहां मकरान में गिरा था. इन सभी स्थलों को शक्ति पीठ के रूप में जाना जाता है - ऐसा पवित्र स्थान जहां हिंदू देवी की पूजा करने के लिए यात्रा करते हैं और यह दुनिया के अंत होने तक जारी रहेगा."
निराशा भरे स्वर में गोपाल ने कहा, "वह दिन दूर नहीं है. जल्दी आने वाला है. अभी हम चौथे और अंतिम युग में हैं. जब यह समाप्त होगा तो यहां जो कुछ भी दिख रहा है, मकरान में जो भी दिख रहा है या कहें पूरी दुनिया में जो भी है, वह सब पूरी तरह नष्ट हो जाएगा."
उसकी कयामत से भरी भविष्यवाणी को जब तक हम लोग समझते तब तक उन्होंने मुस्कुराते हुए हमें नारियल थमा दिया और आगे की यात्रा के लिए शुभकामनाएं दीं.
ये भी पढ़ें -

इमेज स्रोत, Simon Urwin
जीवन की दुर्लभ झाँकियां
इसके बाद हमलोग इस इलाके में मौजूद प्राचीन क़िले की चट्टानों और घुमावदार पहाड़ियों रास्तों को पार किया. इस यात्रा के दौरान हमें पाकिस्तान के सबसे बड़े लेकिन सबसे कम आबादी वाले प्रांत में जीवन की दुर्लभ झांकियां देखने को मिलीं. कभी कभार कोई किसान गधे पर दूर स्थित बाज़ार में जाते नज़र आए, गांव के लड़के रेत और धूल की अस्थायी पिचों पर क्रिकेट खेलते नज़र आए.
फिर राजमार्ग पर चढ़ाई शुरू हुई और यह वाहन चलाने की क्षमता की जांच परीक्षा से कम नहीं थी. लेकिन इस रास्ते से गुजरने वाले रंग बिरंगे ट्रक चालकों के लिए यह कहीं ज़्यादा चुनौतीपूर्ण था. भारी सामानों की ढुलाई करते हुए इन ट्रकों के पीछे बुरी नज़र से बचाने संबंधी पंक्तियों वाले कई बोर्ड दिखाई दिए.
अकरम ने बताया, "आजकल अच्छी बनी हुई सड़क पर यात्रा करना चुनौतीपूर्ण है. लेकिन सिकंदर महान के समय में उनकी सेना ने पैदल और घोड़े की पीठ पर इस कठोर इलाके की यात्रा की थी."
"325 ईसा पूर्व ऐसा कहा जाता है कि भारत से अपने 30 हज़ार सैनिकों के साथ लौटते सिकंदर ने यही रास्ता चुना था. बेबीलोन (आधुनिक इराक़) तक पहुंचने के लिए उनकी सेना को काफ़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था क्योंकि इस इलाके की गर्मी की वजह से उनके कई सैनिक हताहत हुए थे. यह कहा जाता है कि सिकंदर महान के दस्ते के आधे लोग ही जीवित ईरान पहुंच पाए थे."
आज का राजमार्ग व्यापक रूप से वही मार्ग माना जाता है जो सिकंदर महान ने लिया था, हालांकि इसकी निश्चित पुष्टि संभव नहीं है. हमारा आख़िरी पड़ाव ईरानी सीमा से लगभग 50 किमी पहले धूल भरे शहर जिवानी में था. इसके मुख्य सड़क पर जगह जगह पगड़ी वाले एक सरदार की मूर्ति दिखी, जो बलूचिस्तान के पुराने आदिवासी प्रमुखों में से एक थे. वे अपनी विरासत पारंपरिक तौर पर पगड़ी समारोह के ज़रिये अपने बड़े बेटे को सौंपा करते थे, यह एक तरह से राज्याभिषेक की तरह होता था.

इमेज स्रोत, Simon Urwin
हम यहां एक विशेष शाही स्मारक की तलाश में थे. यह इमारत ख़ास तौर से ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया के लिए बनाई गई थी जो अब पाकिस्तानी तटरक्षक की दूसरी बटालियन के कब्जे वाले एक अत्यधिक सुरक्षा परिसर का हिस्सा है.
इस इमारत तक आम लोगों का प्रवेश बंद है लेकिन बहुत विनम्र अनुरोध करने पर पाकिस्तान की सेना के एक कैप्टन ने हमें सुरक्षा घेरे के साथ अरब सागर के किनारे स्थित महल देखने की अनुमति दे दी.
उन्होंने हमें बताया कि महारानी विक्टोरिया ने मकरान के खूबसूरत सूर्यास्तों के बारे में सुना था, इसलिए उनके लिए यह इमारत 1876 में बनाई गई थी. इतिहासकारों का कहना है कि वह कभी मकरान नहीं आईं, लेकिन बुजुर्ग स्थानीय लोगों का दावा है कि वह यहां आयीं थीं.
सबसे ख़ूबसूरत सूर्यास्त वाली जगह
हम दूर-दराज महलनुमा निवास की आगे की सीढ़ियों पर चढ़े तो अंदर सिर्फ़ तीन छोटे छोटे कमरे थे- एक शयनकक्ष, भोजन कक्ष और बैठक कक्ष. इस इमारत को नौकरों के क्वार्टर से जोड़ने वाले एक टेलीफोन को छोड़कर कुछ मूल चीज़ें मौजूद हैं. इस भवन को हाल ही में तटरक्षक के तस्करी विरोधी कार्यों के लिए तैयार किया गया था.
ग्रीन टी पीते हुए जब हम बात कर रहे थे तो कैप्टन ने हमें बताया, "यह बड़ा व्यवसाय है. ज़्यादातर पेट्रोलियम की तस्करी होती है, लेकिन ड्रग्स और हथियार भी हैं. लेकिन यहां से हम किसी भी सीमा पार यातायात के साथ-साथ ओमान की खाड़ी में अवैध गतिविधियों पर नज़र रख सकते हैं."
हमें सूर्यास्त देखने के लिए रुकने की अनुमति नहीं थी, लेकिन कप्तान ने पास के जिवानी बीच पर एक जगह से सूर्यास्त देखने की सलाह दी. जब हम सिबी शहर पहुंचे तो वहां सूर्यास्त देखने के लिए बड़ी भीड़ पहले से मौजूद थी. इनमें से कुछ तो हज़ार किलोमीटर की दूरी तय करके पहुंचे थे.
वहां मौजूद एक शख़्स ने कहा, "लंबी यात्रा करके यहां आना बेकार नहीं गया. क्योंकि मकरान में होने वाला सूर्यास्त कहीं और नहीं दिख सकता. जैसे ही सूरज आसमान में डूबता है, यह कई सुंदर रंगों में बदल जाता है- पीले से नारंगी तक, फिर अनार की तरह लाल रंग की लकीरें और अंत में बैंगनी रंग. जब यह अंधेरे में ग़ायब हो जाता है तो हम प्रार्थना करते हैं और उम्मीद करते हैं कि ईश्वर की कृपा से यह अगली सुबह फिर निकलेगा और इंशाअल्लाह, ऊपर वाले की इच्छा से हम इसे देखने के लिए जीवित रहेंगे."
ये भी पढ़ें -
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
















