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कोरोनाः वायरस और बैक्टीरिया को मार सकती है ये ख़ास कोटिंग
- Author, क्रिस्टीन रो
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
दुनिया में हर साल एक करोड़ लोगों की जान जाएगी. जी हां, एक करोड़.
जिस तेज़ी से कीटाणु और अन्य रोगजनक जीव, एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर रहे हैं, उससे एंटीबायोटिक दवाएं, कई बीमारियों से लड़ने में बेअसर साबित हो जाएंगी. और इससे आगे चल कर हर साल एक करोड़ लोगों की जान जाने का अंदेशा है.
अभी तक हर साल दुनिया भर में 7 लाख लोग ऐसे रोगों से मर जाते हैं, जिन पर दवाओं का असर नहीं होता. पिछले एक दशक में हानिकारक बैक्टीरिया के ख़िलाफ़ जिन एंटीबायोटिक्स का उपयोग किया जा सकता था, उनका असर अब कम होता जा रहा है.
इसी दौरान, अन्य रोग पैदा करने वाले वायरस, फफूंद और अन्य परजीवी भी इन दवाओं से लड़ने की शक्ति विकसित कर रहे हैं. मतलब ये कि इनकी वजह से जो बीमारियां होती हैं, उनका इलाज करना और भी मुश्किल हो रहा है. जानकारों का कहना है कि जल्द ही कुछ नहीं किया गया तो दुनिया भर में हर साल एक करोड़ लोगों की मौत ऐसे रोगाणुओं से होगी, जिन पर मौजूदा दवाओं का असर नहीं होता.
हम सभी दिन भर में न जाने कितनी चीज़ें छूते हैं. उन सभी पर कई प्रकार के कीटाणु, जीवाणु और वायरस चिपके रहते हैं. वो किसी ना किसी सूरत में हमारे शरीर में दाखिल हो जाते हैं और हमें बीमार करते हैं.
कोविड-19 महामारी का वायरस CoV-2 गत्ते पर 24 घंटे तक ज़िंदा रह सकता है, जबकि प्लास्टिक और स्टील वग़ैरह पर तीन दिन तक. कुछ बैक्टीरिया, ग़ैर जानदार चीज़ों पर कई महीने तक रह तक ज़िंदा सकते हैं. इसीलिए, लगातार हर सतह को साफ़ रखने की सलाह दी जाती है.
जानकार कहते हैं, अब जबकि हम जान चुके हैं कि किस प्रकार की सतह पर कौन-सा कीटाणु या बैक्टीरिया कितनी देर तक ज़िंदा रह सकता है तो क्यों ना हम एंटी बैक्टीरियल परत के लेप का इस्तेमाल शुरू कर दें. तांबे की मिश्रित धातुओं को इसके लिए सबसे अच्छा विकल्प माना गया है.
ये धातु महज़ 2 घंटे में 99.9 फ़ीसद बैक्टीरिया मारने की क्षमता रखती है. प्राचीन काल में भारत और यूनान के लोग तो खाना तांबे के बर्तनों में ही बनाते थे. भारत में तो आज भी तांबे के बर्तनों को सेहत के लिए अच्छा माना जाता है.
यूनान में वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए भी तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल होता था. लेकिन आज ये धातु महंगी होने की वजह से कम इस्तेमाल होने लगी हैं. इसकी जगह स्टील और प्लास्टिक ने ले ली है.
तांबे के बर्तनों की साफ़-सफ़ाई भी आसान काम नहीं है. इसीलिए कुछ लोग इसे नापसंद करते हैं. महंगा होने की वजह से अगर हम तांबे के बर्तन इस्तेमाल नहीं कर सकते तो इसकी कलई चढ़ाकर तो इस्तेमाल किया ही जा सकता है.
मिसाल के लिए डोर बेल या लिफ्ट के बटन, दरवाज़ों के हैंडल कॉपर कोटिंग वाले बनाए जा सकते हैं. इससे कीटाणुओं और वायरस का असर बहुत हद तक कम हो सकता है.
जानकार तो यहां तक कहते हैं कि मेडिकल ट्रांसप्लांट में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है.
वैज्ञानिक एंटीबैक्टीरियल सरफ़ेस तैयार करने के लिए प्रकृति से भी प्रेरणा ले रहे हैं. मिसाल के लिए सिकाडा कीड़ा अपने पंखों से अपनी सफ़ाई के लिए मशहूर है. उनके पंख सुपरहाइड्रोफ़ोबिक हैं. मतलब ये कि वो अपने पंखों पर पानी टिकने नहीं देते.
जैसे ही पानी की बूंदे उस पर गिरती हैं, वो फिसल जाती हैं और अपने साथ पंखों पर चिपके कीटाणु भी बहा ले जाती हैं. अब इसी तर्ज़ पर नई तरह की सतहें तैयार करने पर काम किया जा रहा है.
रिसर्चर टाइटेनियम और टाइटेनियम मिश्रित धातुओं के बारे में ज़्यादा उत्साहित हैं. इन्हें हाई टेंपरेचर पर आसानी से पिघलाया जा सकता है. और तेज़ किनारों के साथ एक महीन चादर बनाई जा सकती है. जिनसे विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं को मारा जा सकता है.
इसके अलावा, पराबैंगनी किरणों के संपर्क में आने पर टाइटेनियम डाइऑक्साइड ऐसे पराक्साइड का उत्पादन करता है जो रोगाणुओं को निष्क्रिय करता है. कोरोना वायरस को कमज़ोर करने के लिए भी इसी तरह की कोटिंग वाली सतहों का इस्तेमाल किया जा सकता है.
ख़ुद को बीमारियों से बचाने और रोगाणु ख़त्म करने के लिए हम प्रकृति से और भी कई तरह की प्रेरणाएं ले सकते हैं. मिसाल के लिए चाय के पेड़ से निकलने वाले तेल में एंटीवायरल एरोसॉल होते हैं. इनके संपर्क में आने पर 5-15 मिनट के भीतर 95 फ़ीसद से अधिक रोगाणु नष्ट हो सकते हैं.
रोगाणुरोधी पौधों के अर्क़ से कोटिंग वाली सतह तैयार करने पर रिसर्च अभी शुरूआती चरण में है. उम्मीद है कि कामयाबी भी मिल जाएगी. लेकिन इसके लिए ज़रूरी अवयवों की मात्रा और रोगाणुओं के टारगेट के बारे में अधिक जानकारी होना भी ज़रूरी है.
एंटीमाइक्रोबियल सरफ़ेस पर रोगाणु मर कर वहीं चिपके रह जाते हैं. इनकी लगातार सफ़ाई होना बहुत ज़रूरी है. दुनिया में ऐसे बहुत से देश हैं जहां पानी की भारी क़िल्लत है. ऐसे में एंटीमाइक्रोबियल सतहों का आइडिया सभी देशों के लिए कारगर नहीं है.
आज दुनिया नए कोराना वायरस का सामना कर रही है. इसे काबू में करने के लिए अभी तक के सभी प्रयास नाकाम रहे हैं. ऐसे में एंटीमाइक्रोबियल सरफ़ेस की ज़रूरत और भी ज़्यादा महसूस होती है. इसके अलावा अस्पतालों से जितना कचरा निकलता है वो भी संक्रमण फैलाने की वजह बनता है.
एक अध्ययन से पता चला है कि चीन में कोविड-19 से जितने लोगों की मौत हुई है, उनमें से 50 फ़ीसदी रोगियों को अन्य कीटाणुओं ने पहले ही संक्रमित कर दिया था. अस्पतालों में कोरोना के मरीज़ों को एंटीबायोटिक्स ही दी जा रही हैं, भले ही वो वायरस के ख़िलाफ़ बेअसर हैं.
इसमें शक नहीं कि हम तरह-तरह के जीवाणुओं से घिरे रहते हैं. बहुतों के ख़िलाफ़ तो हमारा शरीर ख़ुद ही लड़ लेता है और बहुतों को ख़त्म करने के लिए दवाएं लेने पड़ती हैं. लेकिन, जिस तरह कोविड-19 वायरस हमारी ज़िंदगी में नासूर बनकर घुस गया है, उससे और उस जैसे अन्य रोगी बनाने वाले जीवों से लड़ने के लिए हमें जल्द ही अन्य विकल्प तलाशने होंगे.
रोगाणु मारने वाली सतह का लेप, इसका एक अच्छा विकल्प हो सकता है.
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