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इन जानवरों का ज़हर इंसानी ज़िंदगी के लिए वरदान है?
- Author, जो कूरमियर
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
जब तक मेडिकल साइंस का आविष्कार नहीं हुआ था, इंसान पेड़-पौधों और जड़ी बूटियों से ही इलाज करता था. निएंडरथल्स मानवों ने भी चिनार के पेड़ की छाल का इस्तेमाल दर्द निवारक के रूप में किया था. जानवरों का भी उनके औषधीय गुणों के लिए शोषण किया जाता रहा है.
मिसाल के लिए चीन की पारंपरिक चिकित्सा (TCM) में जानवरों की 36 तरह की प्रजातियों का इस्तेमाल होता रहा है. इसमें भालू, गैंडे, बाघ और समुद्री घोड़े तक शामिल हैं. इनमें से कई तो अब ख़त्म होने के कगार पर हैं. अभी पैंगोलिन को कोविड-19 के लिए ज़िम्मेदार माना जा रहा है. लेकिन हाल के कुछ समय तक चीन में पारंपरिक चिकित्सा के लिए पैंगोलिन पालन होता था.
आयुर्वेदिक चिकित्सा में गठिया के इलाज के लिए सांप के ज़हर का इस्तेमाल किया जाता है. इसी तरह, अफ्रीका, दक्षिणी अमरीका और एशिया में टेरेंटुला नाम की ज़हरीली मकड़ी का इस्तेमाल कई तरह की बीमारियां ठीक करने में किया जाता है. इसमें दांत का दर्द और कैंसर जैसे मर्ज़ भी शामिल हैं.
हालांकि इन पारंपरिक उपचारों के समर्थन में कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं है. इसी हफ़्ते वैज्ञानिकों ने ख़बरदार भी किया है कि अगर जंगली जानवरों का शोषण अभी भी बंद नहीं किया गया तो भविष्य में और भी कई महामारियों का सामना करना पड़ सकता है.
इंसान हज़ारों वर्षों से पेड़ पौधों से दवाएं बनाता रहा है. लेकिन जानवरों के संदर्भ में ऐसा करना ज़रा मुश्किल है. लेकिन तकनीक की मदद से इस काम को भी आसान बना लिया जाएगा. बहुत-सी बीमारियां इंसान को जानवरों से मिल रही हैं तो इनका इलाज भी उन्हीं की मदद से किया जाएगा.
हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए क्रमिक विकास का, जिसकी वजह से हमें जानवरों में ऐसे अणु मिल जाते हैं. जो इंसान के शरीर में भी पाए जाते हैं. इन अणुओं को 'पेप्टाइड्स' कहते हैं. घोंघे और मकड़ियों से लेकर सैलामैंडर और सांपों तक में ये पेप्टाइड्स मिल जाते हैं.
पेप्टाइड्स प्रोटीन के रूप में ही होते हैं लेकिन बहुत छोटी श्रृंखला में. इन्हें हम 'मिनी प्रोटीन' कह सकते हैं. चूंकि वो एस्पिरिन जैसी दवाओं की तुलना में 10 से 40 गुना बड़े होते हैं. इसलिए, वो अपने टारगेट पर सक्रियता से काम करते हैं. इनके साइड इफ़ेक्ट भी नहीं होते. तकनीक की मदद से आज वैज्ञानिक बहुत आसानी से पता लगा सकते हैं कि किस जानवर के कौन से अणु से दवा बनाई जा सकती है.
बाज़ार में आज ऐसी सैकड़ों दवाएं मौजूद हैं, जो जानवरों के ज़हर से ही तैयार की गई हैं. मिसाल के लिए टाइप-2 शुगर के मरीज़ों की दी जाने वाली दवा एनैक्सेटाइड गिला मॉन्सटर की लार से तैयार होती है. पुराने दर्द में आराम के लिए ज़िकोनिटाइड दवा दी जाती है. ये दवा घोंघे के ज़हर से तैयार होती है. हार्ट अटैक रोकने के लिए एप्टिफाइबेटाइड दवा का इस्तेमाल होता है, जो रैटल स्नेक के ज़हर से बनती है. कैप्टोप्रिल, एक जानवर से ली गई पहली दवा है, जिसे 1981 में अमरीकी फूड ऐंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) से मान्यता मिली थी. ये एक एंटी-हाइपरटेंसिव दवा है.
जानवरों के अणुओं से बनने वाली सभी दवाओं में उनका ज़हर शामिल होता है. लेकिन सभी पशुओं के पास दुर्लभ प्रकार का ज़हर नहीं होता. ये केवल 2 लाख 20 हज़ार प्रजातियों में ही पाया जाता है.
जो धरती पर पाए जाने वाली जीवों की प्रजातियों का 15 फ़ीसद है.
हार्ट अटैक के बाद दुनिया में सबसे ज़्यादा मौत स्ट्रोक से होती हैं. हर साल क़रीब 60 लाख लोग इसी बीमारी से मरते हैं. 50 लाख लोग ब्रेन डेड होकर बिस्तर पर पड़े रहते हैं. ऐसे लोगों को ख़तरनाक ज़हर वाली दवाएं दी जाती हैं. ऐसे मरीज़ों के लिए बहुत ज्यादा दवाएं अभी तक नहीं हैं.
टिशू प्लासमीनो एक्टिवेटर ही ऐसी दवा है, जिसे अमरीकी एफडीए से मान्यता मिली हुई है.
बायोकेमिस्ट ग्लेन किंग दुनिया के सबसे बड़े भौतिक संग्रह के साथ काम करते हैं. यहां ऐसे 700 तरह के रीढ़ विहीन जीवों के ज़हर के नमून से लिए गए पेप्टाइड्स हैं. जिसमें बिच्छू, मकड़ी, ख़तरनाक कीड़े और गोजर शामिल हैं. स्ट्रोक ठीक करने के लिए उन्हें यहां महज़ एक ही अणु मिला जिसका नाम है Hi1a. ये ऐसे खतरनाक ज़हर का अणु है. जो ऑस्ट्रेलियाई फ़ेनेल वेब स्पाइडर हाइड्रोनिक इनफेन्सा से लिया गया है.
किंग कहते हैं ये दुनिया का सबसे जटिल रासायनिक नुस्खाल है. वो कहते हैं कि अगर स्ट्रोक के 8 घंटे बाद इस दवा की एक छोटी-सी भी खुराक मरीज़ को दी जाए तो बड़े पैमाने पर दिमाग़ को नुक़सान पहुंचने से बचाया जा सकता है. और अगर चार घंटे बाद ही दे दी जाए तो 90 फीसद तक नुक़सान रोका जा सकता है. इस दवा के साइट इफ़ेक्ट भी नहीं के बराबर हैं. ग्लेन किंग कहते हैं कि हर ज़हर उतना ज़हरीला नहीं होता, जितना हम समझते हैं. मिसाल के लिए दुनिया में मकड़ियों की एक लाख से ज़्यादा प्रजातियां हैं. लेकिन इनमें से मुठ्ठी भर ही इंसान को नुक़सान पहुंचाने वाली हैं.
टोज़्युलेरिस्टाइड एक ऐसी दवा है जिससे दिमाग़ में कैंसर के ट्यूमर को आसानी से देखा जा सकता है. इसे बिच्छू के ज़हर से तैयार किया गया है. ये सिर्फ़ दिमाग़ के ट्यूमर की पहचान के लिए ही इस्तेमाल की जाने वाली दवा है. लेकिन अब ब्रेस्ट कैंसर और स्पाइन कैंसर की पहचान के लिए भी इस पर रिसर्च की जा रही है.
इसी तरह ऑस्ट्रेलियाई रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिसर्चर मारिया ने अपनी रिसर्च में पाया है कि ब्राज़ील के टैरंटुला अकेंथोस्क्युरा गोमेसियाना के ज़हर से लिया गया पेप्टाइड. स्किन कैंसर के सेल को ख़त्म कर सकता है. इसी तरह ऑस्ट्रेलियाई फ़ेनेल वेब स्पाइडर एच. इनफ़ेन्सा के ज़हर से भी स्किन कैंसर के सेल ख़त्म किए जा सकते हैं.
रिसर्चर मारिया का कहना है कि मेलानोमा नाम के स्किन कैंसर में ये बहुत कारगर है. ब्रिटेन में ये पांचवें नंबर की बड़ी बीमारी है और दुनिया में हर साल एक लाख 32 हज़ार लोग इस बीमारी का शिकार होते हैं.
दवाओं में जो ज़हर इस्तेमाल किया जाता है, उसका बड़ा हिस्सा सांप से आता है. धरती पर सांप ही ऐसा जीव है, जो सबसे ज़्यादा ज़हर का उत्पादन करता है. लेकिन जो जानवर कम ज़हर पैदा करते हैं, उनके विष का भी इस्तेमाल किया जा सकता है. मकड़ी एक दिन में 10 मिलीलीटर ज़हर पैदा करती है. बिच्छू सिर्फ दो मिलीलीटर ज़हर बनाा है. लेकिन रिसर्चर इनके ज़हर से भी काम के अणु निकाल कर इस्तेमाल कर रहे हैं.
पशुओं के पेप्टाइड में कई तरह की ऑटो इम्यून बीमारियां और दर्द ठीक करने की क्षमता है. अब वैज्ञानिक जानवरों के बायोलॉजिकल मूल्यों का इस्तेमाल कोविड-19 जैसी महामारियों का इलाज तलाशने में भी कर रहे हैं.
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(ये बीबीसी फ्यूचर की स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. मूल कहानी देखने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं.)
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