कोरोना वायरसः क्यों समझदार लोग भी झूठी बातों पर यक़ीन कर लेते हैं?

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- Author, डेविड रॉबसन
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
नए कोरोना वायरस को लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह की बातें फैलाई जा रही हैं.
कोई गोमूत्र में इसका इलाज ढूंढ रहा है, तो कोई गाय के गोबर को कोरोना से बचने का रामबाण बता रहा है.
किसी को लहसुन में वायरस का इलाज दिखता है, तो कोई सिरके का सहारा ले रहा है. खैर, ऐसी ग़लत जानकारियों का ये सिलसिला सिर्फ़ कोरोना वायरस साथ ही नहीं है.
बल्कि, हर बड़ी बीमारी और महामारी के साथ ऐसी ग़लत जानकारियां जुड़ जाती हैं.
1980 और 1990 के दशक में जब एड्स फैला था, तो इसके बारे में भी इसी तरह की भ्रांतियां फैलाई गई थीं.
किसी ने कहा कि एड्स का वायरस सरकारी लैब में तैयार किया गया है. तो किसी ने कहा कि एचआईवी टेस्ट विश्वसनीय ही नहीं है.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म
एक भ्रामक थ्योरी में तो ये भी कहा गया कि बकरी के दूध से इसका इलाज किया जा सकता है.
इस तरह की ग़लत जानकारियां बीमारी के प्रति लोगों के बर्ताव में नकारात्मक बदलाव लाती हैं और संकट को गहरा देती हैं.
अब यही हाल कोरोना वायरस की महामारी के समय है.
व्हाट्सएप, फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म कोरोना वायरस के इलाज को लेकर ऐसी ग़लत जानकारियों से पटा पड़ा है.
लोग बिना सोचे समझे अपुष्ट बातों वाले मैसेज आगे भी बढ़ा देते हैं. बीबीसी लगातार ऐसी ग़लत जानकारियों के प्रति लोगों को आगाह करता रहा है.
विश्व स्वास्थ्य संगठ की वेबसाइट पर ऐसी ग़लत जानकारियों का खंडन करने वाला एक पेज है, जिसे नियमित रूप से अपडेट किया जाता है.
कोविड-19 का संकट
एक रिपोर्ट के मुताबिक़, अफ़वाहों के चलते ही ईरान के एक प्रांत में बहुत से लोगों की मौत हो गई.
यहां किसी ने अफ़वाह फैला दी थी कि कारख़ानों में इस्तेमाल होने वाले एल्कोहल से नए कोरोना वायरस को ख़त्म किया जा सकता है.
इस ग़लत जानकारी को सही जानकर बहुत से लोगों ने ये एल्कोहल पी लिया और उनकी मौत हो गई.
इस तरह की अफ़वाहें सरकार द्वारा जारी की गई गाइडलाइंस पर लोगों का भरोसा कमज़ोर करती हैं. और स्वास्थ्यकर्मियों और संस्थाओं के प्रयासों को नाकाम करती हैं.
मार्च 2020 में YouGov औऱ इकोनॉमिस्ट के सर्वे में पाया गया कि 13 फ़ीसद अमरीकी मानते हैं कि कोविड-19 का संकट असल में एक प्रपंच है.
सर्वे में शामिल 49 फ़ीसद लोगों का मानना है कि कोविड-19 मानव निर्मित संकट है. आम तौर से माना जाता है कि ऐसी भ्रांतियां अनपढ़ लोगों के बीच ही ज़्यादा पनपती हैं.
फेसबुक और ट्विटर
लेकिन, हैरत की बात है कि संकट के इस समय में पढ़े-लिखे लोग भी अफ़वाहों के जाल में फंस रहे हैं.
मशहूर लेखिका केली ब्रोगन कोविड-19 की थ्योरी को दवा बनाने वाली कंपनियों का षडयंत्र बताती हैं. यहां तक कि वो इटली और चीन में कोरोना मरीज़ों को भी नकारती हैं.
वो तो यहां तक कहती हैं कि 'जर्म थ्योरी' भी दवा कंपनियों का फैलाया हुआ एक मिथक है. ऐसा नहीं है कि केली कम पढ़ी लिखी या अतार्किक हैं.
उन्होंने मानसिक रोगों की चिकित्सा में कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से डिग्री हासिल की है. उन्होंने एक डिग्री एमआईटी से भी हासिल की है.
फेसबुक और ट्विटर कोरोना संकट से संबंधित किसी भी तरह की ग़लत जानकारी को ख़ुद ही अपने प्लेटफॉर्म से हटा दे रहे हैं.
मनोवैज्ञानिक भी अफ़वाह फैलाने और पढ़े-लिखे लोगों द्वारा कोरोना संकट को ग़लत ठहराने वालों की सोच पर रिसर्च कर रहे हैं.
सच्चाई की मोहर
हो सकता है इनकी रिसर्च हमें ग़लत जानकारियों से बचने के उपाय सुझा सके. कहा जाता है कि किसी झूठ को अगर सफ़ाई से बार-बार बोला जाए तो वो सच लगने लगता है.
कोरोना वायरस को लेकर सोशल मीडिया पर जानकारी का सैलाब सा आया हुआ है.
ये जानकारियां इस तरह से लिखी जाती हैं कि पढ़ने वाले की तार्किक क्षमता कमज़ोर पड़ने लगती है. वो जानने की कोशिश भी नहीं करता कि जानकारी का माध्यम क्या है.
ऑस्ट्रेलिया की एक रिसर्चर एरिन न्यूमेन कहती हैं कि जानकारी के साथ लगाई गई तस्वीर उस जानकारी पर सच्चाई की मोहर लगा देती है.
चाहे वो तस्वीर दावा करने वाली जानकारी के साथ ऊपरी तौर से ही संबंध रखती हो.
अगर कोरोना के इलाज से संबंधित जानकारी का दावा करने वाले संदेश के साथ किसी भी वायरस की तस्वीर लगा दी जाए तो फिर क्रॉस चेक की ज़रुरत बाक़ी नहीं रह जाती.
सच्ची और फ़ेक हेडलाइन
हम उस जानकारी को बिल्कुल सही मानने लगते हैं.
यही नहीं, ग़लत और भ्रामक जानकारियों को सच बनाने के लिए उनके साथ निजी कहानियां, नाम, यहां तक कि मेडिकल संस्थानों के नाम भी शामिल कर लिए जाते हैं.
एक ही जानकारी को कई तरह से पेश किया जाता है. ताकि, पढ़ने वाले को वो अलग-अलग एंगल से सच लगने लगे.
सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले किसी भी संदेश की सच्चाई जाने बग़ैर उसे तेज़ी से फैलाते रहते हैं.
इस रिसर्च में बहुत से प्रतिभागियों को कोरोना वायरस पर दो तरह की न्यूज़ हेडलाइन पढ़ाई गईं. फिर इनसे सच्ची और फ़ेक हेडलाइन पहचानने को कहा गया.
इनमें से 25 प्रतिशत ने झूठी हेडलाइन को सही बताया. फिर उनसे पूछा गया कि जब आपको पता चल गया कि ये हेडलाइन झूठ है, तो क्या फिर भी आप इसे आगे बढ़ाएंगे?
रिट्वीट और लाइक पाने के लिए...
35 प्रतिशत लोगों का जवाब हां में था. कई बार ऐसा किसी प्रोपेगेंडा के तहत किया जाता है या फिर लोग रिट्वीट और लाइक पाने के लिए करते हैं.
बहुत से लोग कोई फेक जानकारी फैलाने के साथ चेतावनी भी लिख डालते हैं कि वो नहीं जानते की शेयर की जा रही जानकारी सही है या नहीं.
यानी वो इस तरह सही या ग़लत की पहचान करने की ज़िम्मेदारी पढ़ने वाले पर डाल देते हैं.
अगर जानकारी सही होती है तो उन्हें ख़ुशी मिलती है कि उन्होंने अपने दोस्तों, रिश्तेदारों या परिवार को कुछ अच्छी बात बता दी है.
लेकिन वो ये एहसास ही नहीं कर पाते कि ग़लत साबित होने पर शेयर की गई जानकारी फ़ायदे के बजाए कितना नुक़सान कर देगी.
मनोवैज्ञानिक रिसर्चरों के अनुसार लोगों का ज़हन कई तरह से काम करता है. एक वो लोग होते हैं, जो किसी जानकारी के प्रति अति संवेदनशील होते हैं.
निजी स्वच्छता और सोशल डिस्टेंसिंग
वो किसी भी जानकारी को स्वीकार करने से पहले अपनी तार्किक शक्ति का इस्तेमाल करते हैं.
एक वो लोग होते हैं जिनके पास तार्किक शक्ति है, लेकिन वो इसका इस्तेमाल नहीं करते.
वही कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो किसी भेदभाव की वजह से गलत जानकारी जान-बूझकर फैलाते हैं.
कोरोना वायरस के संबंध में ऐसे लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा देखने को मिल रही है, जो निजी स्वच्छता और सोशल डिस्टेंसिंग का मख़ौल उड़ा रहे हैं.
भीतर से वो कहीं जानते हैं कि कोरोना से लड़ने का यही उपाय है. फिर भी, वो ऐसे विचारों की अनदेखी करने वाले संदेशों को बढ़ावा देते हैं.
अमरीका जैसे संपन्न देश में भी 13 फ़ीसद ऐसे ही लोग मौजूद हैं.

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बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल करें...
फ़िलहाल कोरोना महामारी से बचने का कोई रामबाण नहीं है. अगर कुछ है, तो वो सिर्फ़ सोशल डिस्टेंसिंग और स्वच्छता है.
अगर कोई इससे बचने के कोई अन्य उपाय सोशल मीडिया पर सुझाता है, तो उस पर ध्यान मत दीजिए.
किसी भी तरह की जानकारी को भरोसेमंद साइट से चेक करने के बाद ही शेयर कीजिए. इसके लिए सबसे पहले तो अपने बुद्धि और विवेक का ही इस्तेमाल करें.
अगर आपका ज़हन उस जानकारी को सही मानता है तो भी क्रॉस चेक ज़रूर करें. इसमें सोशल साइट भी अपना रोल निभा सकती हैं.
जब भी कोई जानकारी शेयर की जाए, तो उसके साथ कंपनियां एक अलर्ट मेसेज भी जारी करें.
जिसमें लिखा हो कि जानकारी की सच्चाई को पहले परख लें, तभी उसे आगे बढ़ाएं. संकट के इस समय में ग़लत जानकारियां संकट को और गहरा देंगी.

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