क्या मोहब्बत आपके दिमाग़ का केमिकल लोचा भर है?

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- Author, पराश्केव नचेव
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
"मोहब्बत है क्या चीज़, हम को बताओ? ये किसने शुरू की, हमें भी सुनाओ...."
गीतकार संतोष आनंद ने फ़िल्म 'प्रेम रोग' में जब ये सवाल उठाया था, उससे पहले बहुत से नामवरों ने अपने-अपने तरीक़े से इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की थी.
मसलन, अठारहवीं सदी के मशहूर शाइर मीर तक़ी मीर ने कहा, "इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है... कब ये तुझ ना-तवां से उठता है..."
अगर, मीर ने इश्क़ को भारी पत्थर कहा, तो बीसवीं सदी के एक और शायर अकबर इलाहाबादी ने इसे कुछ ऐसे परिभाषित किया...
"इश्क़ नाज़ुक मिज़ाज है बेहद, अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता..."

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क्या कहता है साइंस
और, जब साहिर ने संतोष आनंद के उठाए सवाल का जवाब देने के लिए क़लम उठाई तो बहुत कुछ लिख डाला...
अल्लाह-ओ-रसूल का फ़रमान इश्क़ है
याने हफ़ीज़ इश्क़ है, क़ुरआन इश्क़ है
गौतम का और मसीह का अरमान इश्क़ है
ये कायनात जिस्म है और जान इश्क़ है
इश्क़ सरमद, इश्क़ ही मंसूर है
इश्क़ मूसा, इश्क़ कोह-ए-नूर है.
क़िस्सा मुख़्तसर ये कि जिसने जैसा महसूस किया, उसने इश्क़-ओ-मोहब्बत को अपने तजुर्बात की बुनियाद पर बयां कर दिया.
किसी को भारी पत्थर लगा, तो किसी को नाज़ुक़ मिज़ाज, किसी ने मोहब्बत में ख़ुदा देखा, तो किसी को विलेन नज़र आया.
मगर साहब, ये बातें ठहरीं शायराना. इश्क़ के जज़्बे को जब साइंसदानों के हवाले किया गया, तो बड़े नीरस तरीक़े से उन्होंने कह दिया-हुज़ूर ये आप के ज़हन का केमिकल लोचा भर है. ज़्यादा लोड न लें, इसे लेकर.

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केमिकल लोचा है?
क्या वाक़ई, एहसास-ए-मोहब्बत कुछ केमिकल्स का खेल है?
ऐसा है, तो पहली नज़र का प्यार क्या है?
इश्क़ में दुनिया को भुला बैठना क्या है?
मोहब्बत का दीवानापन क्या है?
अगर, केमिकल लोचा होता, तो हम इश्क़ में गिरफ़्तार न होते. मोहब्बत में दीवाने न होते. इसकी गलियों में दिल न खो बैठते.
इश्क़ इतना आसां नहीं, जितना वैज्ञानिक कहते हैं. वरना कोई इंजेक्शन लगवाते और इश्क़ में मुब्तिला हो जाते.
तभी तो हर ज़माने के फ़लसफ़ी चचा ग़ालिब कह गए-
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'
के लगाए न लगे और बुझाए न बुझे.

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साइंस के नज़रिए से...
मोहब्बत होती है तो ख़ुद से हो जाती है और न होनी हो तो लाख कोशिशें करते रहिए. छू कर भी न गुज़रेगी आपको.
रूमानी मोहब्बत की हक़ीक़त ये है कि इक आग का दरिया है और डूब के जाना है.
जो हो जाए तो ये हमारे क़ाबू में नहीं रहती. बल्कि हम इसके क़ाबू में होते हैं. इश्क़ इक ऐसा राज़ है, जैसे किसी जादूगर का इंद्रजाल. इक दफ़ा फंस गए, तो क्या होगा, कैसे होगा कुछ अंदाज़ा नहीं होता.
तो, इश्क़ के एहसास को सिर्फ़ साइंस के नज़रिए से नहीं समझा जा सकता. इसकी रस्में हर सभ्यता, हर समाज हर संस्कृति में एक जैसी हैं.
मगर बयान कुछ इस तरह से होती हैं-
इस इश्क़-ओ-मोहब्बत की कुछ हैं अजीब रस्में
कभी जीने के वादे, कभी मरने की क़समें.
अब इस अजीब-ओ-ग़रीब रूहानी एहसास को साइंस के तजुर्बात क्या डिफ़ाइन करेंगे?
हम ऐसा क्यों कह रहे हैं, ये समझने के लिए विज्ञान की कुछ बातों पर ग़ौर फ़रमाएं.

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बॉन्डिंग हारमोन
अक्सर कहा जाता है कि सेक्स के हारमोन यानी फेरोमोन, तमाम जीवों में पाए जाने वाले वो केमिकल हैं, जो सामने वाले को ये संकेत देते हैं कि हमारे अंदर प्रजनन की कितनी ख़ूबियां हैं.
लेकिन, ये फ़ेरोमोन कीड़ों में भले कारगर हों. मगर, दो इंसानों के बीच कनेक्शन में इनका रोल अस्पष्ट है.
और अगर कोई केमिकल बाहर वाले को ऐसे संकेत दे सकता है, तो शरीर के भीतर भी तो असर करता होगा.
इस मामले में न्यूरोपेप्टाइड ऑक्सीटोसिन नाम का केमिकल प्यार का एहसास कराने में कारआमद साबित हो सकता है. क्योंकि इस बॉन्डिंग हारमोन कहा जाता है. जो दूसरों से जुड़ाव पैदा करता है.
इससे महिलाओं में दूध का स्राव होता है और गर्भाशय का आकार घटाने-बढ़ाने में भी ये अहम रोल निभाता है. ऑक्सीटोसिन के बारे में काफ़ी अध्ययन हुआ है.
ख़ास तौर से अमरीका के प्रेयरी के मैदानों में पाए जाने वाले चूहों पर. ये चूहे एक ही साथी के साथ जीवन बिताने यानी मोनोगैमी के लिए मशहूर हैं. जबकि आम तौर पर जानवरों में मोनोगैमी की गुंजाइश कम ही होती है.

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प्यार का संदेश
इन चूहों पर हुए तजुर्बे में देखा गया कि इनमें ऑक्सीटोसिन का स्राव रोका गया, तो वो अपने जज़्बातों को क़ाबू में रखते थे.
और जब इसकी तादाद बढ़ा दी गई, तो जो चूहे मोनोगैमी में यक़ीन नहीं रखते, वो भी एक ही साथी के ज़्यादा क़रीब होते देखे गए. हालांकि, इंसानों में ऑक्सीटोसिन का इतना नाटकीय असर होता नहीं देखा गया.
फिर कौन सा केमिकल है, जो हमारे अंदर प्यार का एहसास जगाता है. और अगर इंसान के शरीर से कोई केमिकल प्यार का संदेश लेकर निकलता है, तो उस संदेश को पढ़ने वाला केमिकल भी तो किसी के शरीर में निकलता होगा? ज़हन में इश्क़ की इस चिट्ठी का कोई लेटरबॉक्स तो होगा?
वैज्ञानिकों ने इस बारे में दिमाग़ पर रिसर्च की, तो ये देखा कि प्यार के एहसास से दिमाग़ के वही हिस्से जागृत होते हैं, जो कोई लक्ष्य हासिल करने या इनाम पाने के लिए काम करते हैं.
ये भी देखा गया कि रूमानी एहसास और मातृत्व के प्यार के एहसास को हमारा दिमाग़ एक ही जगह से महसूस करता है. फिर, इश्क़ में दीवाना होने का एहसास कैसे आता है भला?
सवाल बड़े हैं, और इनका जवाब पाने के लिए क्या हमें कुछ और प्रयोग करने पड़ेंगे? वैज्ञानिक इसका जवाब हां में ही देंगे.

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बड़ा पेचीदा मसला
मगर, मामला इतना आसान नहीं. प्यार बड़ा पेचीदा मसला है. गणित की कोई पहेली नहीं, जो कुछ ख़ास फ़ॉर्मूलों की मदद से सुलझा ली जाए.
ये सोच समझ कर तो होता नहीं. स्वत: स्फ़ूर्त होता है. तर्कों से परे होता है. तर्कशास्त्र के नियम इश्क़ पर लागू नहीं होते. फिर विज्ञान के प्रयोग कैसे ये पहेली सुलझा सकेंगे?
असल में हमारे अन्य एहसासों, तजुर्बों और बर्ताव की तरह मोहब्बत भी ज़हन की तमाम प्रक्रियाओं का निचोड़ है. जो बहुत पेचीदा है.
लेकिन, ये कहना कि इश्क़ एक केमिकल लोचा है, इस पेचीदगी को बड़ा सादा बनाना होगा.
कोई भला ये क्यों माने कि उसका इश्क़ सादा है. जो क़िस्मतवाले इस एहसास के झंझावात से गुज़रे हैं, उन्हें इस शेर के साथ छोड़े जाते हैं-
क्या हक़ीक़त कहूं कि क्या है इश्क़
हक़-शनासों के हां ख़ुदा है इश्क़
-मीर तक़ी मीर

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