पहली नज़र का प्यार, आख़िर कितना कारगर

'फर्स्ट इंप्रेशन' कितना असरदार होता है?

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    • Author, विलियम पार्क
    • पदनाम, बीबीसी फ्यूचर

देख के तुम को होश में आना भूल गए

याद रहे तुम, और ज़माना भूल गए

किसी का पहला दीदार जब दुनिया भुला दे, तो इसे कहते हैं पहली नज़र का प्यार, या 'लव ऐट फ़र्स्ट साइट'.

आपने किसी को एक नज़र देखा और बस लगा कि ये शख़्स अगर ज़िंदगी में न हुआ तो जीना बेकार है. पहली ही नज़र में ज़िंदगी भर की प्लानिंग दिमाग़ में आ जाती है. इसी तरह बहुत से लोगों को देखकर पहली ही नज़र में हम अंदाज़ा लगा लेते हैं कि वो शख़्स कैसा होगा.

हालांकि ये ज़रूरी नहीं कि सामने वाले की जो तस्वीर हम ने मन में बनाई, वो पूरी तरह सही हो. हमारा आकलन ग़लत भी हो सकता है.

लेकिन कहावत यही है. फ़र्स्ट इम्प्रेशन इज़ लास्ट इम्प्रेशन. चलिए अब इस कहावत का वैज्ञानिक पहलू समझने की कोशिश करते हैं.

'फर्स्ट इंप्रेशन' कितना असरदार होता है?

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किसी का चेहरा एक नज़र देखने के बाद राय क़ायम करने में दिमाग़ को एक सेकेंड का दसवां हिस्सा लगता है.

फ़र्स्ट इम्प्रेशन में सिर्फ़ शख़्सियत के कशिश वाले पहलू का ही अंदाज़ा नहीं लगता बल्कि व्यक्तित्व के बहुत से आयाम सामने आते हैं. जैसे, किसी सियासी शख़्सियत की क़ाबिलियत का अंदाज़ा उसके हाव-भाव, गुफ़्तगू के अंदाज़ और बातों से लग जाता है.

भले ही लोग उसे ज़ाती तौर पर ना जानते-समझते हों, लेकिन उसके व्यक्तित्व से अंदाज़ा लगा लेते हैं कि वो एक कामयाब राजनेता होगा या नहीं.

रिसर्चर और किताब फ़ेस वेल्यू के लेखक एलेक्ज़ेंडर टोडोरोव इससे इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते. इनके मुताबिक़ पहली नज़र में बनी धारणा ग़लत भी हो सकती है. फ़र्स्ट इम्प्रेशन हमेशा अजनबियों के लिए बनता है. लिहाज़ा उसके बारे में बनाई गई कोई भी राय सतही हो सकती है, सटीक नहीं.

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वो तीन चीजें को आपका दिखावा तय करता है

दुनिया भर में फ़ेस वेल्यू के आधार पर तीन चीज़ें ध्यान में रखकर राय बनाई जाती है. पहला आकर्षण. दूसरा विश्वसनीयता और तीसरा प्रबलता.

  • आकर्षण से मुराद है जिसके साथ क्वालिटी सेक्स किया जा सके.
  • विश्वसनीयता से मुराद है जिसमें ज़िम्मेदारियां निभाने का साहस हो.
  • प्रबलता से मतलब है जिसमें झगड़ा, तनाव कम करने की क्षमता हो.

रिसर्चर प्रबलता का संबंध जिस्मानी तौर पर मज़बूत होने से जोड़कर भी देखते हैं. लेकिन इस संदर्भ में मर्द और औरत के लिए समान राय नहीं बनाई जा सकती. मिसाल के लिए अगर हट्टा-कट्टा मर्द है तो ये बात उसके फ़ेवर में जाती है.

वहीं, ऐसी ही क़द-काठी वाली महिला हो तो बुरा माना जाता है. लिहाज़ा चेहरा देखकर किसी के बारे में राय क़ायम करना सही नहीं है.

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वर्चुअल वर्ल्ड में इम्प्रेशन

छतों-छतों एक दूसरे से इशारों वाला, या आंखों ही आंखों में एक दूसरे से प्यार का इज़हार करने का ज़माना अब बीत गया है. ये नई तकनीक का ज़माना है जहां वर्चुअल वर्ल्ड में ज़िंदगी के हक़ीक़ी रिश्ते बनाए जा रहे हैं.

आज बहुत-से ऐसी डेटिंग ऐप मौजूद हैं, जहां हज़ारों लाख़ों लोग दोस्ती कर रहे हैं. लोग किसी की फ़ोटो देखकर फ़िदा हो जाते हैं तो किसी को रिजेक्ट कर देते हैं. वो ये भूल जाते हैं कि तकनीक की मदद से फ़ोटो को अच्छा या बुरा किया जा सकता है.

साथ ही ये देखना भी ज़रूरी है कि फोटो किस एंगल से लिगा गया है. मिसाल के लिए अगर फ़ोटो लो एंगल पर लिया गया है तो अवधारणा बनाई जा सकती है कि तस्वीर में दिख रहा शख़्स डॉमिनेटिंग नेचर का है. ये बात मर्दों के हक़ में, लेकिन महिलाओं के ख़िलाफ़ जाती है. क्योंकि किसी को भी हावी होने वाली महिला साथी नहीं पसंद आती.

अमरीका की वेस्ट वर्जीनिया यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर लीसल शरबी का कहना है कि ऑनलाइन डेटिंग के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है, उनकी बुनियाद पर अगली मुलाक़ात की बात बनती है.

रिवायती तौर पर रोमैंटिक रिलेशनशिप में बात-चीत का आग़ाज़ मर्दों की तरफ़ से होता है. लेकिन वर्चुअल वर्ल्ड में ये फ़र्क देखने को नहीं मिलता. यहां दोनों ही समान रूप से रिश्ते की शुरूआत करते हैं. अब इस बुनियाद पर उनके चरित्र के बारे में कोई सटीक राय नहीं बनाई जा सकती.

'फर्स्ट इंप्रेशन' के आधार पर राय बनाना कितना सही?

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ऑनलाइन दुनिया के रिश्ते

ऑनलाइन डेटिंग ऐप की दुनिया में रिश्ते बहुत रणनीति के तहत बनाए जाते हैं. इसके लिए बाक़ायदा कम से कम 18 तरह की डेटिंग स्ट्रैटेजी का ज़िक्र रिसर्च रिपोर्ट में मिलता है. अगर ऑनलाइन पहली मुलाक़ात कामयाब रहती है. तो फिर, बात दूसरी मुलाक़ात तक पहुंचती है. जिसमें दोनों पार्टनर अपनी पसंद या नपसंद की बात करते हैं.

बात आगे बढ़ती है तो फिर बात होती है स्टेटस, पैसा और प्यार की. अगर ऑनलाइन इन सबसे बात बन जाती है, तो निजी तौर पर मुलाक़ात करने में आसानी रहती है.

ऑनलाइन डेटिंग का सबसे बड़ा फ़ायदा होता है कि आपको फ़ैसला करने के लिए अच्छा ख़ासा वक़्त मिल जाता है. वहीं नुक़सान ये भी है कि किसी शख़्स से मिले बिना उसके बारे में एक धारणा बनने लगती है जो उम्मीदों पर पानी फेरने वाली हो सकती है.

लोग अपनी पसंद या नापसंद बताते हुए भी ग़च्चा खा जाते हैं. मिसाल के लिए मर्द अक्सर कहते हैं कि उन्हें अक़्लमंद महिलाएं पसंद आती हैं. जबकि हक़ीक़त में उन्हें अपने से कम जानकारी और दिमाग़ वाली महिला साथी पसंद आती हैं. ताकि, उनके ज़्यादा बुद्धिमान होने का रुतबा बना रहे.

लेकिन ये बात भी हर इंसान पर लागू नहीं होती. हम सभी अपने जीवन साथी के इंतख़ाब के लिए बहुत तरह पैमाने बना लेते हैं. लेकिन कई बार हमें ऐसे लोग पसंद आ जाते हैं जो हमारे किसी भी पैमाने पर पूरे नहीं उतरते.

बहरहाल कहना मुश्किल है कि पहली नज़र में किसी के भी बारे में बनाई गई राय हमेशा सही होगी. जहां तक बात है प्यार मोहब्बत की तो वो कब, कहां, किससे हो जाए कहा नहीं जा सकता. इश्क़ के रिश्ते में सारे पैमाने धरे के धरे रह जाते हैं. क्योंकि प्यार कभी सोच समझ कर नहीं होता. वो तो बस हो जाता है.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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