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आप किसे वोट डालें, तय करेगा रोबोट!
- Author, फ्रैंक स्वेन
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
चुनाव, लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा हैं. जब आप वोट देने जाते हैं, तो ढेर सारे उम्मीदवारों और कई पार्टियों से पाला पड़ता है. मतदान केंद्र पर आपको बस कुछ पलों में फ़ैसला करना होता है कि किस उम्मीदवार को वोट देना है.
आपका एक वोट अगले पांच साल की सरकार बनाता है. यानी कुछ क्षणों में लिए गए फ़ैसले का असर अगले पांच साल तक देखते हैं.
ऐसे में सही चुनाव करना ज़रूरी होता है. अक्सर लोग पार्टी के प्रति श्रद्धा रखते हुए वोट डालते हैं. कुछ लोग उम्मीदवार देख कर वोट डालते हैं. तो, किसी को विचारधारा प्रभावित करती है. और, ऐसे लोग भी होते हैं, जो नीतियों के हिसाब से प्रत्याशी चुनते हैं.
ये सारे फ़ैसले करना आसान नहीं. आपको सही उम्मीदवार का चुनाव करना हो, तो आपको हर पार्टी, प्रत्याशी के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए. फिर उनकी ख़ूबियां और ख़ामियां पता होनी चाहिए.
ज़्यादातर मतदाताओं के पास इतना वक़्त नहीं होता. इसी साल अप्रैल-मई में हुए लोकसभा चुनाव में देश की जनता ने 8039 उम्मीदवारों में से 543 सांसद चुने. इन चुनावों में 650 से ज़्यादा पार्टियों ने अपने प्रत्याशी उतारे थे. आठ चरण लंबी चुनावी प्रक्रिया के दौरान सभी बयानों और सभी दलों के घोषणापत्रों को समझ लेना क़रीब-क़रीब नामुमकिन काम है.
ये दिक़्क़त अमरीका और ब्रिटेन जैसे ज़्यादा शिक्षित देशों में भी आती है. सही उम्मीदवार का चुनाव स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है. लेकिन, दिनों-दिन ये प्रक्रिया पेचीदा होती जा रही है.
तो, क्या तकनीक हमारा काम आसान कर सकती है?
हमारे लिए चुनाव करतीं मशीनें
अब मशीनें हमारे लिए बहुत से काम कर रही हैं, तो क्या वो वोट डालने में भी हमारी मदद कर सकती हैं?
आज सस्ती फ्लाइट, सबसे अच्छा कार बीमा, मोबाइल फ़ोन पैकेज चुनने में तकनीक हमारी मदद करती है. वो हमें ऐसे विज्ञापन देखने से रोकती है, जो हमारे काम के नहीं हैं. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से हम अपने पसंदीदा गानों की प्लेलिस्ट बना लेते हैं.
तो, क्या चुनाव में भी वो मददगार हो सकती है?
यूरोप की कंपनी, 'वोट वॉच यूरोप' के डोरू फ्रैंटेस्क्यू इसका जवाब हां में देते हैं. इस साल, यूरोपीय यूनियन के हज़ारों नागरिकों ने इस थिंक टैंक के ऑनलाइन टूल का इस्तेमाल करके अपनी ख़्वाहिशें पूरी करने वाले सबसे क़रीबी उम्मीदवार का चुनाव किया.
इन लोगों को 25 सवालों के जवाब देने पड़े. जिसके आधार पर इस ऑनलाइन टूल ने लोगों को उन के लिए मुफ़ीद उम्मीदवार का सुझाव दिया. डोरू फ्रैंटेस्क्यू को उम्मीद है कि आने वाले दौर में उनका ये टूल YourVoteMatters.eu अन्य चुनावों में भी इस्तेमाल होगा.
डोरू फ्रैंटेस्क्यू कहते हैं, ''अक्सर हम जो चुनाव करते हैं, वो तर्कों से परे होते हैं. हम जज़्बाती होकर फ़ैसले करते हैं. इसीलिए ये ऑनलाइन टूल आप को बिना जज़्बाती हुए, उम्मीदवार का चुनाव करने में मदद करेगा.''
कैसे काम करती है तकनीक
हालांकि, ये काम आसान नहीं है. सबसे पहले डोरू फ्रैंटेस्क्यू की टीम को विवादित मुद्दे चुनने पड़े. फिर ये देखना था कि ये मुद्दे लोकप्रिय हैं या नहीं. इसके बाद ऐसे मुद्दों को प्रक्रिया से हटा दिया गया, जिसमें लोग बंटे हुए थे. जैसे कि पर्यावरण प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन.
अमरीका में भी एक स्टार्ट अप कंपनी आईसाइडविद.कॉम (iSideWith.com) लोगों को राष्ट्रीय और स्थानीय चुनावों में उम्मीदवार चुनने में मदद करती है. जो विदेश नीति, पर्यावरण और अप्रवासियों के बारे में प्रत्याशियों के विचार के हिसाब से उनका चुनाव करती है.
इसका ऑनलाइन टूल 2011 में सबसे पहले फ़ेसबुक पर अपलोड किया गया था. इसके पहले छह महीनों के दौरान क़रीब दस लाख लोगों ने इस का इस्तेमाल किया था.
सितंबर 2019 तक 5.2 करोड़ लोग इस ऑनलाइन टूल का इस्तेमाल कर चुके थे. इसके सह संस्थापक टेलर पेक कहते हैं, ''हमने इसमें दो प्रमुख पार्टियों रिपब्लिकन और डेमोक्रेट के साथ-साथ छोटे दलों के उम्मीदवारों को भी शामिल किया था. तो, लोगों को जब इस बारे में पता चला तो वो हैरान रह गए.''
कितना भरोसेमंद
सवाल ये है कि क्या हम ऑनलाइन टूल पर भरोसा करके उम्मीदवार चुन सकते हैं? हालांकि, डोरू फ्रैंटेस्क्यू और टेलर पेक, दोनों ही ये कहते हैं कि उनके टूल की खामियों को पहले ही दूर कर लिया गया है.
ऐसे ऑनलाइन टूल्स के लिए अगला सवाल ये है कि किसी राजनेता और उसकी पार्टी के रुख़ के बीच कैसे तालमेल बनाया जाए? हो सकता है कि कोई नेता दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियों का समर्थक हो, लेकिन अगर उसकी पार्टी का झुकाव वामपंथी नीतियों की तरफ़ हो गया, तो क्या होगा?
साइप्रस की निकोसिया यूनिवर्सिटी की रिसर्चर ज़ेलिहा ख़ाशमन ने एक एल्गोरिदम तैयार किया है. ये इस बात का अनुमान लगा सकता है कि अमरीकी संसद के सदस्य राष्ट्रीय मुद्दों पर कैसे वोट करेंगे. इसके लिए ये एल्गोरिदम उनकी सार्वजनिक राय और पार्टी के रुख़ के बीच का हिसाब लगाता है.
अगर हम अपना भरोसा इन ऑनलाइन टूल पर जताते हैं, तो ये एल्गोरिदम, लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बड़ा रोल निभा सकते हैं. फ्रांटेस्क्यू कहते हैं, ''हो सकता है कि हम ऐसे एल्गोरिदम को वोट दें, जिन्हें फिर राजनेता मानें.''
वो कहते हैं कि किसी पार्टी का घोषणापत्र एक तरह से एक एल्गोरिदम ही तो है, जिसमें कोई राजनेता सत्ता में आने पर काम करने के वादे करता है.
एक रोबोट नेता
वैसे राजनेता इस बात से परेशान हो सकते हैं कि उनके रोल को कोई रोबोट अपना ले. मसलन, देश को नेतृत्व प्रदान करे, भाषण दे, प्रेरित करे और विवादित मुद्दों पर समझौते भी करे.
लेकिन, ये विचार कोई नया नहीं है. मशहूर फिक्शन लेखक इसाक असीमोव ने 1946 में एविडेंस के नाम से एक कहानी लिखी थी, जिसमें एक ऐसे राजनेता की कल्पना की गई थी, जो रोबोट हो भी सकता था और नहीं भी हो सकता था. हालांकि, उसके समय के नैतिक मानक उसकी सोच पर भारी पड़ते हैं.
आज जिस तरह हमारी पसंद, ना पसंद के हिसाब से फ़ेसबुक फीड आती है और स्क्रीन पर विज्ञापन दिखते हैं. ऐसे में बहुत से जानकार ये सवाल भी उठाते हैं कि क्या वाक़ई एल्गोरिदम की निष्पक्षता पर यक़ीन किया जा सकता है?
इसीलिए ज़रूरी है कि आप भी मतदान केंद्र तक जाएं. आपको अपना उम्मीदवार चुनने में हो सकता है कि कोई एल्गोरिदम मदद करे. लेकिन, आख़िरी फ़ैसला आप का होता है और ये ज़िम्मेदारी आप को उठानी ही चाहिए.
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