वो चीज़ जो पीएम 2.5 से भी ज़्यादा ख़तरनाक है?

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- Author, टिम स्मेडले
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
हाल के दिनों में हमारे देश में प्रदूषण को लेकर बहुत शोर मचा है. अक्सर हवा ख़राब होने और सांस लेना दूभर होने की शिकायतें की जा रही हैं.
इस दौरान एक शब्द का इस्तेमाल बार-बार किया जा रहा है, जिसे आप सभी ने सुना ही होगा. वो है PM 2.5 यानी पार्टिकुलेट मैटर 2.5.
असल में ये वो छोटे-छोटे कण होते हैं, जिनकी वजह से प्रदूषण होता है. इनका आकार 2.5 माइक्रोमीटर होता है. कहा जाता है कि ये हमारे फेफड़ों से होते हुए हमारे ख़ून की नली तक पहुंच जाते हैं.
लेकिन, हक़ीक़त ये है कि इनमें से ज़्यादातर प्रदूषण के कण फेफड़ों की छननी के पार नहीं जा पाते.
हमें ये भी बताया जा रहा है कि नाइट्रस ऑक्साइड गैसें, जिसमें नाइट्रोजन ऑक्साइड भी शामिल है, वो ही शहरों में वायु प्रदूषण के लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं. लेकिन, रिसर्च बताती हैं कि यूरोप में प्रदूषण से होने वाली मौतों में से केवल 14 प्रतिशत के लिए ही नाइट्रस ऑक्साइड गैसें ज़िम्मेदार होती हैं.
वायु प्रदूषण के असल ज़िम्मेदार
यानी, प्रदूषण के जो असल कारक हैं, जिनकी वजह से सबसे ज़्यादा मौतें होती हैं, वो कभी सुर्ख़ियों में आते ही नहीं. न ही उनके नियमन के ही कोई क़ायदे तय हुए हैं.
कुछ वैज्ञानिकों के अलावा, बाक़ी लोग उनका ज़िक्र तक नहीं करते. क्योंकि वो उनके बारे में जानते ही नहीं.
वायु प्रदूषण के असल ज़िम्मेदार हैं - नैनोपार्टिकिल्स. यानी वो छोटे-छोटे कण, जो फेफड़ों से गुज़र कर हमारे ख़ून में मिल जाते हैं.
हो सकता है कि पीएम 2.5 इतना छोटा है कि आप को दिखता नहीं. क्योंकि ये इंसान के बाल से 30 गुना छोटा होता है. लेकिन, नैनो पार्टिकिल्स से तुलना करेंगे तो ये हाथी और चींटी को बराबर खड़ा करने जैसा होगा.
पीएम 2.5 असल में 2500 नैनोमीटर आकार का होता है. इसके मुक़ाबले नैनोपार्टिकिल्स केवल 100 नैनोमीटर आकार के होते हैं. इस में कोई दो राय नहीं कि पीएम 2.5 और पीएम 10 जानलेवा होते हैं.
इनसे फेफड़ों और सांस की तमाम बीमारियां होती हैं. लेकिन, नैनोपार्टिकिल्स हमारे शरीर के दूसरे अंगों तक पहुंच सकते हैं, उन्हें तबाह कर सकते हैं.

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नैनोपार्टिकिल्स की गणना क्यों नहीं?
चूंकि, सरकारें अक्सर PM 2.5 के घनत्व के आधार पर ही प्रदूषण को मापती हैं. तो, नैनोपार्टिकिल्स इस जांच के दायरे में ही नहीं आते. जबकि ये दसियों लाख कण आराम से एक PM 2.5 के कण के दायरे में समा सकते हैं. लेकिन, उनका ज़िक्र तक नहीं होता.
लेकिन, वैज्ञानिक कहते हैं कि हमें PM 2.5 के साथ साथ नैनोपार्टिकिल्स को लेकर भी जागरुक होना चाहिए. लोगों को केवल प्रदूषण के कण के आकार पर ही नहीं, हमारी सांस के साथ कितने कण भीतर जाते हैं, उनकी संख्या पर भी ग़ौर करने की ज़रूरत है.
नैनोपार्टिकिल्स के ख़तरों के बारे में सबसे पहले 2003 में सर्बजीत कौर ने आवाज़ उठाई थी. उस वक़्त सर्बजीत कौर, लंदन के इम्पीरियल कॉलेज में युवा रिसर्चर थीं. वो लंदन की हवा में प्रदूषण की पैमाइश के लिए हो रहे डैपल एक्सपेरिमेंट का हिस्सा थीं.
डैपल यानी (Dispersion of Air Pollution and its Penetration into the Local Environment). सर्बजीत कौर ने कुछ स्वयंसेवियों के साथ-साथ ख़ुद भी इस प्रदूषण का तजुर्बा किया था.
इसके तहत 6 लोगों को क्रिसमस के पेड़ जैसी वेष-भूषा में केंद्रीय लंदन की कुछ व्यस्त सड़कों से गुज़रने को कहा गया था. इनके लिबास में प्रदूषण मापने वाले उच्च तकनीक के यंत्र लगे थे.
इन लोगों के शरीर पर लगे उपकरणों से वायु प्रदूषण के प्रमुख कारक PM 2.5, कार्बन मोनो ऑक्साइड को मापा गया. साथ ही साथ, सर्बजीत कौर ने एक नया उपकरण भी लगाया था.
ये यंत्र हवा में मौजूद नैनोपार्टिकिल्स का आकलन भी करता था. ये मशीन 2 नैनोमीटर तक के छोटे कणों को भी पकड़ सकती थी, जो इंसान के ख़ून की कोशिकाओं से भी काफ़ी छोटे होते हैं.

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रिसर्च में क्या पाया?
यूं तो नैनोपार्टिकिल्स के बारे में अमरीका की रोचेस्टर यूनिवर्सिटी ने भी रिसर्च की थी. लेकिन, सर्बजीत कौर पहली रिसर्चर थीं, जिन्होंने इन बेहद महीन कणों से होने वाले नुक़सान का अध्ययन इतने बड़े पैमाने पर किया था.
सर्बजीत कौर के रिसर्च में पता चला कि जब भी कोई कार, उनकी टोली के आस-पास से गुज़रती थी, तो उससे हवा में PM 2.5 की तादाद में तो कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता था. लेकिन इससे नैनोपार्टिकिल्स की तादाद में बेहिसाब इज़ाफ़ा हो जाता था.
इनकी तादाद 36 हज़ार कणों से लेकर एक लाख तीस हज़ार तक होती थी. वहीं, पैदल के बजाय जब सर्बजीत के स्वयंसेवी साइकिल से सड़क पर गुज़रते थे, तो उनका सामना क़रीब बीस हज़ार नैनोपार्टिकिल्स से ही होता था.
लेकिन, रिसर्च के दौरान एक चौंकाने वाली बात सामने आई. वो ये कि जब लोग कार के भीतर होते थे, तब उन पर नैनोपार्टिकिल्स का हमला सबसे ज़्यादा होता था.
सड़क के किनारे या किसी इमारत के पास से गुज़रने पर नैनोपार्टिकिल्स की तादाद कम होती थी. लेकिन, सड़क के बीच में होने पर इनकी संख्या दोगुनी हो जाती थी. हालांकि, इस दौरान PM 2.5 कणों की संख्या कम-ओ-बेश जस की तस रहती थी.

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सरकार ने नहीं दिखाई गंभीरता
सर्बजीत की इस रिसर्च को जब सरकारों ने बहुत गंभीरता से नहीं लिया, तो उन्होंने 2006 में अपना करियर बदलने का फ़ैसला कर लिया.
उसी दौरान कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में डॉक्टरेट कर रहे एक और युवा प्रशांत कुमार ने इस रिसर्च को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया. प्रशांत इससे पहले, आईआईटी दिल्ली से PM 2.5 और PM 10 कणों के बुरे प्रभाव पर रिसर्च कर चुके थे.
इंग्लैंड पहुंचने पर प्रशांत ने देखा कि वहां के वैज्ञानिक सर्बजीत कौर की रिसर्च के बावजूद नैनोपार्टिकिल्स को गंभीरता से नहीं ले रहे थे. उनके बुरे असर को समझ नहीं पा रहे थे. तो, प्रशांत ने इस रिसर्च को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया.
2008 में प्रशांत ने रिसर्च के आधार पर कई लेख प्रकाशित किए. वो बताते हैं कि, ''जब किसी गाड़ी से धुआं निकलता है, तो वो गैस के रूप में निकलता है और ठंडा हो कर नैनोपार्टिकिल्स में तब्दील हो जाता है. इस के बाद वो एक-दूसरे से जुड़कर आकार में बड़े होते जाते हैं.''
''किसी कार की धुआं फेंकने वाली पाइप से आप हर सेंटीमीटर में क़रीब दस लाख कण पा सकते हैं. वहीं सड़क पर इनकी तादाद एक लाख के आस-पास हो जाती है, तो सड़क के किनारे वाले हिस्से में ये और कम यानी क़रीब दस हज़ार कण प्रति सेंटीमीटर की दर से मौजूद होते हैं.''
बच्चों पर बहुत ज़्यादा असर
प्रशांत की रिसर्च में बहुत अहम बातें सामने आईं. उन्होंने कहा कि व्यस्त सड़कों पर प्रदूषण के 90 फ़ीसद कण नैनोपार्टिकिल्स की शक़्ल में होते हैं.
प्रशांत कहते हैं कि, ''यही हमारी सेहत के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं. क्योंकि, जितने छोटे कण होंगे, उतने ही बड़े दायरे में वो फैल जाएंगे. जितने बड़े दायरे में वो फैलेंगे, उतना ही ज़्यादा नुक़सान आप को होगा.''
प्रशांत कुमार की रिसर्च से जो एक और बहुत अहम बात सामने आई, वो ये थी कि सड़क के किनारे स्कूल बसों का इंतज़ार करते बच्चों पर प्रदूषण की भयंकर मार पड़ती है.
जब भी आप ट्रैफ़िक सिग्नल या बस स्टॉप पर खड़े होते हैं, तो, आपका सामना प्रदूषण से ज़्यादा होता है. कई मामलों में तो ये 30 फ़ीसद तक बढ़ जाता है. चूंकि, बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम विकसित होती है, तो उन्हें इस ख़राब हवा से बहुत ज़्यादा नुक़सान होता है.
अमरीका की कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी की चिल्ड्रेन हेल्थ स्टडी में पाया गया कि व्यस्त सड़क के आस-पास रहने वाले बच्चों के फेफड़ों की क्षमता काफ़ी घट जाती है.
नैनोपार्टिकिल्स हमारे फेफड़ों की दीवारों से छन कर बाहर निकल सकते हैं. इस के बाद ये ख़ून में मिलकर शरीर के दूसरे अंगों तक पहुंच जाते हैं.
ट्रैफ़िक का धुआं एक बंदूक है
हाल के दिनों तक ये मालूम नहीं था कि कितने छोटे कण फेफड़ों की दीवार के पार जा सकते हैं. इस बारे में स्कॉटलैंड की एडिनबरा यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डेविड न्यूबाय ने 2017 में रिसर्च की थी.
उनकी साथी डॉक्टर जेन रैफ्टिस ने इमेजिंग तकनीक की मदद से ये पता लगाया. इसके लिए उन्होंने पहले सोने के महीन कणों का इस्तेमाल किया. चूंकि सोना नुक़सानदेह नहीं होता.
पहले ये प्रयोग चूहों पर किया गया. इससे पता चला कि इन छोटे कणों से उनकी धमनियों में ब्लॉकेज हो गया था. एक अध्ययन के मुताबिक़ दिल के दौरे से होने वाली कुल मौतों में से 21 फ़ीसद, वायु प्रदूषण से होती हैं.
लंबे समय से ये कहा जाता रहा है कि ट्रैफ़िक का धुआं असल में वो बंदूक है, जिससे आहिस्ता आहिस्ता लोगों को क़त्ल किया जा रहा है. अब, ये पता चल गया है कि इसमें मौजूद नैनोपार्टिकिल्स ही असल में वो गोली है, जो हमारा शिकार करती है.
पश्चिमी देशों में PM 2.5 और नाइट्रोजन ऑक्साइड और सल्फ़र ऑक्साइड गैसों की क़ानूनी सीमा तय है. लेकिन, नैनोपार्टिकिल्स के लिए कोई पाबंदी नहीं तय है.

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नैनोपार्टिकिल्स पर कैसे क़ाबू पाएं?
आमतौर पर ये तर्क दिया जाता है कि PM 2.5 में 1 नैनोमीटर तक के कण भी शामिल हैं. तकनीकी रूप से तो ये सही है. लेकिन, लाखों नैनोपार्टिकिल्स मिलकर भी PM 2.5 की तादाद को कम ही बताते हैं.
मोबाइल ऐप से लेकर सरकारी वेबसाइटों तक में प्रदूषण को इसी तरह बताया जाता है. क्योंकि ये नैनोपार्टिकिल्स को गिनते ही नहीं है.
ब्रिटेन के डिपार्टमेंट ऑफ एनवायरमेंट, फूड ऐंड रूरल अफेयर्स के मुताबिक़ अभी तक नैनोपार्टिकिल्स को कम करने की कोई सीमा नहीं तय की गई है. इन्हें नियंत्रित करने के क़ायदे भी नहीं तय हैं.
हालांकि यूरो 6 मानक वाली गाड़ियों में ज़रूर 23 नैनोमीटर कणों को मापा जाता है. लेकिन, इसमें भी 30 फ़ीसद नैनोपार्टिकिल्स का आकलन नहीं हो पाता.
प्रशांत कुमार कहते हैं कि अक्सर नाइट्रस गैसें, हवा में मौजूद दूसरी गैसों से मिल कर नैनोपार्टिकिल्स बनाती हैं. तो, अगर हम गाड़ियों से निकलने वाली नाइट्रस गैसों को नियंत्रित करें, तो काफ़ी हद तक नैनोपार्टिकिल्स पर भी क़ाबू पाया जा सकता है.
प्रदूषण के इन दोनों कारकों पर क़ाबू पाने का एक ही तरीक़ा है कि बिजली से चलने वाली गाड़ियों का इस्तेमाल बढ़ाया जाए. बैट्री से चलने वाली ये गाड़ियां सड़क पर मौजूद धूल भले उड़ाएं, पर इनसे प्रदूषित धुआं नहीं निकलता.
साथ ही इनके लिए बिजली भी दूर-दराज़ के इलाक़ों में ही बनेगी. जबकि हम सब सड़क के आस-पास ज़्यादा वक़्त बिताते हैं. तो, हमारा सामना गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण से होता है. बैट्री चालित गाड़ियां होने से हम इस प्रदूषण से बच सकेंगे.

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ख़ैर, ऐसा जब तक नहीं होता है, तब तक आप को सर्बजीत कौर के सुझाए तरीक़े पर अमल करना चाहिए. वो कहती हैं कि आप जब भी पैदल चलें, तो बीच सड़क से जितनी दूर हो सके, उतनी दूर चलें. इससे नैनोपार्टिकिल्स का हमला आप के ऊपर कम होगा.
दौड़ने के लिए सड़क पर न जाएं. पार्क में दौड़ लगाएं. कोशिश करें कि सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल ज़्यादा से ज़्यादा हो.
सर्बजीत कौर कहती हैं कि प्रदूषण मापने का PM 2.5 वाला फॉर्मूला पुराना पड़ चुका है. अब सरकारों को नैनोपार्टिकिल्स के हिसाब से प्रदूषण का आकलन करना चाहिए. इससे ही वायु प्रदूषण की सही तस्वीर सामने आएगी.
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