सस्ता, मज़बूत और टिकाऊ मकान बनाने का नया विकल्प

सीएलटी, लकड़ी की इमारतें

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    • Author, टिम स्मेडली
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

ब्रिटेन की राजधानी लंदन में एक ख़ास इमारत बन रही है. सात मंज़िला इस बिल्डिंग का दो-तिहाई काम पूरा हो चुका है. बुनियादी ढांचा और सीढ़ियां तैयार हैं. अब प्लास्टर और तार बिछाने का काम हो रहा है.

आप इस बिल्डिंग के पास पहुंचेंगे, तो कुछ अलग सा दिखेगा. किसी और बनती हुई इमारत के मुक़ाबले इसके आस-पास का माहौल साफ़-सुथरा है. इसकी वजह ये है कि ये बिल्डिंग कंक्रीट नहीं, बल्कि लकड़ी से बनाई जा रही है.

इस इमारत के आर्किटेक्ट एंड्र्यू वॉ बहुत उत्साहित हैं. वो कहते हैं कि, "कंक्रीट के मुक़ाबले लकड़ी केवल 20 प्रतिशत भारी होती है. इसका मतलब है कि हमें कम मोटी बुनियाद डालने की ज़रूरत है. ज़मीन के भीतर कंक्रीट उड़ेलने की ज़रूरत कम पड़ती है."

"हमने लकड़ी से ही इसकी नींव रखी है. इमारत की दीवारें भी लकड़ी की हैं. और लकड़ी का बना स्लैब भी इसकी छतों पर डाला गया है. यानी इस बिल्डिंग को बनाने में कंक्रीट का इस्तेमाल कम से कम हुआ है. लकड़ी के टुकड़ों को जोड़ने के लिए स्टील का प्रयोग किया गया है."

वो एक छत की तरफ़ इशारा करते हुए कहते हैं कि अगर आप यहां सीढ़ी बनाना चाहते हैं, तो स्टील का बोल्ट खोलिए और लकड़ी काटकर सीढ़ी के लिए रास्ता निकाल लीजिए.

इमारतें बनाने के लिए हम कंक्रीट और स्टील के इस्तेमाल पर बहुत ज़्यादा निर्भर हो गए हैं. फिर चाहे मकान हों, बहुमंज़िला इमारतें या फिर खेल के स्टेडियम. कंक्रीट के बेतहाशा इस्तेमाल की पर्यावरण को भारी क़ीमत चुकानी पड़ रही है.

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पर्यावरण की समस्या से मिलेगी राहत?

दुनिया में 4 से 8 प्रतिशत कार्बन डाई ऑक्साइड कंक्रीट की वजह से ही बनती है. आज पानी के बाद ये दुनिया में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला तत्व है. दुनिया भर में चल रही खुदाई में सबसे ज़्यादा बालू कंक्रीट बनाने के लिए ही निकाला जा रहा है. आज जितना कंक्रीट दुनिया भर में तैयार हो रहा है, उससे हर साल पूरे इंग्लैंड को ढका जा सकता है.

इसीलिए एंड्र्यू वॉ जैसे कई आर्किटेक्ट अब इमारतें बनाने में लकड़ी प्रयोग करने पर ज़ोर दे रहे हैं. पेड़ों में कार्बन डाई ऑक्साइड स्टोर रहती है. जैसे जैसे पेड़ बढ़ते हैं, वो वातावरण से कार्बन डाई ऑक्साइड सोख कर अपने अंदर सहेजते रहते हैं.

एक घन मीटर पेड़ की लकड़ी में एक टन कार्बन डाई ऑक्साइड क़ैद होती है. जो 350 लीटर पेट्रोल से होने वाले प्रदूषण के बराबर है.

यानी लकड़ी न केवल कार्बन डाई ऑक्साइड को अपने अंदर बंद करती है. बल्कि कंक्रीट और स्टील के बजाय लकड़ी के इस्तेमाल से हम वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन को और कम कर सकते हैं.

इसीलिए, आज ब्रिटेन में बनाए जा रहे 15 से 28 प्रतिशत नए घरों में लकड़ी के फ्रेम का इस्तेमाल होता है. यानी इन घरों में क़रीब दस लाख टन कार्बन डाई ऑक्साइड को बंद किया जाता है. घरों को बनाने में जितना ज़्यादा लकड़ी का प्रयोग होगा, उससे वायुमंडल में मौजूद कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा नियंत्रित करने में मदद मिलेगी.

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कैसे शुरू हुआ सीएलटी यानी क्रॉस लैमिनेटेड टिम्बर का इस्तेमाल?

इन दिनों घर बनाने के लिए सीएलटी यानी क्रॉस लैमिनेटेड टिम्बर का इस्तेमाल होता है. इस लकड़ी को ख़ास तौर से घर बनाने के लिए तैयार किया जाता है.

ये लकड़ी के किसी आम लट्ठे जैसा ही दिखता है. इसकी मोटाई क़रीब एक इंच होती है. साथ ही नट-बोल्ट लगाने के लिए छेद किए गए होते हैं. असल में लकड़ी की पतली परतों को आपस में जोड़कर ये सीएलटी यानी क्रॉस लैमिनेटेड टिम्बर तैयार किया जाता है. ये झुकता या मुड़ता नहीं है. ये दो तरफ़ का भार उठाने में सक्षम होती है.

एंड्र्यू वॉ पिछले एक दशक से सीएलटी की मदद से इमारतें बना रहे हैं. इसका आविष्कार 1990 के दशक में हुआ था. क्योंकि उस दौर में लकड़ी के फ़र्नीचर और काग़ज़ उद्योग में लकड़ी की मांग नहीं रह गई थी.

ऑस्ट्रिया जैसे यूरोपीय देश इससे परेशान थे. क्योंकि ऑस्ट्रिया में 60 प्रतिशत इलाक़े में जंगल ही हैं. उन्हें इस से पैदा होने वाली लकड़ी के लिए नए बाज़ार की तलाश थी. लेकिन, सामान्य लकड़ी के लट्ठों का कोई लेनदार नहीं था. इसीलिए, उन्होंने सीएलटी को ईजाद किया.

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सीएलटी का आविष्कार

इसके अलावा कृत्रिम तरीक़े से तैयार दूसरी तरह की लकड़ियों जैसे एमडीएफ़ या प्लाइबोर्ड में यूरिया और फॉर्मेल्डिहाइड जैसे केमिकल से तैयार गोंद का प्रयोग होता है. जलाने के दौरान इनसे ज़हरीले केमिकल निकलते हैं. लेकिन, सीएलटी में एक प्रतिशत से भी कम चिपकाने वाला केमिकल प्रयोग होता है. ज़्यादातर इसमें पॉलीयूरेथेन का प्रयोग किया जाता है, जो ज़्यादा हानिकारक नहीं माना जाता.

ऑस्ट्रिया में सीएलटी बनाने वाली फैक्ट्रियों में कटी-छंटी टहनियों और सूखी लकड़ियों का इस्तेमाल ईंधन के तौर पर होता है. इससे प्रदूषण भी कम होता है.

भले ही सीएलटी का आविष्कार ऑस्ट्रिया में हुआ हो, लेकिन, इससे मकान बनाने का काम सबसे पहले एंड्र्यू वॉ की कंपनी वॉ थिसल्टन ने ही किया. उन्होंने सबसे पहले मरे ग्रोव नाम की नौ मंज़िला रिहाइशी इमारत बनाई थी.

इसके बारे में सुनकर ऑस्ट्रिया के लोग सदमे में आ गए थे. उसके बाद से दुनिया भर में हज़ारों आर्किटेक्ट लकड़ी से इमारतें बनाने की दिशा में सोचने और प्रयास करने लगे.

कनाडा के वैंकूवर शहर में सीएलटी से 55 मीटर ऊंची बिल्डिंग ब्रॉक कॉमन्स टालवुड हाउस बनाई गई है. वहीं ऑस्ट्रिया की राजधानी विएना में इस वक़्त 24 मंज़िला और 84 मीटर ऊंची इमारत होहो टावर का निर्माण हो रहा है.

इस वक़्त कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन कम करने के लिए दुनिया भर में पेड़ लगाने के अभियान चलाए जा रहे हैं. लेकिन, पेड़ों को लेकर हमारी समझ सीमित है. पेड़ जब बढ़ रहे होते हैं, तब तो वो कार्बन डाई ऑक्साइड सोखते और अपने अंदर समाते हैं. लेकिन, उम्र का एक पड़ाव पूरा करने के बाद उनके अंदर से ये क्षमता ख़त्म हो जाती है.

वयस्क पेड़, कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन में योगदान देने वाले हो जाते हैं. जब उन्हें जलाया जाता है या फिर जंगलो की आग की चपेट में आकर पेड़ ख़ुद ब ख़ुद जलते हैं, तो भी कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है.

यूरोप में पाए जाने वाले स्प्रूस के पेड़ वयस्क होने में 80 साल लगाते हैं. और इसके बाद उनसे ही पर्यावरण को ख़तरा हो जाता है. ऑस्ट्रिया के जंगलों में मौजूद पेड़ों की लकड़ियों की डिमांड घटी, तो इनसे पैदा होने वाली लकड़ी ख़तरा बन गई.

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सीएलटी का बाज़ार

इसी तरह कनाडा के विशाल जंगलों ने कार्बन डाई ऑक्साइड सोखने के बजाय इसका उत्सर्जन शुरू कर दिया है, क्योंकि अब इन जंगलों के पेड़ वयस्क हो गए हैं, पर काटे नहीं जा रहे हैं.

कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण रखने का बेहतर तरीक़ा यही है कि जंगलों के वयस्क पेड़ों को नियमित रूप से काटा जाए और इनकी लकड़ी का इस्तेमाल होता रहे. वरना, अक्सर हम जंगलों में आग लगने की घटनाओं का सामना करेंगे. इनसे होने वाला कार्बन उत्सर्जन, जंगलों में सोखी जाने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड के फ़ायदे को ख़त्म कर देता है.

अमरीका की फेडरल फॉरेस्ट सर्विस की प्रमुख मेलिसा जेनकिंस ने हाल ही में इस बात की वक़ालत की थी कि प्रौढ़ हो चुके पेड़ों के इस्तेमाल का एक बाज़ार विकसित किया जाना चाहिए. इससे जंगलों की आग की घटनाएं कम होंगी. उन्होंने भी बिल्डिंग बनाने में सीएलटी का इस्तेमाल बढ़ाने की वक़ालत की थी.

सीएलटी का बाज़ार अमरीका में भी बढ़ रहा है. यहां के कमोबेश हर बड़े राज्य में सीएलटी से इमारतें बनाने के प्रोजेक्ट चल रहे हैं. अमरीका न केवल ऑस्ट्रिया से सीएलटी का आयात कर रहा है, बल्कि ख़ुद कई अमरीकी राज्यों में भी इन्हें बनाने वाले कारखाने लगाए जा रहे हैं.

लकड़ी से बनने वाली इमारतें सस्ती पड़ती हैं क्योंकि ये जल्दी से तैयार हो जाती हैं. इन्हें बनाने में ईंधन कम लगता है. इमारतें बनाने वाली कंपनी एकॉम की निदेशक एलिसन रिंग बताती हैं कि 200 अपार्टमेंट वाली इमारत सीएलटी से बनाने में केवल 16 हफ़्ते लगे.

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कंक्रीट के इमारत बनाने में कितना वक्त?

किसी कंक्रीट वाली इमारत को बनाने में कम से कम 26 हफ़्ते लगते. एंड्र्यू वॉ कहते हैं कि 16 हज़ार वर्ग मीटर की सीएलटी वाली इमारत बनाने में केवल 92 ट्रक लकड़ी लगी. जबकि कंक्रीट से इसे बनाते तो कम से कम सीमेंट के 1000 ट्रक तो लगते ही.

अब तो जापान, फ़्रांस, ऑस्ट्रेलिया, लैटविया और कनाडा जैसे देशों में कई कंपनियां लकड़ी यानी सीएलटी से इमारतें बना रही हैं. 1000 घन मीटर लकड़ी के लिए 500 पेड़ों की ज़रूरत होती है.

जापान जैसे देशों के लिए तो लकड़ी से इमारतें बनाने के और भी फ़ायदे हैं. क्योंकि ये भूकंप के झटके सहने में ज़्यादा सक्षम है.

आग लगने की सूरत में भी सीएलटी से कम नुक़सान होने का डर होता है. क्योंकि सीएलटी कम से कम 270 डिग्री सेल्सियस की गर्मी बर्दाश्त कर सकती है. इससे ज़्यादा तापमान होने पर ही सीएलटी जलती है. इतने तापमान में कंक्रीट बिखर जाएगा और स्टील मुलायम पड़ जाएगा.

वैसे, बहुत से जानकार लकड़ी से इमारतें बनाने को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं. कुछ का मानना है कि कंक्रीट जितने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है, उतने बड़े पैमाने पर लकड़ी उसका विकल्प नहीं हो सकती. फिर, कार्बन डाई ऑक्साइड के लकड़ी में क़ैद होने का तर्क़ भी कुछ जानकार ख़ारिज करते हैं. उनका कहना है कि जब इमारत अपनी उम्र पूरी कर लेगी, तब इस लकड़ी का क्या होगा?

हालांकि इन सवालों के बावजूद एंड्र्यू वॉ उत्साहित हैं. उनका कहना है कि लकड़ी वाली इमारतों की उम्र 50-60 बरस होती है. इस दौरान इंजीनियर इस लकड़ी की रिसाइकिलिंग का कोई न कोई तरीक़ ढूंढ निकालेंगे.

वॉ और उनके विचारों से सहमत कई आर्किटेक्ट ये मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती से लड़ने में सीएलटी काफ़ी मददगार हो सकता है.

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