हमेशा फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर देखने वाले परेशान क्यों रहते हैं

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    • Author, केली ओक्स
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

सोशल मीडिया हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गया है. जब भी थोड़ा वक़्त ख़ाली होता है, हम अपनी फ़ेसबुक फ़ीड, इंस्टाग्राम या ट्विटर टाइमलाइन को खंगालने लगते हैं.

कभी आपने ये सोचा कि सोशल मीडिया की तस्वीरें आपके ज़हन पर कैसा असर डालती हैं? फिर चाहे वो आपके दोस्त की छुट्टियों की तस्वीरें हों या किसी सेलेब्रिटी की जिम में ली गई फ़ोटो. ये तस्वीरें ख़ुद के बारे में आप की सोच किस तरह से प्रभावित करती हैं?

बरसों से ये आरोप लगता रहा है कि मीडिया की मुख्यधारा में ख़ूबसूरती के ऐसे पैमाने गढ़ दिए गए हैं जो क़ुदरती तौर पर असंभव हैं.

मशहूर हस्तियों की तस्वीरें बनावटी तरीके से ख़ूबसूरत बनाकर पेश की जाती हैं. दुबली-पतली मॉडल की तस्वीरों को दुनिया को छरहरी काया का प्रतीक बताया जाता है.

ऐसे में सोशल मीडिया पर काट-छांटकर या एडिट कर के जो तस्वीरें पेश की जाती हैं, वो लोगों की सोच पर गहरा असर डालती हैं.

हालांकि, सोशल मीडिया के सही इस्तेमाल से हम इन तस्वीरों को देखकर ख़ुद को अच्छा भी महसूस करा सकते हैं या कम से कम ख़राब एहसास होने से रोक सकते हैं.

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इमेज कैप्शन, देखने में ये आया है कि इंस्टाग्राम जैसे ऑनलाइन माध्यमों पर तस्वीरें देखने से अपने शरीर के बारे में नकारात्मकता बढ़ती है.

दिमाग पर पड़ता है असर

सोशल मीडिया अभी ज़्यादा पुरानी चीज़ नहीं. तो, इसके असर को लेकर हुई रिसर्च भी अभी ज़्यादा पुरानी नहीं हैं. इसलिए इन रिसर्च के आधार पर किसी नतीजे पर पहुंचना ठीक नहीं होगा. पर, इन रिसर्च से हमें कुछ इशारे ज़रूर मिल जाते हैं.

मसलन, हम ये तो नहीं साबित कर सकते कि किसी के लगातार फ़ेसबुक देखने से उसके अंदर नकारात्मक भाव पैदा होते हैं. पर, ये पता ज़रूर चल जाता है कि लगातार फ़ेसबुक में उलझे रहने वाले लोग अपने आप को ख़ूबसूरत दिखाने को लेकर परेशान रहते हैं.

सोशल मीडिया पर दूसरों की अच्छी तस्वीरें देखकर, लोग ख़ुद को कमतर समझने लगते हैं. इंस्टाग्राम और दूसरे प्लेटफ़ॉर्म पर दूसरों की अच्छी तस्वीरें ऐसा असर डालती हैं कि इससे लोगों की ख़ुद के बारे में सोच नेगेटिव होने लगती है.

सोशल मीडिया पर सिर्फ़ नज़र डालने का अलग असर होता है. और अगर आप सेल्फ़ी लेकर उसे एडिट कर के ख़ुद को बेहतर बनाकर दुनिया के सामने पेश करते हैं, तो उसका मानसिक असर होता है.

क्योंकि आप सेलेब्रिटी या फिर उन लोगों से प्रभावित होते हैं, जो आप की नज़र में ख़ूबसूरत या हैंडसम हैं.

रिसर्च से ये पता चलता है कि हम किससे तुलना करते हैं, ये अहम पहलू है.

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हीन भावना

सिडनी की मैक्वेरी यूनिवर्सिटी की जैस्मिन फार्दुले ने इस बारे में रिसर्च की है.

जैस्मिन कहती हैं कि, ''लोग अपनी तुलना इंस्टाग्राम पर अपलोड की गई तस्वीरों से करने लगते हैं. अक्सर ऐसे लोग ख़ुद को कमतर आंकते हैं.''

जैस्मिन ने यूनिवर्सिटी की 227 छात्राओं पर इस बारे में सवाल पूछे. उन्होंने बताया कि वो अपने आस-पास के लोगों से तुलना में ख़ुद को कम ख़ूबसूरत पाती हैं.

सेलेब्रिटीज़ के मुक़ाबले भी वो ख़ुद को कमतर समझती हैं. जिन लोगों को ये छात्राएं बहुत कम जानती थीं, उन्हें लेकर हीनभावना ज़्यादा थी.

जैस्मिन कहती हैं कि हम जिन लोगों के बारे में ज़्यादा जानते हैं, उनकी असली ख़ूबसूरती से वाक़िफ़ होते हैं.

वहीं, जिनसे हम दूर होते हैं, उनकी ख़ूबसूरती को लेकर अपने मन में वहम पाल लेते हैं. जबकि सोशल मीडिया पर अक्सर लोग ख़ुद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं.

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इमेज कैप्शन, सैलिब्रिटी की तरह दिखने की चाहत महिलाओं में नकारात्मकता पैदा करती है.

नकारात्मक असर

हालांकि सोशल मीडिया की हर तस्वीर आप पर नेगेटिव असर डाले, ये भी ज़रूरी नहीं.

बहुत से लोग ख़ुद की वर्ज़िश करते हुए तस्वीरें सोशल मीडिया पर बहुत डालते हैं. कई बार ये तस्वीरें सच्ची होती हैं, तो कई बार दिखावा भी.

इस बारे में ब्रिटेन की ब्रिस्टॉल यूनिवर्सिटी की एमी स्लेटर ने 2017 में रिसर्च की थी. एमी ने यूनिवर्सिटी की 160 छात्राओं से बात की.

जिन छात्राओं ने सोशल मीडिया पर केवल एक्सरसाइज़ करने वाली तस्वीरें देखीं, उनके ज़हन पर ऐसी तस्वीरों का नकारात्मक असर हुआ. वहीं, जिन्होंने प्रेरणा देने वाले बयान पढ़े, जैसे कि 'तुम जैसे भी हो अच्छे हो', उनके ऊपर नेगेटिव असर कम हुआ. वो अपने शरीर को लेकर हीनभावना की शिकार नहीं हुईं.

इस साल आई एक और रिसर्च में 195 युवा महिलाओं को उनकी तारीफ़ करने वाले पोस्ट दिखाए गए. इनमें से कुछ को महिलाओं के बिकनी पहने हुए, या एक्सरसाइज़ वाली पोज़ देती तस्वीरें दिखाई गईं.

कुछ युवतियों को क़ुदरत की ख़ूबसूरती की तस्वीरें दिखाई गईं. जिन महिलाओं को बिकनी वाली या फ़िटनेस का प्रचार करने वाली तस्वीरें दिखाई गईं, उन युवतियों पर इन तस्वीरों का अच्छा असर पड़ा. वो ख़ुद की काया से संतुष्ट नज़र आईं.

एमी स्लेटर कहती हैं कि, 'सोशल मीडिया की कुछ तस्वीरें लोगों पर अच्छा असर भी डालती हैं.'

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इमेज कैप्शन, सोशल मीडिया पर प्रेरणादायक वक्तव्य लोगों को अपने प्रति अच्छा अहसास कराता है.

जो बॉडी पॉज़िटिव तस्वीरें लोगों पर अच्छा असर छोड़ गईं, वो भी शरीर पर ही ज़ोर देती हैं. दिक़्क़त इसी बात की है. औरतों के शरीर, उनकी छरहरी काया पर ही ज़ोर ज़्यादा है. ऐसे में हर युवती अपनी तुलना दूसरों से कर के ख़ुद को कमतर या बेहतर आंकने पर मजबूर होती है.

यानी कोई अगर ख़ुद को ये लिख कर पेश करता है कि, 'मैं ख़ूबसूरत हूं.', तो ये सोशल मीडिया पोस्ट देखने वाले ख़ुद के बारे में किए गए कमेंट पर ध्यान देते हैं. अगर लोगों ने इतने अच्छे कमेंट नहीं किए, तो उसका नकारात्मक असर होता है.

सेल्फ़ी वाला इश्क़

लोगों में सेल्फ़ी लेने का ख़ूब चलन है. कहीं भी हों, सेल्फ़ी लेकर उसे अपने इंस्टाग्राम या फ़ेसबुक पेज पर डालने का शगल ख़ूब है. बहुत से लोग असली तस्वीरों को बनावटी तरीक़ों से सजाकर भी पोस्ट करते हैं.

टोरंटो की यॉर्क यूनिवर्सिटी की जेनिफ़र मिल्स ने सेल्फ़ी के शौक़ीनों के बीच एक प्रयोग किया. उन्होंने छात्राओं के एक समूह से अपनी तस्वीरें लेकर फ़ेसबुक या इंस्टाग्राम पर डालने को कहा. कुछ छात्राओं को केवल एक तस्वीर लेने की इजाज़त थी. वहीं, दूसरी कुछ छात्राओं को मनचाही तादाद में सेल्फ़ी लेने की छूट थी. वो चाहें तो अपनी सेल्फ़ी को एडिट भी कर सकती थीं.

जेनिफर और उनके सहयोगियों ने देखा कि सेल्फ़ी लेने वाली ज़्यादातर युवतियों को अपनी ख़ूबसूरती पर भरोसा नहीं था. जिन्हें फोटो में छेड़खानी की इजाज़त थी, वो भी ख़ुद को कमतर ही समझ रही थीं. उन्हें शिकायत थी कि वो दूसरों जैसी ख़ूबसूरत क्यों नहीं.

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इमेज कैप्शन, जब सर्वे में हिस्सा लेने वालों को स्वस्थ शरीर वाले चित्र दिखाए गए तो उन्हें अपनी काया को लेकर भी अच्छा महसूस हुआ.

इनमें से कई छात्राओं की दिलचस्पी इस बात में ज़्यादा थी कि उनकी तस्वीरों को कितने लाइक मिले. या फिर वो ये जानना चाहती थीं कि तस्वीर अच्छी आई है या नहीं. तभी वो इसे पोस्ट करेंगी.

जेनिफ़र कहती हैं कि, 'सभी छात्राएं अपने लुक्स को लेकर सशंकित दिखीं. वो ख़ूबसूरत दिख रही हैं या नहीं, इस पर बहुत ज़ोर था. इसीलिए लोग जल्द ही एक के बाद एक दूसरी सेल्फ़ी लेने लगते हैं.'

आत्मविश्वास में कमी

2017 में आई एक रिसर्च में कहा गया था कि जो लोग सेल्फ़ी लेने के बाद उसे सजा-संवारकर अपलोड करने में ज़्यादा वक़्त बिताते हैं, वो ख़ुद को लेकर आत्मविश्वास की कमी के शिकार होते हैं.

पर, सोशल मीडिया पर हो रही रिसर्च अभी ज़्यादा पुरानी नहीं हुई हैं. ख़ुद सोशल मीडिया का दौर ही ज़्यादा पुराना नहीं हुआ. इसलिए पक्के तौर पर इसके असर को लेकर दावे करना ठीक नहीं होगा.

फिर, ज़्यादातर रिसर्च महिलाओं पर ही केंद्रित रही है. हालांकि सोशल मीडिया और मर्दों को लेकर हुई रिसर्च के नतीजे भी इसी तरफ़ इशारे करते हैं.

जो पुरुष फिटनेस से जुड़ी तस्वीरें ज़्यादा देखते हैं, वो ख़ुद के बदन को लेकर नकारात्मक सोच रखते हैं.

जैस्मिन कहती हैं कि सोशल मीडिया को लेकर अभी और रिसर्च होनी चाहिए. तभी इसके असर को लेकर हम पक्के तौर पर किसी नतीजे पर पहुंच सकेंगे.

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इमेज कैप्शन, सबसे अच्छी सलाह है कि अपने फ़ोन को किनारे रख दें.

फ़िलहाल आप क्या करें?

अगर आप अपने बारे में बुरा नहीं महसूस करना चाहते, तो अपना फ़ोन या आई-पैड रख दीजिए. किसी और काम में वक़्त लगाइए. ऐसे काम करिए, जिसका किसी की ख़ूबसूरती या ताक़त से कोई वास्ता न हो.

दूसरी बात ये कि आप ये देखिए कि सोशल मीडिया पर आप किसे फ़ॉलो करते हैं. कहीं आप की टाइमलाइन पर बेवजह की तस्वीरों की बाढ़ तो नहीं लगी रहती. ऐसा है, तो सोशल मीडिया एकाउंट में आप जिन्हें फ़ॉलो करते हैं, उन पर फिर से ग़ौर कीजिए.

अब पूरी तरह से सोशल मीडिया से दूरी बनाना तो नामुमकिन है. लेकिन, आपकी टाइमलाइन पर क़ुदरती ख़ूबसूरती की तस्वीरें, खान-पान की अच्छी फोटो और जानवरों की दिलकश पिक्चर भी आएं, तो आप बेहतर महसूस करेंगे.

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