हाथियों की कनसुनी करने से उनको मिलती सुरक्षा

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- Author, रेचेल नुवेर
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
संकट में पड़े वन्य जीवों की संरक्षा एक खर्चीला और समय लेने वाला काम है. लेकिन नई टेक्नोलॉजी से जानवरों की रक्षा करना और शिकारियों को पकड़ना आसान हो सकता है.
सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक में वर्षा वनों को साफ कर एक जगह से धीमे स्वर में गड़गड़ाहट गूंजती है. पेड़ों के पीछे से भी कभी-कभी जंगल को चीरती हुई दहाड़ और कानों में गूंजने वाला विलाप निकलता है.
ये आवाज़ें इस ऊष्णकटिबंधीय भू-दृश्य पर बसने वाले जंगली हाथियों की आवाजें हैं. घने पेड़े-पौधों से छुपे ये हाथी पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका के सवाना में मिलने वाले अपने भाईयों से छोटे और अधिक रहस्यमय होते हैं.
आमतौर पर ये दिखने से अधिक सुनाई देते हैं, लेकिन बढ़ते हुए शिकार से कम होती इनकी आबादी ने इन्हें संकट में डाल दिया है.
अब इन छुपे रुस्तम हाथियों द्वारा घने जंगल में एक-दूसरे से सम्पर्क में रखने के लिए निकाली गई आवाज़ें शोधकर्ताओं को इन जीवों को सुरक्षित रखने का उपकरण प्रदान कर रही हैं.
इन हाथियों की आवाज़ों की गुत्थी सुलझाने में लगी एक टीम में शामिल कॉर्नेल विश्वविद्यालय के जीव विज्ञानी पीटर रेगे बताते हैं, "हमारा उद्देश्य पृथ्वी के दूसरे सबसे बड़े ऊष्ण कटिबंधीय वर्षा वनों में भ्रमण करने वाली एक प्रमुख प्रजाति, इन जंगली हाथियों को बेहतर ढंग से समझना और उनकी रक्षा करना है. अस्तित्व बनाए रखने के उनके अवसर में सुधार के लिए हम टेक्नोलॉजी का प्रयोग कर रहे हैं और इस तरह उनके वन की जैव विविधता को हम संरक्षित कर रहे हैं."

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हाथियों की बातचीत
हाथियों का अस्तित्व बचाने के लिए काम करने वाली एक कंपनी कंज़र्वेशन मेट्रिक्स के साथ रेगे और उनके सहयोगियों ने मिलकर टेक्नोलॉजी का प्रयोग करना शुरू किया.
इनका उद्देश्य हाथियों की स्थिति का पता लगाना - इनकी हत्या करने वाले शिकारियों को ढूंढना- जिससे कि जानवरों को सुरक्षित रखा जा सके. रीग और उनके सहयोगियों ने मध्य अफ्रीका के जंगलों से नौ लाख घंटों की रिकॉर्डिंग एकत्र की है जिनमें से हज़ारों घंटों की रिकॉर्डिंग में हाथियों की बातचीत के अंश हैं.
जैसे कि इन लोगों ने पाया कि छोटी आवृत्ति वाली गड़गड़ाहट की आवाज़ समूह को एक दूसरे के संपर्क में रखती है जबकि लम्बी आवृत्ति वाली बार-बार होने वाली गड़गड़ाहट अभिवादन का संकेत है.
इस तरह की अन्तर्दृष्टि हाथियों के संचार तंत्र के बारे में सुराग देती है, बल्कि सेंसरों द्वारा हाथियों की चेतावनी की आवाज़ या शिकारियों द्वारा की जाने वाली बंदूक की आवाज़ और बातचीत से वन रक्षकों को कुछ गड़बड़ होने की अग्रिम चेतावनी भी दे देती है.
रेगे का कहना है,"अभी यह देखना बाकी है कि क्या टेक्नोलॉजी अर्थपूर्ण भू-दृश्य के स्तर पर इनकी सुरक्षा संभव कर पाएगी - दसियों हजार किलोमीटर में फैले ऐसे क्षेत्र में जहां आम तरीके काम ही नहीं करते."
लेकिन शोधकर्ताओं ने शुरूआत बहुत अच्छी की है. उनके सबसे बड़े वर्तमान प्रोजेक्ट में 50 सेंसरों के एक बड़े ग्रिड की मदद से 1243 वर्ग किलोमीटर (480 वर्ग मील) में फैला जंगल शामिल है जिसमें हर तीन-चार महीने में होने वाली रिकॉर्डिंग 20 लाख गानों और आवाज़ों के बराबर है.
डीप लर्निंग नामक आर्टिफिशियल इंटलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से इतनी अधिक रिकॉर्डिंग और हाथियों की लगभग 15 हज़ार आवाज़ों का विश्लेषण करीब-करीब 22 दिनों में किया जा सकता है.

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रेगे और उनके सहयोगी अब तत्काल जानकारी के लिए नमूनों का परीक्षण कर रहे हैं. अपने एआई फॉर अर्थ यानी पृथ्वी के लिए आर्टिफिशियल इंटलिजेंस कार्यक्रम की तरह ही 200 अन्य शोधों को मदद करने वाली माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के मुख्य पर्यावरण अधिकारी लुकास जोप्पा बताते हैं, "एआई इन सब चीज़ों में हम लोगों को बहुत अधिक कार्यकुशल बना देती है. कोई भी इंसान बैठकर एक ऐसी भाषा में गाए गए उन 20 लाख गीतों को नहीं सुन सकता जिसकी भाषा ही वो नहीं समझता."
आर्टिफिशियल इंटलिजेंस में हो रही प्रगति विशेष रूप से हमें नए तरह के उपकरण प्रदान कर रही है जिनसे वन्यजीवों के अध्ययन और उनकी सुरक्षा का हमारा तरीका ही मूलभूत रूप से बदल जाएगा.
संरक्षणकर्ता अब अधिक से अधिक टेक्नोलॉजी की क्षमता का सहारा लेकर अकल्पनीय रूप से अपने कार्य का विस्तार कर रहे हैं. जोप्पा के अनुसार आर्टिफिशियल इंटलिजेंस में हो रही प्रगति विशेष रूप से हमें नए तरह के उपकरण प्रदान कर रही है जिनसे वन्यजीवों के अध्ययन और उनकी सुरक्षा का हमारा तरीका ही मूलभूत रूप से बदल जाएगा.
वे कहते हैं, "हम बहुत लम्बे समय से मशीन लर्निंग और संरक्षण की बात कर रहे थे. लेकिन पिछले कई वर्षों में हमने न केवल कोर लेवल एल्गॉरिथम - डीप न्यूरल नेटवर्क जैसी चीजों - में अविश्वसनीय प्रगति की है बल्कि संरक्षण के क्षेत्र में एल्गॉरिथम प्रशिक्षण के मामले में भी हम बेहतर हुए हैं."
मशीन लर्निंग और अन्य प्रकार के आर्टिफिशियल इंटलिजेंस हमें कैमरा ट्रैप, ध्वनि रिकॉर्डरों, सेंसरों, मानव निर्मित उपग्रहों और जंगलों में काम करने वाले लोगों से बड़े पैमाने पर मिलने वाले आंकड़ों के विश्लेषण का एक माध्यम उपलब्ध कराते हैं.
इस सारी जानकारी का विश्लेषण यदि कोई व्यक्ति करने बैठ जाए तो बहुत समय लग जाएगा. लेकिन आर्टिफिशियल इंटलिजेंस की मदद से यह केवल कुछ बटन दबाने से ही पूरा हो जाएगा.

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आर्टिफिशियल इंटलिजेंस
एआई संरक्षणकर्ताओं को वह कुशलता और अनुपात उपलब्ध कराती है जिससे प्राकृतिक संसार में उन्हें अभूतपूर्व अन्तर्दृष्टि मिल जाती है, और इससे उनके कार्यक्षेत्र की पुरानी समस्या - जनधन की कमी - भी दूर हो जाती है.
हेलसिंकी विश्वविद्यालय के संरक्षण वैज्ञानिक एनरिको डी मिनिन इसके बारे में कहते हैं, "यदि संरक्षण के लिए संसाधन पर्याप्त होते, तो हम जैव विविधता के संकट का सामना न कर रहे होते."
डी मिनिन ऐसे मशीन लर्निंग एल्गोरिथम बना रहे हैं जो सोशल मीडिया पर अवैध वन्य जीव व्यापार से संबंधित पोस्ट की पहचान करने की क्षमता रखते हैं.
वे नैचुरल लेंग्वेज प्रोसेसिंग, जो कि एआई का एक ऐसा रूप है जिससे मशीनें लिखित या मौखिक भाषा से जानकारी निकाल सकती हैं, का प्रयोग इंस्टाग्राम और ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्मों पर आए संदेशों की भावना समझने के लिए कर रहे हैं.
जैसे कि आरम्भ में इस पद्धति से चीन और वियतनाम जैसे स्थानों में गैंडे के सींग के प्रयोग के बारे में आमराय जानने में मदद मिलेगी. उसके बाद इस जानकारी का उपयोग ऐसे प्रचार डिजाइन करने में किया जा सकेगा जिससे गैंडे के सींगों की मांग घटाई जा सके.
भविष्य में शायद कानून लागू करने संबंधी एजेन्सियां भी इस कार्यक्रम का उपयोग कर ऐसे देशों की पहचान कर सकेंगी जहां जानवरों का शिकार होता है और जहां शिकार के उत्पादों को प्रयोग में लाया जाता है. इससे इस व्यापार में उभरने वाले ट्रेंड यानी प्रचलन की पहचान हो सकेगी.

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डी मिनिन बताते हैं, "मौजूदा काम में एजेन्सियों को सब कुछ हाथ से करना पड़ता है. एआई की मदद से हम अगले स्तर पर पहुंच जाएंगे जिसमें तुरंत संकट का विश्लेषण किया जा सकेगा."
इससे महंगे और जटिल ट्रैकिंग उपकरण लगाए बिना ही जानवरों की गतिविधि पर नज़र रखने की शोधकर्ताओं की क्षमता में क्रान्ति आ रही है.
यहां से संभावनाएं विस्तृत ही होंगी. उदाहरण के लिए वाइल्ड मी नामक लाभ निरपेक्ष संगठन चीता, जिराफ, जेब्रा, ह्वेल शार्क और अन्य जीवों की कैमरा तस्वीरों और नागरिक वैज्ञानिकों द्वारा खींचे गए फोटो से कम्प्यूटर विज़न एल्गोरिथम का उपयोग कर तुरंत पहचान बता रहा है. इससे महंगे और जटिल ट्रैकिंग उपकरण लगाए बिना ही जानवरों की गतिविधि पर नज़र रखने की शोधकर्ताओं की क्षमता में क्रान्ति आ रही है.
सिएटल में वल्कान इंक के लिए संरक्षण प्रौद्योगिकी के अगुआ टेड श्मिट कहते हैं, "मेरे विचार में मशीन लर्निंग में एक ऐसी गतिशीलता है जो संरक्षण के लिए वाकई बहुत लाभकारी है."
इस तरह की कई पहलें माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और अन्य कई लाभ अर्जित करने वाली टेक्नोलॉजी कंपनियों की अगुआई में या उनकी मदद से हो रही हैं.
जैसे कि माइक्रोसॉफ्ट अपने एआई फॉर अर्थ कार्यक्रम के माध्यम से खून चूसने वाले कीड़ों को एकत्र करने, आनुवांशिक विश्लेषण में हुई प्रगति के माध्यम से उनके नमूनों की जांच करने और फिर रोग की उपस्थिति, कीड़ों के भोजन के तरीके और अन्य बातों के बारे में जानकारी देने वाले रोबोटिक फील्ड एजेन्ट बनाकर उनका प्रयोग कर रही है.
श्मिट बताते हैं, "ये लाभ अर्जित करने वाली कंपनियां एक प्लेटफॉर्म उपलब्ध करा सकती हैं. तत्पश्चात हम और अन्य लोग इनका प्रयोग कर नवीनतम हल दे सकते हैं."

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मिल रहा है फायदा
संरक्षण के लाभ मिलने आरम्भ हो गए हैं. जैव विविधता से संबंधित आईनेचुरलिस्ट नामक दुनिया के एक सबसे बड़े नागरिक विज्ञान निगरानी एप्लिकेशन पर कोई भी कहीं से भी एक पौधे या जानवर की तस्वीर पोस्ट कर सकता है और विशेषज्ञ उसकी पहचान करते हैं.
सहयोग के इस उपकरण की मदद से विज्ञान को कई नई प्रजातियों की खोज में सफलता मिली है. इसके अतिरिक्त वर्तमान प्रजातियों की विभिन्न उपप्रजातियों का भी महत्वपूर्ण विस्तार हुआ है. लेकिन इसका प्रयोग करने वालों की संख्या लाखों में होने के कारण पहले विशेषज्ञों को पहचान बताने में औसतन 18 दिन लगते थे.
कॉर्नेल विश्वविद्यालय और कैल्टेक के सहयोग से आईनेचुरलिस्ट ने ऐप में एक कम्प्यूटर विज़न एल्गोरिथम बना दिया जो लगभग 90 प्रतिशत सटीकता से किसी भी प्रजाति के जीनस यानी वंश की पहचान कर लेता है.
तथा तस्वीर कहां और दिन के किस समय ली गई है, इस आधार पर ऐप का उपयोग करने वालों के सामने शीर्ष पांच प्रजातियों के सुझाव रखता है. तत्पश्चात नागरिक वैज्ञानिक या विशेषज्ञ मानवीय तर्क का प्रयोग कर कुछ ही पलों में सही उत्तर प्राप्त कर लेते हैं.
कार्यक्रम पूर्ण होने पर, इसमें सही स्थान पर वन रक्षकों की टोलियां भेजने के लिए मैनेजर को निर्देश देने की क्षमता भी आ जाएगी.

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अन्य लोग नई खोज करने के लिए एआई का प्रयोग नहीं कर रहे हैं बल्कि उन वन्य जन्तुओं की सुरक्षा में मदद के लिए प्रयोग कर रहे हैं जिनके अस्तित्व के बारे में हमें जानकारी है. दक्षिणी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर आर्टिफिशियल इंटलीजेंस एंड सोसायटी में शोधकर्ता "पॉज़" (प्रोटेक्शन असिस्टेंट फॉर वाइल्डलाइफ सिक्योरिटी) नामक एक ऐसा उन्नत एल्गोरिथम निखार रहे हैं जो भू-दृश्यों और जानवरों की गतिविधि के विश्लेषण के साथ-साथ पूर्व में हुई शिकार की गतिविधियों तथा अन्य कारकों से संबंधित जानकारी भी उपलब्ध कराता है जिससे घुसपैठ के संभावित स्थानों का पूर्वानुमान लगाया जा सके.
कार्यक्रम पूर्ण होने पर, इसमें सही स्थान पर वन रक्षकों की टोलियां भेजने के लिए मैनेजर को निर्देश देने की क्षमता भी आ जाएगी.
अब वनों में तैनात वन रक्षकों को और अधिक मजबूती प्रदान करने के लिए अधिक से अधिक सुरक्षित क्षेत्रों में सॉफ्टवेयर समाधान प्रयोग में लाए जा रहे हैं. एक प्रचलित उदाहरण अर्थरेंजर है.
यह वल्कान कंपनी द्वारा बनाया गया एक पार्क प्रबन्धन प्रोग्राम है जो जानवरों के पट्टों, रेंजरों के रेडियो, सेंसरों, वाहनों, ड्रोनों तथा अन्य माध्यमों से एकत्र किए गए वास्तविक समय में मिलने वाले आंकड़ों यानी रीयल टाइम डाटा का विश्लेषण करता है.
इसी तरह का एक प्रोग्राम स्पेशियल मॉनीटरिंग एंड रिपोर्टिंग टूल - स्मार्ट - है जिससे वन्यजीव मैनेजरों को गश्त की बेहतर निगरानी, मूल्यांकन और योजना बनाने में मदद मिले. जोप्पा कहते हैं, "इन साधनों में हुए सुधार को कोड की केवल कुछ लाइनें जोड़कर फील्ड यानी ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले लोगों तक पहुंचाया जा सकता है."
एआई का प्रयोग अन्य प्रौद्योगिकियों में पहले से विद्यमान समस्याओं को सुलझाने में भी हो रहा है. वर्ष 2012 में मीडिया में तथा जनसम्पर्क प्रचार विज्ञापनों में यह घोषणा कर दी गई कि अफ्रीका में संरक्षणकर्ताओं को आखिरकार शिकारियों को रोकने का एक उपाय मिल गया है : ड्रोन.
इन समाचारों में यह दावा किया गया कि थर्मल इमेजिंग यानि ताप प्रतिबिम्बन तथा नाइट विज़न टेक्नोलॉजी यानी रात में देखने की क्षमता से लैस यूएवी यानी अनमैन्ड एरियल वैहिकिल का उपयोग वन्यजीव पार्कों के प्रबन्धक उन घुसपैठियों की फौरन पहचान करने तथा उन्हें रोकने में कर रहे हैं जो हाथियों या गैंडों के शिकार में लगे हैं.

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ऊबड़-खाबड़ भूभाग में टेक्नोलॉजी विफल
अन्य महत्वपूर्ण प्रयासों में लगे संसाधन तथा ध्यान को हटाकर कीनिया, दक्षिण अफ्रीका, नामीबिया और अन्य देशों में ड्रोन कार्यक्रमों पर ध्यान लगाया गया.
लेकिन जो बात समाचारों में नहीं आई वो यह थी कि ये कार्यक्रम आमतौर पर विफल रहे. अफ्रीका के ऊबड़-खाबड़ भूभाग में यह नाजुक टेक्नोलॉजी विफल रही.
इससे अधिक मजबूत मॉडल इतने महंगे थे कि पार्क उन्हें नहीं खरीद सकते थे. अन्त में जब यूएवी काम भी कर पाए तो शिकारी इन्हें चकमा देने में कामयाब रहे क्योंकि एक छोटे आकार के देश के बराबर बड़े भूभाग में फैले इन सुरक्षित इलाकों में उन्हें पकड़ पाना बहुत मुश्किल था.
श्मिट कहते हैं, "पार्कों पर उन छुपे हुए खर्चों का भी दबाव पड़ा जिसमें लोग कोई उपकरण लेकर आ जाते थे, वहां वनकर्मियों का काफी वक्त भी खराब करते थे और अभियान में बाधा पड़ती थी. प्रबन्धकों के स्तर से लेकर काफी जगह त्रुटियां हुईं और इससे लोग टेक्नोलॉजी के विरोध में आ गए."
अन्त में सभी ड्रोन परियोजनाएं बंद कर दी गईं.
लेकिन विफलता की घोषणाएं समय से पूर्व की साबित हुईं. श्मिट और अन्य विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा नहीं है कि शिकार-रोधी अभियानों में ड्रोन की कोई भूमिका न हो.
बात केवल इतनी थी कि उन्हें समय से पहले तैनात कर दिया गया था. प्रारम्भिक उतावलेपन के सात साल बाद अब संरक्षण में उनका प्रयोग अधिक उत्साहवर्धक लग रहा है. उपकरण सस्ते हो रहे हैं और जो फिल्म आंकड़े के रूप में उपलब्ध हो रही है उसे पॉज़, स्मार्ट और अर्थरेंजर जैसे प्रोग्राम से जोड़ा जा सकता है.
लेकिन ड्रोन के साथ एक अतिरिक्त चुनौती भी है : पहचान की प्रक्रिया को ऑटोमैटिक यानी स्वचालित कैसे बनाया जाए.
पायलट उड़ाते हैं ड्रोन
एक दक्षिण अफ्रीकी कंपनी, यूएवी एंड ड्रोन सोल्यूशन्स (यूडीएस) ने शिकार-रोधी अभियानों में ड्रोन की प्रारम्भिक विफलता का झटका झेल लिया और अब अफ्रीका महाद्वीप में टेक्नोलॉजी का प्रयोग करने वाली मुख्य कंपनी बन गई है.
कई पार्कों में उनके ड्रोन पायलट उड़ते हैं लेकिन ऐसा करने के लिए उन्हें सारी रात जागकर लाइव वीडियो देखना पड़ता है और स्वयं ही घुसपैठियों को देखकर पहचानने का प्रयास करना पड़ता है. यह काम काफी उबाऊ, त्रुटिपूर्ण और समय लेने वाला है.
दक्षिणी कैलीफोर्निया में कम्प्यूटर स्नातक की एक छात्रा एलिजाबेथ बॉन्डी बताती हैं, "हम इसे स्वतः करने का एक तरीका ढूंढना चाहते हैं क्योंकि मानवीय रूप से इसे करना एक बहुत कठिन प्रक्रिया है."
ऐसा करने के लिए जोप्पा सहित बॉन्डी और कम्प्यूटर वैज्ञानिकों का एक दल स्पॉट नामक डीप लर्निंग सिस्टम यानी प्रणाली बनाने में जुटा है जिससे ड्रोन द्वारा लिए गए थर्मल वीडियो में स्वतः ही इंसान और जानवर की पहचान हो सके.
यह सुनने में सीधा सा काम लगेगा. लेकिन प्रोग्राम को इसके लिए तैयार करना अविश्वसनीय रूप से चुनौती भरा है क्योंकि इसमें बहुत बड़े पैमाने पर आंकड़ों की आवश्यकता है.
जोप्पा बताते हैं, "कुछ सीखने के लिए आपको सिखाया जाना चाहिए और कम्प्यूटरों को सिखाने के लिए आपके पास अतीत के उदाहरण होने चाहिए."
बॉन्डी ने यूडीएस से प्राप्त जंगल के लगभग 60 वीडियो में कुछ विशेष वस्तुओं को चिन्हित कर स्वयं उनका नाम रखने से आरम्भ किया. छह महीने बाद उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर लगभग 180,000 जानवरों और शिकारियों का मिलान कर लिया था.
लेकिन संरक्षण से जुड़ी धर्मार्थ संस्था एयर शेफर्ड के साथ मिलकर बोत्स्वाना में फील्ड ट्रायल यानी जंगल में ही परीक्षण के बाद उन्हें यह अहसास हुआ कि 180,000 आंकड़े लगभग पर्याप्त नहीं थे : यह प्रोग्राम बहुत सारे गलत सकारात्मक परिणाम दे रहा था और केवल 40 प्रतिशत शिकारियों को ही पकड़ पा रहा था.
लेकिन स्वयं और वीडियो को चिन्हित करने समय और लागत दोनों के हिसाब से निषेधक था, इसलिए टीम ने एयरसिम का प्रयोग कर अफ्रीकी सवाना का एक अत्यन्त उन्नत सिमुलेशन यानी छद्म रूप तैयार किया, जैसा कि एक ड्रोन को नजर आता है.
इस रूप में शिकारी भी थे, जानवर भी थे तथा झाड़ियों और वृक्षों के जीवन्त रूप भी थे. इन सबके उचित ताप हस्ताक्षर भी इसमें उपलब्ध थे. प्रयोगशाला के परीक्षणों में यह पाया गया कि एयरसिम में प्रशिक्षित ड्रोन अब 80 प्रतिशत शिकारियों की पहचान कर लेते हैं.
बॉन्डी और उनके सहयोगियों की योजना पहचान की दर में सुधार जारी रखना है और अन्त में इस प्रोग्राम को पॉज़ तथा प्रबन्धन के अन्य तरीकों से समाहित करना है.
दस या बीस वर्षों में आज के मुकाबले एआई संरक्षणकर्ताओं को कुछ मूलभूत लाभ प्रदान कर सकता है. संभावना यह है कि आसमान से किए गए सर्वेक्षणों के माध्यम से वे लोग बहुत सटीक और नियमित तौर पर वन्यजीवों की गिनती कर सकेंगे.
अंतरिक्ष से उपग्रह मछली पकड़ने वाली नौकाओं पर निगरानी रख यह सुनिश्चित कर सकेंगे कि वे सुरक्षित क्षेत्रों में तो नहीं जा रहे हैं या फिर पेयर्ड ट्रॉलिंग जैसी अवैध गतिविधियों में तो नहीं लगे हैं.
तथाकथित स्मार्ट पार्क रेंजरों को स्वतः ही वास्तविक समय में चेतावनी भेजने के लिए कैमरों, ड्रोन, सेंसरों, बाड़ों तथा चलित रोबोट का प्रयोग करेंगे.
ब्रिटेन के लिवरपूल जॉन मूर्स विश्वविद्यालय में जीवविज्ञानी और कंज़र्वेशन ड्रोन्स के संस्थापक निदेशक सर्जे विच बताते हैं कि विशेष रूप से अफ्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया के राष्ट्रीय उद्यानों और शिकार के हिसाब से संवेदनशील स्थानों के लिए इस तरह के समाधानों की बढ़ती संख्या के साथ ही इनमें कुछ कमियां भी हो सकती हैं.
उनका कहना है, "इस तरह के विस्तृत जंगली क्षेत्र पर बहुत अधिक प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी हो सकती है जिससे इन क्षेत्रों में जाने का कुछ आनन्द कम हो सकता है. लेकिन मेरा मानना है जब जानवरों और उनके आवासों की सुरक्षा की बात आती है तो अत्यन्त निगरानी और प्रबन्धन आवश्यक होता जाता है."
इसके बावजूद इसका यह अर्थ नहीं है कि केवल एआई ही वन्यजीवों को विलुप्त होने से और उनके आवासों को दुर्दशा तथा विकास से बचा सकता है.
इस संबंध में जोप्पा का मानना है, "फिर भी लोगों को संरक्षण की समस्या का समाधान ढूंढने की आवश्यकता है, ऐसा करने की जिसकी आवश्यकता के बारे में हम हमेशा से जानते थे."
इस इच्छाशक्ति के बिना दुनिया की सारी स्मार्ट मशीनें भी पर्याप्त नहीं होंगी.
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