हाथी पर सवारी से हुई थी प्रधानमंत्री पद पर इंदिरा की वापसी

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कौन थी इंदिरा नेहरू गाँधी? भारत की आयरन लेडी? या 'हिंदुस्तान की रानी' जैसा कि लंदन के कुछ अख़बार उनके बारे में लिखा करते थे? या फिर 'अम्मा' जिस नाम से करोड़ों दक्षिण भारतीय उन्हें पुकारा करते थे?
क्या इंदिरा 'दैट वुमेन' या 'वो औरत' थीं जिस नाम से उन्हें पाकिस्तान के डिक्टेटर याहिया ख़ाँ ने उन्हें पुकारा था या क्या वो हिटलर या मुसोलिनी की महिला संस्करण थीं, जैसा कि उनके विरोधी उनके बारे में कहा करते थे? इंदिरा गाँधी के बारे में कोई एक राय बनाना अब भी बहुत मुश्किल है.

इमेज स्रोत, Getty Images
आज़मगढ़ का उपचुनाव
कहा जाता है कि किसी भी शख़्स के चरित्र की पहचान विपरीत परिस्थितियों में ही होती है. ऐसा ही एक समय था, 7 मई, 1978, जब इंदिरा गाँधी ने सिर्फ़ अपने बूते पर आज़मगढ़ लोकसभा सीट का उप चुनाव कांग्रेस को जिताया था. ये वो समय था जब इंदिरा गाँधी की राजनीतिक ऑबेचुरी लिखी जा चुकी थी.
उस चुनाव में कांग्रेस की उम्मीदवार और इस समय पार्टी की वरिष्ठ नेता मोहसिना क़िदवई बताती हैं, ''जिस तरह से इंदिरा गाँधी ने मेरे चुनाव में काम किया था, वो किसी मामूली आदमी के बस का नहीं था. आज़मगढ़ में एक छोटी सी जगह थी फूलपुर जहाँ हमें एक दो घंटे गुज़ारने थे. दोपहर का वक्त था. आज़मगढ़ जैसी छोटी जगह में न कोई पानी था, न कोई रेस्तराँ और न ही कोई दूसरी सुविधाएं."

इमेज स्रोत, Getty Images
उन्होंने आगे कहा, "मैंने पीडब्ल्यूडी के गेस्ट हाउस में एक हफ़्ते पहले दो कमरे बुक करा रखे थे, दो घंटे के लिए. जब मैं एक दोपहर इंदिराजी को ले कर वहाँ पहुंची तो सारे कमरों में ताले बंद थे और वहाँ एक बूढ़ा चौकीदार बैठा हुआ था. वो कहने लगा 'कमरे तो ना खुली. मिनिस्टर साहब ठहरे हुए हैं यहाँ.' मैंने कहा बाबा तुम्हें मालूम है, कौन आया है? किस के लिए मैं कमरे खुलवा रही हूँ?' कहने लगा, 'को आवा है?' मैंने कहा इंदिरा गांधी आई है."
क़िदवई ने आगे कहा, "मैं आपको क्या बताऊँ. सुनते ही उसको जैसे करंट छू गया. तुरंत खड़ा हुआ और बोला मेरी नौकरी रहे या न रहे. उसने तुरंत इंदिराजी के लिए दोनों कमरे खोल दिए. ये जज़्बा था गरीबों का इंदिरा गाँधी के लिए. हम लोग वहाँ सराय में ठहरे हुए थे, ऐसी जगह जहाँ आज का मामूली कांग्रेस का वर्कर भी नहीं ठहर सकता. कई बार कार रुकवा कर मैं हैंड पंप से पानी चलाती थी और इंदिरा गांधी अपने मुंह पर पानी के कुछ छीटें मार कर आगे बढ़ जाती थीं."

इमेज स्रोत, Getty Images
हाथी पर बैठ कर बेलची गईं
इससे भी दस महीने पहले बिहार के एक गाँव बेलची में जब 11 दलितों की हत्या हुई थी, तो इंदिरा गाँधी बाढ़ के पानी की परवाह न करते हुए हाथी की पीठ पर चढ़ कर वहाँ पहुंची थीं.
उस यात्रा में उनके साथ गए बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री डॉक्टर जगन्नाथ मिश्र बताते हैं, ''इंदिरा गांधी के साथ सरोज खारपड़े, प्रतिभा सिंह और केदार पांडे भी थे. उन्होंने कहा कि वहाँ गाड़ी नहीं जा सकती. इंदिरा बोलीं, हम वहाँ पैदल जाएंगे, चाहे हमें वहां पहुंचने के लिए रात भर चलना पड़े. पहले वो जीप पर चलीं, वो कीचड़ में फंस गई. फिर उन्होंने ट्रैक्टर का सहारा लिया. थोड़ी देर बाद उसने भी जवाब दे दिया. वहाँ पर बाढ़ का पानी भरा हुआ था. तब उनके लिए एक हाथी लाया गया."
उन्होंने बताया, "जब इंदिरा बेलची पहुंचीं तो अँधेरा घिर आया था. उन्होंने पीड़ितों से बात कर उन्हें ढाढस बंधाया. यहीं से इंदिरा गाँधी की राजनीतिक वापसी की शुरुआत हुई.''
इस यात्रा का और दिलचस्प वर्णन मशहूर पत्रकार जनार्दन ठाकुर ने अपनी किताब 'ऑल द प्राइम मिनिस्टर्स मेन' में किया है.
ठाकुर लिखते हैं, ''जब बाढ़ का पानी शुरू हुआ तो इंदिरा गाँधी अपनी साड़ी पिंडलियों तक उठा कर चलने लगीं.. लेकिन तभी बाबू साहब ने उनके लिए हाथी मंगवा भेजा. केदार पांडे ने उनसे पूछा, 'आप हाथी पर चढ़ेंगी कैसे?' इंदिरा ने कहा, 'मैं चढ़ जाउंगी. मैं पहले भी हाथी पर बैठ चुकी हूँ.''
अगले ही क्षण वो हाथी की पीठ पर सवार थीं. लेकिन प्रतिभा सिंह को हाथी पर चढ़ने में डर लग रहा था. बड़ी मुश्किल से वो भी चढ़ीं और ज़ोर से इंदिरा की पीठ पकड़ कर बैठ गईं. जैसे ही हाथी ने चलना शुरू किया वहाँ मौजूद कांग्रेस कार्यकर्ता चिल्लाए, इंदिरा गाँधी की जय! हाथी की पीठ पर तीन घंटे चलने के बाद इंदिरा बेलची पहुंचीं.'

चिकमंगलूर की जीत
एक और उपचुनाव याद कीजिए. चिकमंगलूर, 1978, जब इंदिरा गाँधी जनता पार्टी के भारी विरोध के बीच कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल को हरा कर संसद में पहुंची थीं.
इंदिरा गांधी की जीवनीकार सागारिका घोष बताती हैं, 'चिकमंगलूर में एक नारा मशहूर था, 'एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर चिकमंगलूर.' जनता पार्टी ने इंदिरा गाँधी को हरवाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. इस पूरे उप चुनाव में इंदिरा गांधी ने रोज़ 18 घंटे चुनाव प्रचार किया और सिर्फ़ मूंगफली और फलों पर ही रहीं."
सागारिका घोष ने आगे कहा, "रात में वो जब भी किसी जगह पहुंचती, वो अपने पैरों के बीच टॉर्च फंसा कर उसका रुख अपने मुंह की तरफ़ कर देतीं ताकि लोग उनके चेहरे को देख पाएं. उनका स्टेमिना इतना था कि वो उस समय जीवित किसी भी भारतीय राजनेता से ज़्यादा तेज़ चल सकती थीं.'

इमेज स्रोत, Getty Images
सबसे पहले डि गॉल ने परखा था इंदिरा को
इंदिरा गांधी की प्रतिभा को सबसे पहले फ़्रांस के राष्ट्रपति चार्ल्स डि गॉल ने पहचाना था. 1968 में अमरीका जाते हुए इंदिरा गांधी एक दिन के लिए पेरिस में रुकी थीं. डि गॉल ने उनके सम्मान में दिन का भोज दिया था. पूरे भोज के दौरान इंदिरा उनसे फ़्रेंच में बात करती रहीं.
बाद में इंदिरा की मित्र और जीवनीकार पुपुल जयकर ने अपनी किताब, 'इंदिरा गांधी- अ बायोग्राफ़ी' में लिखा, ''उस भोज में मौजूद लक्ष्मीकांत जी ने मुझे बताया था कि डि गॉल पूरे समय इंदिरा को परखने की कोशिश कर रहे थे. भोज के बाद डि गॉल ने मुझसे कहा था, 'राजनीति में महिलाओं के आने के बारे में मेरी सोच थोड़ी दकियानूसी है. लेकिन आपकी प्रधानमंत्री में ग़ज़ब की ताकत है. उनमें कुछ ख़ास है. वो सफल राजनेता साबित होंगी.''
डि गॉल की मौत से कुछ समय पहले आंद्रे मालरो ने उनसे पूछा था, ''इंदिरा से पहली बार मिल कर आपको कैसा लगा था?''
डि गॉल का जवाब था, ''उनके नाज़ुक कंधों पर भारत का भाग्य टिका हुआ है, और वो उसके बोझ से दबे नहीं दिखाई देते.''

इमेज स्रोत, Getty Images
सातवें बेड़े का जवाब रामलीला मैदान में जनसभा से
इंदिरा गाँधी के करियर का सबसे स्वर्णिम क्षण था 1971 का भारत पाकिस्तान युद्ध. 3 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तानी हवाई हमले के समय वो कलकत्ता में एक जनसभा को संबोधित कर रही थीं. देर रात दिल्ली लौटने के बाद उन्होंने मंत्रिमंडल की एक बैठक बुलाई. तीनों सेनाध्यक्षों से मुलाकात की और रात साढ़े बारह बजे लगभग कांपती हुई आवाज़ में देश को संबोधित किया.
12 दिसंबर, 1971 को जैसे ही ख़बर मिली कि अमरीका ने बंगाल की खाड़ी में अपना सातवाँ बेड़ा भेजने का फ़ैसला किया है, इंदिरा ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक जनसभा को संबोधित करने का फ़ैसला किया. उनके सलाहकारों ने उनसे कहा भी कि वो रेडियो से देश को संबोधित करें, लेकिन उन्होंने खुले आसमान के नीचे भाषण देने का फ़ैसला किया.
उस समय भारतीय वायुसेना के विमान सभास्थल के चारों ओर मंडरा रहे थे ताकि पाकिस्तानी लड़ाकू विमान जमा हुई भीड़ पर हमला न कर सकें. उस समय जानेमाने पत्रकार प्रभाष जोशी भी उस जनसभा में मौजूद थे.
प्रभाष जोशी ने बीबीसी को बताया था, 'जब इंदिरा दिल्ली में राज करती थीं तो लगता था कि भारत एक ताकत है. ऐसा लगता था कि भारत दुनिया में कोई अपनी स्वतंत्र हस्ती बना कर रह रहा है क्योंकि वो एक नए भारत का ऐसा आत्मविश्वास अपने ज़रिए प्रकट करती थीं, जिसे हम आप शेयर कर सकते थे."
उन्होंने कहा, "उस सभा में महेंद्र कपूर ने 'बेटी हिंदुस्तान की' गीत गाया था. मैं इंदिरा गाँधी को ले कर भावुक नहीं होता, लेकिन उस सभा में मैं अपने बेटे को अपने कंधे पर बैठा कर ले कर गया था. जब इंदिरा गाँधी ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ हुंकार भरी तो मैं खड़ा हुआ और अपने कंधे पर बैठे अपने बेटे से कहा, बेटा ताली बजा."

इमेज स्रोत, Getty Images
ढ़ाका इज़ नाऊ अ फ़्री कैपिटल ऑफ़ अ फ़्री कंट्री
16 दिसंबर, 1971 को ठीक 4 बज कर, 31 मिनट पर इंदिरा गांधी के लाल फ़ोन की घंटी बजी. दूसरी तरफ़ भारत के थलसेनाध्यक्ष सैम मानेक शॉ थे.
उस समय इंदिरा स्वीडिश टेलीविज़न को एक इंटरव्यू दे रही थीं. उन्होंने टीवी क्रू से थोड़ा इंतज़ार करने के लिए कहा और तेज़ क़दमों से लोकसभा की ओर बढ़ीं. उन्होंने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच ऐलान किया, 'ढाका इज़ नाऊ द फ़्री कैपिटल ऑफ़ द फ़्री कंट्री!'
जैसे ही उन्होंने अपना वक्तव्य ख़त्म किया, भारतीय सांसदों ने उन्हें घेर कर फूल मालाओं से लाद दिया. उस समय दर्शक दीर्घा में इंदिरा की दोस्त पुपुल जयकर भी मौजूद थीं.
बाद में उन्होंने उनकी जीवनी में लिखा, "जब मैं दर्शक दीर्घा से बाहर आई तो मैंने देखा कि इंदिरा गांधी अपने कार्यालय के सामने खड़ी हुई हैं और उन्हें बहुत से सांसदों ने घेर रखा है. मुझे देख कर वो आगे बढ़ आईं. हम शायद 30 सेकेंड के लिए मिले होंगे. लेकिन मुझे याद है कि उन्होंने मुझे गले लगाया था. मैंने देखा उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे. जब मैंने उनसे विदा ली तो उन्होंने मुझसे फुसफुसा कर कहा, 'क्या हमें शांति भी नसीब होगी?''

इमेज स्रोत, Getty Images
पोखरण परमाणु परीक्षण
18 मई, 1974 को सुबह 8 बज कर 5 मिनट पर भारत ने पोखरण में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया. उसी समय इस बात से बेख़बर उनके निजी डॉक्टर के. पी. माथुर इंदिरा को देखने उनके निवास स्थान पर पहुंचे.
डॉक्टर के पी माथुर बताते हैं, "मैं हर शनिवार को इंदिरा गांधी को देखने उनके निवास स्थान पर जाया करता था. उस दिन जब मैं वहाँ पहुंचा तो मैंने उनके सहायक नत्थू से कहा कि मैं आ गया हूँ. उसने कहा कि आप अंदर चले जाइए. जब मैं अंदर गया तो मैंने उनसे सलाम दुआ तो की, लेकिन मुझे लगा कि वो मुझे देख कर असहज हो गई हैं. उनकी निगाहे उनके पलंग के बगल मे रखे फ़ोन पर लगातार लगी हुई थी. मेरी भी उधर नज़र गई तो मैंने देखा कि टेबल पर एक नोटबुक रखी हुई है जिस पर हाथ से गायत्री मंत्र लिखा हुआ है."

डॉक्टर के पी माथुर ने आगे कहा, "जब मैंने देखा कि वो मेरी तरफ़ ध्यान ही नहीं दे रही हैं तो मैं उठ खड़ा हुआ. उन्होंने मुझे रोका नहीं और मेरे निकलते ही बहुत तेज़ी से अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया. दोपहर को जब मैंने समाचार सुना तो मुझे पता चला कि उनका मेरे प्रति ऐसा व्यवहार क्यों था. दरअसल वो उस समय भारत के पहले परमाणु परीक्षण की ख़बर का इंतज़ार कर रही थीं और वो नहीं चाहती थीं कि मुझे इसकी ज़रा भी भनक पड़े."

इमेज स्रोत, Getty Images
इलाहाबाद हाईकोर्ट का वो फ़ैसला
लेकिन 1975 आते आते इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता फीकी पड़ने लगी थी. 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें चुनावी अनियमितताओं का दोषी मानते हुए रायबरेली सीट से उनका चुनाव रद्द कर दिया.
अपने पद से इस्तीफ़ा देने के बजाए उन्होंने अपने विरोधियों को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया और आपातकाल की घोषणा कर दी.
उनके इस कदम को न सिर्फ़ उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी भूल माना गया, बल्कि इससे भारतीय जनमानस में उनकी छवि को बहुत बड़ा धक्का लगा.
उस समय उनके नज़दीकी सलाहकार रहे अशोक पार्थसारथी याद करते हैं, "मैं उस समय भी सहमत नहीं था और आज भी सहमत नहीं हूँ कि आपातकाल की घोषणा, इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले से निपटने का सही समाधान था."
अशोक पार्थसारथी ने आगे कहा, "मैं उस व्यक्ति का नाम नहीं लूँगा, लेकिन उस समय सुप्रीम कोर्ट के एक अवकाश प्राप्त जज ने अपने नज़दीकी लोगों को बताया था कि अगर इंदिरा गाँधी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करती हैं, तो वो बिना झिझक इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले को निरस्त कर देंगे, बशर्ते इंदिरा गांधी पहले अपने पद से इस्तीफ़ा दें."

इमेज स्रोत, KP Mathu
सहयोगियों का डर
मैंने अशोक पार्थसारथी से पूछा कि इंदिरा गाँधी ने सुप्रीम कोर्ट के इस जज और अपने सलाहकारों की बात क्यों नहीं मानी?
अशोक पार्थसारथी का जवाब था, "उनका ये बड़ा अजीब ख़्याल और डर था कि अगर उन्होंने एक घंटे के लिए भी प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ दी तो उनके मंत्रिमंडल का कोई वरिष्ठ सहयोगी उस पर काबिज़ हो जाएगा और उसे कभी भी उनके लिए नहीं छोड़ेगा. मैं, मोनी मल्होत्रा और नटवर सिंह अक्सर इस मुद्दे पर बातचीत किया करते थे और हम लोगों ने तय किया था कि नटवर सिंह उनसे मिल कर उनकी आशंकाओं को दूर करने की कोशिश करेंगे. लेकिन हम अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाए."
राजनीतिक टीकाकार और जनसत्ता के पूर्व संपादक प्रभाष जोशी का भी मानना था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद इस्तीफ़ा न देने से इंदिरा गाँधी का क़द बौना हो गया और इतिहास में उन्हें वो जगह नहीं मिल पाई जिसकी कि वो हक़दार थीं.

इमेज स्रोत, Getty Images
प्रभाष जोशी ने बीबीसी को बताया था, "सबसे अच्छा ये होता कि वो ये कहतीं कि जब तक सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले पर स्टे लगाया हुआ है, मैं प्रधानमंत्री नहीं रहूंगी. जब सुप्रीम कोर्ट मेरे नाम को क्लीयर करेगा तभी मैं प्रधानमंत्री का पद संभालूंगी."
उन्होंने कहा, "वो अपनी खड़ाऊं निकाल कर किसी को भी सौंप सकती थीं. जब किसी में भी ये ताकत नहीं होती कि वो राजनीतिक या नैतिक रूप से इंदिरा गाँधी को चुनौती दे पाता."
प्रभाष जोशी ने कहा था, "सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद इस देश में ज़्यादा शक्तिशाली और स्वीकार्य हुईं, बजाये प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार के नाते. अगर इंदिरा गाँधी इस्तीफ़ा दे देतीं तो वो भारत के लोकतंत्र और राजनीति में टनों सीमेंट डाल देतीं, जिसे कोई तोड़ नहीं सकता था."

इमेज स्रोत, Getty Images
लीक से हटकर अलग राजनेता
इंदिरा गाँधी विवादास्पद ज़रूर थीं. उनकी एक जटिल शख़्सियत भी थी, लेकिन कोई उनकी अनदेखी नहीं कर सकता था.
लोकतंत्र के इम्तेहान में वो खरी नहीं उतरीं. उनके पुत्रमोह ने भी दिखाया कि वो भी आम इंसान हैं.
चाटुकारों ने उन्हें 'इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा' कह कर भरमाने की कोशिश की, लेकिन वो अंत तक कहती रहीं कि आप भारतीय हो कर उस पर गर्व न करने की कल्पना भी कैसे कर सकते हैं?
वो स्टीरियो टाइप राजनीतिज्ञ नहीं थी. उन्होंने कभी भी प्रचलित मानदंडों की परवाह नहीं की.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












