दुनिया में मची आपाधापी भविष्य के लिए बड़ा ख़तरा

civilisations greatest threat, सभ्यता के लिए बड़ा ख़तरा

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    • Author, रिचर्ड फिशर
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

सोचना क्या जो भी होगा देखा जाएगा, कल के लिए आज को ना खोना... आज ये ना फिर आएगा... जो होना होगा.. होगा वही... सोच के तू क्या पाएगा...

हिंदी फिल्म का ये गाना हमें आज में जीने की प्रेरणा देता है... जो है अभी है.. बस इसी लम्हे को जीना है. शायद कुछ मायनों में सही भी है. मौत का क्या भरोसा कब आकर दबोच ले. लेकिन ये भी तो किसी को नहीं पता कि ज़िंदगी कब तक जीने का मौक़ा दे.

ऐसे में कल का सामना तो करना ही पड़ेगा. और उस कल के लिए अगर आज तैयारी नहीं की, तो, फिर उसका सामना कैसे करेंगे.

भविष्य को लेकर अभी तक जितनी भी रिपोर्ट तैयार की जा रही हैं उनमें मोटे तौर पर 22वीं सदी को मील का पत्थर माना जा रहा है. लेकिन ऐसा नहीं है कि इस सदी के बाद सब ख़त्म हो जाएगा.

सवाल ये है कि क्या हम उस दौर तक जीने के लिए तैयार हैं. आज के बच्चे उस दौर के बुज़ुर्ग होंगे. अनगिनत वो लोग होंगे जिनके बारे में हमने अभी तक सोचा भी नहीं है.

लेकिन सिर्फ़ आज जीने के लिए हम जिस तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं और प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, क्या उसके बाद भविष्य की नस्लों के लिए कुछ बाक़ी बचेगा?

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कोई प्लानिंग नहीं

जानकारों का कहना है कि हमारी प्लानिंग किसी एक टारगेट को पाने के लिए है. लंबे वक़्त के लिए हमारे पास कोई प्लानिंग नहीं है.

मिसाल के लिए फ़ैशन की दुनिया में एक सीज़न और कल्चर टारगेट है. सियासत में एक टर्म, तो बिज़नेस में एक क्वाटर और इंटरनेट की दुनिया में मिनट टारगेट हैं.

साल 1978 में समाजशास्त्री एलिस बोल्डिंग ने लिखा था कि मॉडर्न सोसायटी टेम्पोरल एक्ज़ॉसशन में जी रही है. हर कोई आपाधापी मचाए हुए है. अगर दिमाग़ हर समय मौजूदा वक़्त की तैयारी में रहेगा तो भविष्य की बारे में कुछ भी सोचने के क़ाबिल नहीं बचेगा.

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40 साल पहले कही गई उनकी बात आज हम 2019 के चुनाव में भी देख सकते हैं.

नेता हो या आम आदमी सभी मौजूदा वक़्त की बात कर रहे हैं. जबकि जलवायु परिवर्तन जैसे अहम मुद्दे पूरी तरह ग़ायब हैं.

इसीलिए दार्शनिक, कलाकार, रिसर्चर और तकनीकी जानकारों का कहना है कि सभ्यता की लंबी उम्र हमारी सोच पर निर्भर करती है. हो सकता है हम आने वाली नस्लों को देख ना पाएं लेकिन ये तो मानते ही हैं कि हमारी कई नस्लें अभी आने वाली हैं. लेकिन हम उनके बारे में सोचते ही नहीं. इसीलिए मौजूदा दौर की जल्दबाज़ी आने वाली नस्लों के लिए ख़तरनाक है.

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भविष्य के ख़तरे पता हैं लेकिन...

यूनिवर्सिटी ऑफ़ क्वीन्सलैंड के प्रोफ़ेसर थॉमस सडनडोर्फ़ का कहना है कि इंसान अपने हरेक क़दम के नतीजे से वाक़िफ़ होने के बावजूद पीछे नहीं हटता.

मिसाल के लिए वो जानता है कि सिगरेटनोशी सेहत के लिए ख़राब है और भविष्य में इसके नुक़सान भुगतने होंगे. फिर भी वो जमकर कश लगाता है क्योंकि वो उस पल को जीना चाहता है.

तर्क और ख़्वाहिशों की कशमकश को मनोवैज्ञानिक हॉर्स एंड राइडर की संज्ञा देते हैं. उनके मुताबिक़ राइडर जानता है कि वो लंबे वक़्त की प्लानिंग कर सकता है लेकिन हॉर्स की ख़्वाहिश उसे दूसरी राह पर ले जाती है.

अगर हम अपने ही भविष्य को संवारने की नहीं सोचेंगे तो आने वाली नस्लें ख़ुद-ब-ख़ुद नज़र अंदाज़ हो जाएंगी.

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नेता अपनी जनता से बहुत से वादे पूरा करने इरादे से संसद तक जाते हैं. लेकिन वहां जाकर वो भी सिर्फ़ एक टर्म की प्लानिंग करते हैं. नेता चाह कर भी पर्यावरण बचाने के लिए या एटमी कचरा कम करने जैसे मुद्दों के लिए कोई ठोस प्लानिंग नहीं करते. क्योंकि बजट सीमित होता है. और उसी बजट में उन्हें जनता से किए तमाम वादे पूरे करने होते हैं. जबकि लंबे अर्से की प्लानिंग के लिए भारी भरकम रक़म ख़र्च करने की ज़रूरत होती है. और उस ख़र्च का नतीजा भी तुरंत नज़र नहीं आएगा.

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भावी पीढ़ी के लिए अभी से सोचना ज़रूरी

इस ख़र्च का भार एक आम नागरिक को भी थोड़ा-थोड़ा सहन करना पड़ेगा, जो कोई करना नहीं चाहता. लिहाज़ा नेता आने वाली नस्लों के लिए उतना ही पैसा ख़र्च करते हैं जिसके बूते वो अगले चुनाव में फ़ायदा उठा सकें.

एक अंदाज़े के मुताबिक़ पिछले 50 हज़ार वर्षों में क़रीब सौ अरब लोग पैदा और मरे होंगे. लेकिन अगर 21वीं सदी की आबादी को ज़हन में रखकर अगले 50 हज़ार वर्षों का अनुमान लगाया जाए तो वो आबादी मौजूदा आबादी की तीन गुना होगी.

सोच कर देखिए अगर मौजूदा संसाधान आज की आबादी की ही ज़रूरत बमुश्किल पूरी कर पा रहे हैं, तो आने वाली पीढ़ी क्या पाएंगी.

यक़ीनन हमें आने वाली नस्लों के लिए सोचना ही पड़ेगा और बहुत से देशों ने इस दिशा में काम शुरू भी कर दिया है.

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मिसाल के लिए फ़िनलैंड, स्वीडन और हंगरी जैसे देशों ने लॉन्ग टर्म प्लानिंग के मक़सद से संसदीय एडवाइज़री ग्रुप बना लिए हैं. इसके अलावा और भी बहुत सी संस्थाएं हैं, जो सरकारों को जलवायु परिवर्तन के लिए प्लानिंग करने के लिए बाध्य कर रही हैं.

सितंबर 2017 में स्वीडन में भविष्य को लेकर बड़ी प्लानिंग के मक़सद से वर्कशॉप की गई.

इसमें लॉन्ग टर्म ट्रेजेक्ट्री ऑफ़ ह्यूमन सिविलाइज़ेशन पर बहस हुई. तय पाया गया कि हमें ऐसी प्लानिंग की ज़रूरत है जिसमें आने वाली नस्लों को बहुत बेहतर नहीं तो कम से कम आज जैसे हालात और आब-ओ-हवा ही सही, पर नसीब हो जाए. और उसके लिए हम सबको मिलकर काम करना होगा. लेकिन सवाल ये है कि क्या हम उसके लिए तैयार हैं. क्योंकि हम तो सिर्फ़ आज जीना चाहते हैं.

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लॉन्ग टाइम इनक्वाइरी

आज हम मानव इतिहास के ऐसे मक़ाम पर खड़े हैं जहां हमें अपने कल के बारे में सोचना ही होगा. सिर्फ़ आज जीने की सोच को कहीं पीछे छोड़ना होगा.

इसके लिए हमारी नौजवान पीढ़ी को सबसे पहले अपनी सोच बदलनी होगी.

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हाल ही में ब्रिटेन में लॉन्ग टाइम इनक्वाइरी नाम का प्रोग्राम शुरू किया गया है. इसमें कला के माध्यम से नौजावान पीढ़ी को शिक्षित किया जा रहा है.

इस प्रोग्राम को शुरू करने वालों का कहना है कि समाज और सोच तैयार करने में सस्कृति का बहुत बड़ा रोल होता है. और कला इसका सबसे अच्छा माध्यम है.

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बहुत मर्तबा मौत का डर भी हमें लंबे वक़्त की योजना बनाने से रोकता है. हमें लगता है कि मौत किसी भी वक्त हमें साथ ले जा सकती है तो हम उनके बारे में क्यों सोचें, जो अभी हैं ही नहीं. लेकिन हर किसी को कल के बारे में सोचना होगा. हो सकता है हम अगली दो नस्लों को भी ना देख पाएं. लेकिन, अगर हम इतना जी गए, तो नई नस्ल को देने के लिए हमारे पास क्या होगा.

हम अपनी आने वाली नस्लों के लिए साफ़ हवा तक बाक़ी नहीं रहने दे रहे. ये बहुत ख़तरनाक है. अभी भी वक़्त है हमें संभल जाना चाहिए. सिर्फ़ आज की सोच छोड़कर कल की भी फ़िक्र शुरू कर लेनी चाहिए.

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(यह लेख बीबीसी फ़्यूचर की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहां पढ़ सकते हैं. बीबीसी फ़्यूचर के दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)

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