क्या प्लास्टिक की जगह ले सकती हैं ये चार चीजें

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- Author, एड्रीएन बर्नर्ड
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
हम प्लास्टिक युग मे जी रहे हैं. हर काम में प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है. नतीजा ये कि धरती पर प्लास्टिक का ढेर लगता जा रहा है.
इसकी वजह से समुद्री जानवरों का दम घुट रहा है. पॉलीथीन में चाय पैक हो रही है. पॉलीथीन में सब्ज़ी घर लायी जा रही है. प्लास्टिक के स्ट्रॉ से कोल्ड ड्रिंक की चुस्कियां ली जा रही हैं.
कुल मिलाकर आज हमारी ज़िंदगी प्लास्टिक पर इस क़दर निर्भर हो गई है कि हमें इससे निजात का रास्ता नहीं सूझ रहा.
लेकिन, दुनिया में कई लोग ऐसे हैं जो मानवता को इस 'सफेद प्रदूषण' से छुटकारा दिलाने के नुस्खे तलाश रहे हैं.
पर्यावरण के लिए मुफीद उत्पाद बनाने की कोशिश की जा रही है. प्लास्टिक के ऐसे विकल्प विकसित करने का प्रयास हो रहा है, जो धरती के इकोसिस्टम को कम से कम नुक़सान पहुंचाए.
इसलिए गीली लकड़ी, फफूंद, शैवाल, काई और भुट्टों-आलू से बायोप्लास्टिक तैयार करने की कोशिश हो रही है.
प्लास्टिक के ये क़ुदरती विकल्प प्लास्टिक की सुनामी तो रोक ही रहे हैं. वो बढ़ती हुई आबादी के लिए सुरक्षित भविष्य का भी निर्माण कर रहे हैं. इन से वायु प्रदूषण कम होता है. धरती के पोषक तत्व दोबारा धरती पर आ जाते हैं.

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चट्टानों से तैयार ऊन
दुनिया में सबसे ज़्यादा आसानी से उपलब्ध वस्तु हैं चट्टानें. इन चट्टानों की मदद से रेशे तैयार किए जा रहे हैं. ये क़ुदरती तौर पर लाखों साल पहले बनी चट्टानों से तैयार किए जाते हैं. ये चट्टानें धरती पर तब बनी थीं, जब दुनिया में चारों तरफ ज्वालामुखी विस्फोट से निकला लावा ठंडा हुआ था.
इन चट्टानों और लोहा बनाने के दौरान निकलने वाले एक तत्व स्लैग को मिलाकर स्टोन वूल तैयार किया जाता है. ठीक वैसे ही, जैसे कोई कैंडीफ्लॉस दिखता है. ये रेशे कई ख़ूबियों से लैस होते हैं. जैसे कि ये आग नहीं पकड़ते. इनमें गर्मी रोकने की क्षमता होती है. पानी में ये रेशे गलते नहीं और बहुत खराब मौसम में भी ये डटे रहते हैं.
पर्यावरण के लिए फिक्रमंद इंजीनियर और आर्किटेक्ट ऐसे बिल्डिंग मैटीरियल की तलाश बरसों से कर रहे थे. रॉकवूल ग्रुप नाम की कंपनी बड़ी तादाद में स्टोनवूल तैयार करती है. इसके उत्पाद यूरोप और अमरीका के अलावा एशिया में भी खूब इस्तेमाल हो रहे हैं. दुनिया की कई इमारतों को बनाने में इस कंपनी के रॉकवूल या स्टोनवूल का इस्तेमाल हुआ है. लंदन का मशहूर ओ2 अरेना और हांगकांग का हवाई अड्डा बनाने में इसका खूब इस्तेमाल हुआ है.
अब जबकि दुनिया में कई जगह जंगल की आग भड़क रही है या बाढ़ आने की तादाद बढ़ गई है, तो स्टोन वूल मकान मालिकों को सुरक्षा का एक और विकल्प मुहैया कराता है.

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माइकोटेक्चर
मशरूम सिर्फ स्वाद का ख़ज़ाना नहीं हैं. इनकी और भी ख़ूबियां हैं, जो इंसान के काम आ सकती हैं. पेड़ों से चिपक कर उगने वाले फफूंद, प्लास्टिक का विकल्प तैयार करने में मददगार हो रहे हैं. इनसे तैयार प्रोडक्ट, पैकेजिंग में प्रयोग होने वाले प्लास्टिक, ध्वनि यंत्र बनाने में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक, फर्नीचर और चमड़े के उत्पादों का विकल्प हो सकते हैं.
माइकोवर्क्स नाम की एक कंपनी है, जिसके इंजीनियर, डिज़ाइनर और वैज्ञानिक मिलकर फफूंद के रेशों से नए उत्पाद तैयार कर रहे हैं. इनसे रबर या कॉर्क जैसी चीज़ें तैयार की जा रही हैं. न्यूयॉर्क स्थित एक और कंपनी इवोकेटिव डिज़ाइन फफूंद के अंकुरण यानी माइसीलियम की मदद से लकड़ी के पैनल जोड़ने का काम लेती है. इनसे ऐसा मैटीरियल तैयार होता है, जो आग नहीं पकड़ता.
मशरूम असल में रेशों का एक जाल होते हैं, जिन्हें हाइफे कहा जाता है. अच्छी परिस्थितियां होने पर इनमें से अंकुरण जैसा निकलता है. इन्हें माइसीलियम कहते हैं, जिन्हें तेज़ी से तैयार किया जा सकता है.
इस माइसीलियम को किसी भी कृषि उत्पाद के कचरे पर उगाया जा सकता है. पिस्ते के छिलके से लेकर लकड़ी के बुरादे तक में फफूंद को विकसित किया जा सकता है. ये क़ुदरती पॉलीमर होते हैं, जो मजबूत से मजबूत गोंद से भी ज़्यादा मज़बूती से जोड़ते हैं. एक ख़ास तापमान में इन्हें उगाकर इनकी ग्रोथ को नियमित किया जा सकता है. माना जा रहा है कि प्लास्टिक का सबसे अच्छा विकल्प फफूंद हैं.

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पेशाब से तैयार हो रही हैं ईंटें
दुनिया में कुल कार्बन उत्सर्जन के पांच प्रतिशत के लिए अकेले सीमेंट ज़िम्मेदार है. इसीलिए वैज्ञानिक और इंजीनियर मिलकर इसका विकल्प तलाशने में जुटे हैं. शराब की भट्टियों से निकलने वाले अनाज के कचरे से ईंटें तैयार की जा रही हैं. इसी तरह प्राचीन रोमन सभ्यता से सीख लेते हुए चूने और चट्टानों के मेल से ईंटें तैयार की जा रही हैं.
ब्रिटेन के एडिनबर्ग कॉलेज ऑफ आर्ट्स के छात्र पीटर ट्रिम्बल बायोस्टोन नाम की ईंट बनाने में जुटे हैं. इस ईंट को बालू और यूरिया की मदद से तैयार किया जाता है. यूरिया को इंसान के मूत्र से निकाला जा रहा है.
इसके लिए बालू से भरे गड्ढे में कीटाणुओं का घोल डाला जाता है. इस में यूरिया और कैल्शियम क्लोराइड भी मिलाया जाता है. इससे एक ऐसी गोंद तैयार होती है, जो बालू के कणों को मज़बूती से जोड़ देती है. इस तरह से ईंटें तैयार करने में बिजली भी कम ख़र्च होती है और ऐसे उत्पाद इस्तेमाल होते हैं जिनसे प्रदूषण कम फैलता है.
इस तरह से तैयार बायोस्टोन ईंट, कंक्रीट से भी मज़बूत होती है. अस्थायी इमारतें बनाने या सड़क के किनारे लगाए जाने वाले फर्नीचर बनाने में बायोस्टोन का प्रयोग हो सकता है.
बायोस्टोन तैयार कर के ट्रिम्बल ने एक बहस तो छेड़ ही दी है कि हम ऐसे बिल्डिंग मैटीरियल विकसित कर सकते हैं, जो धरती की आबो-हवा को कम से कम नुक़सान पहुंचाएं.

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इको-फ्रेंडली बोर्ड
बोर्ड का इस्तेमाल आज दुनिया भर में फर्नीचर बनाने में होता है. किचेन, बेडरूम या दफ़्तर, हर जगह बोर्ड से फर्नीचर बनाए जा रहे हैं. दिक़्क़त ये है कि इन्हें बनाने में फॉर्मेल्डिहाइड नाम का केमिकल इस्तेमाल होता है. ये तेज़ी से आग पकड़ता है और सांस लेने की तकलीफ़ पैदा कर सकता है. यही नहीं, इससे कैंसर भी होने की आशंका रहती है.
इसलिए एनयू ग्रीन नाम की कंपनी ने यूनिबोर्ड नाम का एक नया बोर्ड तैयार किया है. इससे पेड़ बचाए जा सकेंगे और कचरा भी कम होगा. और यूनिबोर्ड को बनाने में प्रदूषण भी कम पैदा होगा. वजह ये है कि यूनिबोर्ड को भुट्टे के डंठल और हॉप नाम के पौधे से तैयार किया जाता है. इन्हें जोड़ने में फॉर्मेल्डिहाइड से मुक्त केमिकल प्रयोग किया जाता है. यानी ये पर्यावरण के लिए भी मुफ़ीद है और हमारी सेहत के लिए भी.
प्लास्टिक तैयार करने की जो प्रक्रिया है, वो भी पर्यावरण को भारी नुक़सान पहुंचाती है. क्योंकि प्लास्टिक को पेट्रोलियम उत्पादों से निकालकर तैयार किया जाता है. इसके बाद तैयार प्लास्टिक का निपटारा भी एक चुनौती बन जाता है. ये हमारे खान-पान में शामिल हो जाता है.
बहुत से लोग रिसाइक्लिंग की वक़ालत करते हैं. इससे प्लास्टिक ख़त्म नहीं होता बल्कि उसके कचरा बनने की प्रक्रिया धीमी भर हो जाती है.
कुछ रिपोर्ट कहती हैं कि 2030 तक दुनिया भर के कचरे के ढेरों और समुद्र में 11 करोड़ टन से भी ज़्यादा प्लास्टिक का कचरा जमा हो जाएगा. रिसाइक्लिंग से इस ढेर को कम तो किया जा सकता है. लेकिन, सही तरीक़ा ये होगा कि हम प्लास्टिक के इको-फ्रेंडली विकल्पों को आज़माएं, ताकि इंसान का भविष्य बेहतर हो.
(यह लेख बीबीसी फ़्यूचर की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी फ़्यूचर के दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)
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