ये है 'सैनिटरी पैड्स' से पर्यावरण को बचाने वाली मशीन

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- Author, संजय रमाकांत तिवारी
- पदनाम, नागपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए
इस्तेमाल के बाद सैनिटरी पैड्स का क्या होता है? सैनिटरी पैड्स की गिनती अपने आप नष्ट हो जाने वाली चीज़ों में नहीं होती है और इसीलिए उन्हें सुरक्षित ठिकाने लगाना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है.
नागपुर स्थित नेशनल एन्वायरन्मेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट 'नीरी' की अगुवाई में इसका हल खोजने की एक कोशिश हुई है.
नतीजा है, बिजली से चलने वाली एक नन्ही सी भट्ठी जो इंसान और पर्यावरण दोनों की सेहत का ख़्याल रखने में सक्षम है.
स्वयंसेवी संस्थाओं और नगरपालिकाओं के साथ मिलकर इसे सार्वजनिक जगहों और होटलों जैसी जगहों पर लगवाया जा सकता है.


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सालाना होता है 40 करोड़ नैपकिन्स का इस्तेमाल
डॉक्टर नितिन लाभसेटवार 'नीरी' में सीनियर साइंटिस्ट हैं. वो बताते हैं, "दो साल पहले तक हर महीने तक़रीबन 33 से 35 करोड़ सैनिटरी पैड्स इस्तेमाल में लाए जाते थे जो अब 50 करोड़ हो गए हैं.''
"आज के हिसाब से देखें तो हर महीने ये आंकड़ा 55 से 60 करोड़ तक पहुंच गया होगा. इस्तेमाल के बाद ये सैनिटरी नैपकिन्स म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट (कचरा) के रूप में खुले में फ़ेंक दिए जाते हैं, ज़मीन में दबाए जाते हैं या फिर फ्लश के ज़रिए बहा दिए जाते हैं."
"इससे प्रदूषण की समस्या दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है. इस्तेमाल हुए सैनिटरी नैपकिन्स में लगे खून से सूक्ष्म जीवाणु यानाी माइक्रो ऑर्गनिज़्म्स फैलने लगते हैं जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं."


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जागरूकता की कमी
कई बार इस्तेमाल करने के बाद फेंके गए पैड्स को आवारा कुत्ते फाड़कर और गंदगी फैला देते हैं. और तो और सीवेज लाइन्स में बहाए जाने पर पानी सोक कर सैनिटरी पैड्स शहरों के ड्रेनेज सिस्टम को भी ख़राब कर रहे हैं.
जागरूकता की कमी के चलते सामान्य तौर पर पॉलीथिन में या अन्य कचरे के साथ इसे कूड़े में डाल दिया जाता है.
डॉक्टर नितिन बताते हैं, "घरों और रिहाइशी इलाकों से इन्हें इकट्ठा करना और फिर सुरक्षित और वैज्ञानिक ढंग से ठिकाने लगाना, ये बड़ी चुनौती है."

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आरामदेह नैपकिन्स पर्यावरण को पहुंचाते हैं नुक़सान
"चिंता की बात ये भी है कि 'बायो डिग्रेडेबल' पैड्स के मुक़ाबले बेहतर गुणवत्ता और परिणाम देने वाले आरामदेह सैनिटरी नैपकिन्स पर्यावरण को ज़्यादा नुक़सान पहुंचाते हैं."
"इस्तेमाल हो जाने पर उनको ठिकाने लगाने के मौजूदा उपाय मुश्किलों भरे हैं. उन्हें सुरक्षित रूप से जलाना चुनौती से कम नहीं, वो भी ऐसे कि स्वास्थ्य और पर्यावरण को खतरा ना हो."
बाज़ार में मौजूद छोटे इंसीनरेटर्स में बिजली की खपत और दाम कम रखने के लिए ऐसी तकनीक अपनाई जाती है जिससे अमूमन बिजली का इस्तेमाल कम होता है. लिहाजा, कम्बस्टन चैंबर का तापमान कम होने से इस्तेमाल किया गया नैपकिन ठीक से जल नहीं पाता.

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बाजार में दो तरह के नैपकिन्स उपलब्ध
डॉक्टर नितिन के अनुसार, "कम्बस्टन चैंबर का डिज़ाइन ठीक नहीं होता और इग्निशन का सही कंट्रोल नहीं होता. क़रीब 8-10 महीने पहले हमने इसे सही तौर पर बनाने की दिशा में कोशिश शुरू की."
"हमने कम्बस्टन चैंबर को वैज्ञानिक तरीके से डिज़ाइन किया और तापमान बढ़ाकर 800 से 850 डिग्री ले गए. ये अपने आप में एक चुनौती थी. क्योंकि, ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल हो इसलिए कम से कम बिजली की खपत में उच्च तापमान हासिल करना था."
बाजार में मुख्यतः दो प्रकार के सैनिटरी नैपकिन्स उपलब्ध हैं. एक तो कपास से बने साधारण पैड्स जिन्हें 800 डिग्री तापमान पर ठीक से जलाया जा सकता है.
लेकिन अच्छी क्वॉलिटी के ज़्यादातर पैड्स पॉलीमरेट मटेरियल के होते हैं जो आसानी से जलते नहीं हैं. इन्हें जलाने के लिए 1050 डिग्री टेम्प्रेचर की ज़रूरत होती है. पॉलीमर मटेरियल के जलने से डॉयक्सिल फेरॉन गैस बनती है जो कैंसर का कारण बन सकती है.


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15 मिनट में 15 पैड नष्ट करने की क्षमता
डॉक्टर नितिन लाभसेटवार बताते हैं, "ये ठीक से जले, इसलिए हमने जो नई मशीन बनाई है उसमें दो एयरवेज़ दिए हैं. साथ ही सेकेंडरी हीटर लगाया गया है जो एक्ज़हॉस्ट का तापमान बढ़ाता है. यहां से निकलने वाली हवा को नष्ट करने के लिए क़रीब दो मिनिटों के लिए तापमान का एक हज़ार डिग्री पर होना ज़रूरी है जिससे एमिशन (उत्सर्जन) का कोई ख़तरा नहीं रहेगा."
"लेकिन बिजली ज़्यादा खर्च न हो, ये देखना भी ज़रूरी था. इसलिए एक अच्छी परफॉर्मेंस वाला हीटर डिज़ाइन किया गया. इस तरह की प्रक्रिया से मिली राख का भी परीक्षण किया गया और इस बात की पुष्टि की गई कि उसमें भी हानिकारक तत्व नहीं हैं."
डॉक्टर नितिन के अनुसार, "इस भट्ठी में एक बार में 5 से 15 पैड 12 से 15 मिनट में जलाए जा सकते हैं. इस हिसाब से 10 घंटों में 300 से 600 पैड्स आसानी से और सुरक्षित ढंग से नष्ट किए जा सकते हैं.
'नीरी' के वैज्ञानिकों का दावा है कि ये इन्सीनरेटर यानी बिजली से चलने वाली 'ग्रीन डिस्पो' स्वास्थ्य और प्रदूषण संबंधी मानकों पर खरी उतरती है. इसके पेटेंट के लिए अर्जी दाखिल की गई है.
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