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दुनिया का सबसे महान देश कौन सा है?
- Author, अमांडा रुजेरी
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
हमारे इस सवाल के जवाब में हर देश के नागरिक का यही दावा होगा कि उनका देश सबसे महान है. हमारा भारत भी एक महान देश है. इसमें कोई दो राय नहीं.
सवाल ये है कि ऐसी क्या बातें हैं, जो किसी देश को महान बनाती हैं?
पिछली क़रीब एक सदी से किसी देश की महानता के दो पैमाने चलन में हैं. एक तो ये कि उस देश की जीडीपी क्या है? यानी वो देश कितना कमाता है. दूसरी, किसी देश में बेरोज़गारी की दर.
इन दो पैमानों पर हम किसी देश की आर्थिक तरक़्क़ी को तो माप सकते हैं. मगर इससे ये पता नहीं लगाया जा सकता कि वो देश अपने नागरिकों की सेवा किस तरह से करता है. उन्हें कैसी सुविधाएं देता है. ज़िंदगी जीना कितना आसान बनाता है.
इसीलिए ज़रूरी है कि हम हर देश को सामाजिक तरक़्क़ी के पैमाने पर कसें. ये जानें कि वो अपने नागरिकों के खान-पान, तालीम, सेहत और घर-बार की ज़रूरतों का ख़याल कैसे रखते हैं. कौन सा देश ऐसा है, जहां समाज के हर तबक़े को बोलने की आज़ादी हासिल है. उसे ख़ुद को दबाए जाने का एहसास नहीं होता.
सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स
दुनिया के बड़े अर्थशास्त्रियों की सलाह पर एक सोशल प्रोग्रेस इम्परेटिव शुरू किया गया है. इसके ज़रिए तमाम देशों की सामाजिक तरक़्क़ी को सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स के ज़रिए बताया जाता है. सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स के सीईओ माइकल ग्रीन कहते हैं कि अमीर देशों के पास ज़्यादा पैसा है. इसलिए आर्थिक तरक़्क़ी के पैमानों पर उन्हें ऊंचा दर्जा हासिल होता है.
लेकिन ग्रीन कहते हैं कि जब हम शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन की ज़रूरतों के हवाले से देखते हैं, तो मालूम होता है कि जो देश ग़रीब माने जाते हैं, वो अपने नागरिकों का ज़्यादा अच्छे से ख़याल रखते हैं.
सामाजिक तरक़्क़ी के इस पैमाने की बुनियाद पर ही डेनमार्क और न्यूज़ीलैंड वो देश बन जाते हैं, जहां बसना लोगों का ख़्वाब होता है.
सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स की बुनियाद पर उन देशों की पहचान होती है, जिन्हें आर्थिक मदद की ज़रूरत होती है. फिर उसी हिसाब से उनकी मदद की जाती है. इनकी मदद से ये भी पता चलता है कि किस देश में हालात बेहतर हुए हैं. कहां बिगड़े हैं. और कहां जस के तस बने हैं.
कुछ लोग ये तर्क देते हैं कि आज की अमरीकी सरकार का असर बेहद कम रह गया है. अमरीकी लोगों का अपनी सरकार पर भरोसा बहुत घट गया है. लेकिन विश्व बैंक की वर्ल्डवाइड गवर्नांस इंडिकेटर ये कहते हैं कि अमरीका में प्रशासन 1996 से वैसा ही है, जैसा उस वक़्त था. इस नतीजे पर पहुंचने के लिए अमरीका में हाइवे, प्राइमरी स्कूल और लालफीता शाही की पड़ताल की गई थी.
कई देशों ने सामाजिक तरक़्क़ी के मोर्चे पर ज़बरदस्त छलांग लगाई है. अफ्रीका का देश ट्यूनिशिया ऐसा ही एक मुल्क़ है. 1996 से 2010 तक देश के हालात लगातार बिगड़ रहे थे. लोगों की आवाज़ नहीं सुनी जा रही थी. सरकार की जवाबदेही ही नहीं थी. प्रेस को आज़ादी नहीं हासिल थी. लोगों का न तो चुनाव पर भरोसा था, न अपनी सरकार पर.
इसके बाद 2011 में अरब क्रांति हो गई. उसके बाद से ट्यूनिशिया ने सामाजिक प्रगति के मोर्चे पर काफ़ी तरक़्क़ी की है. कभी ये देश सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स में नवें नंबर पर था. आज ये पूर्वी यूरोपीय देश हंगरी के साथ 57वें नंबर पर है.
यहां ये बता दें कि सोशल प्रोग्रेस के इंडेक्स में जो जितने ज़्यादा नंबर पर होता है, वो देश ज़्यादा बेहतर माना जाता है.
हालांकि एक बार अगर देश में अच्छा प्रशासन क़ायम हो जाता है, तो फिर उससे ऊंची पायदान पर जाना मुश्किल होता है. विश्व बैंक के अर्थशास्त्री आर्ट क्रे कहते हैं कि तरक़्क़ी की ऊंची पायदान पर पहुंचना मुश्किल होता है. एक बार अच्छी सरकार आ गई, तो उससे नीचे गिरना भी मुश्किल हो जाता है. और आगे बढ़ना तो और भी.
सामाजिक तरक़्क़ी के लिए सिर्फ़ अमीर देश होना ज़रूरी नहीं
जीडीपी के मामले में अमरीका दुनिया के टॉप 5 देशों में से एक है. लेकिन जब हम इसे सामाजिक प्रगति के पैमाने पर कसते हैं, तो पता चलता है कि ये 18वें नंबर पर है. यानी ये पड़ोसी देश कनाडा की बराबरी पर नहीं ठहरता. बल्कि पूर्वी यूरोपीय देश एस्तोनिया के ज़्यादा क़रीब है.
इसी तरह नीदरलैंड और सऊदी अरब का जीडीपी कमोबेश बराबर है. यही हाल चिली और कज़ाख़िस्तान का है. फिलिपींस और अंगोला का जीडीपी भी बराबर है. लेकिन सोशल प्रोग्रेस के मोर्चे पर नीदरलैंड, चिली और फिलीपींस अपने साथियों के मुक़ाबले बीस ठहरते हैं.
यूरोपियन यूनियन के आंकड़े बताते हैं कि किसी देश में बेरोज़गारी की दर से आप ये नहीं कह सकते कि वहां के लोगों की ज़िंदगी अच्छी नहीं है. जैसे कि ब्रिटेन में बेरोज़गारी की दर ऐतिहासिक रूप से बेहद कम स्तर पर है. वहीं सामाजिक प्रगति के मोर्चे पर हालात में पिछले दो दशकों में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है.
सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स के माइकल ग्रीन कहते हैं कि हम पिछले 80 सालों से जीडीपी से देश की तरक़्क़ी और लोगों की ख़ुशहाली मापते आए हैं. ये सही नहीं है. ब्रिटेन ने जीडीपी के मामले में तो बहुत प्रगति की है. मगर उसकी सामाजिक तरक़्क़ी में पिछले दो दशकों में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया.
ब्रिटेन के मुक़ाबले मध्य अमरीकी देश कोस्टा रिका सामाजिक प्रगति के मामले में कई अमीर देशों से बेहतर है. पिछले 40-50 सालों में यहां कई ऐसे काम हुए हैं, जिससे लोगों की ज़िंदगी बेहतर हुई है. वो ज़्यादा ख़ुशहाल हुए हैं. आज कोस्टा रिका अपने पड़ोसी देशों के मुक़ाबले ज़्यादा स्थिर, शांतिपूर्ण और ख़ुशहाल मुल्क़ माना जाता है.
किन पैमानों से मापी जाए सामाजिक प्रगति?
सवाल ये है कि अगर सिर्फ़ अमीरी से देश की ख़ुशहाली नहीं मापी जा सकती, तो फिर वो पैमाना क्या है, जिससे ये पता चलेगा कि किस देश ने सामाजिक प्रगति की है?
इसके लिए क़ानून के राज के पैमाने को भी आज़माया जाता है. ये देखा जाता है कि किस देश की सरकार नागरिकों के प्रति ज़्यादा जवाबदेह है. वहां लोगों के मानवाधिकार कितने सुरक्षित हैं और क़ानूनी प्रक्रिया कितनी आसान है.
आप ये जानकर हैरान होंगे कि जिस देश में क़ानून का राज बेहतर है, वो देश विकास के हर पैमाने पर बेहतर होता है. फिर चाहे वो औसत उम्र हो, गंभीर बीमारियों से लड़ने की ताक़त हो, या गर्भवती महिलाओं की औसत उम्र. ये सारे के सारे पैमाने बताते हैं कि क़ानून का राज होने से लोगों की सेहत बेहतर ही होती है.
लेकिन, इसका ये मतलब नहीं कि पैसे की कोई अहमियत नहीं. आर्थिक रूप से मज़बूत देश अपने नागरिकों को कई ऐसी सुविधाएं दे पाते हैं, जो ग़रीब मुल्क़ों के लोगों को मयस्सर नहीं होतीं. वहां के पुलिसकर्मियों से लेकर दूसरे कर्मचारियों की सैलरी बेहतर होती है. अपराध कम होता है.
सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स की अहमियत
आज यूरोपीय यूनियन इन आंकड़ों को कई तरह से इस्तेमाल कर रहा है. यूरोपीय देश इस आधार पर ये तय करते हैं कि वो किस चीज़ को कहां से आयात करें. अपनी ज़रूरत की चीज़ें किस देश को ठेका देकर बनवाएं.
अमेरिका और दूसरे देश सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स की बुनियाद पर ये तय करते हैं कि किस देश को कितनी आर्थिक मदद दी जाए. अमरीकी सरकार ये देखती है कि किस देश में भ्रष्टाचार कम है, क़ानून का राज है. प्रशासन असरदार है. फिर उस देश को आर्थिक मदद दी जाती है.
हालांकि इस बात पर विवाद हो सकता है.
कई देशों का कहना है कि गुड गवर्नांस यानी बेहतर प्रशासन का कॉन्सेप्ट पहले निजी संस्थानों ने ईजाद किया था. बाद में अमरीका और यूरोपीय देशों ने ग़रीब देशों को मदद के लिए यही पैमाना इस्तेमाल करना शुरू कर दिया.
अमरीका की अलबर्टा यूनिवर्सिटी की एक्सपर्ट लिंडा रीफ़ कहती हैं कि अमीर देशों ने अपने यहां के पैमाने, ग़रीब देशों पर लाद दिए हैं. उन्हीं की बुनियाद पर ग़रीब देशों की तरक़्क़ी मापी जाती है. फिर मदद दी जाती है. जैसे समलैंगिकों को मिलने वाले अधिकार या फिर धार्मिक आज़ादी.
ऐसे पैमानों पर ग़रीब देश अक्सर कमज़ोर दिखते हैं. लिंडा रीफ़ का कहना है कि हर देश के जीवन मूल्य अलग होते हैं. उन पर पश्चिमी सभ्यता के पैमाने थोपना ठीक नहीं.
इनका विरोध भले हो, मगर सोशल प्रोग्रेस इंडेक्स या रूल ऑफ़ लॉ इंडेक्स से हमें ऐसी बातों का पता चलता है, जो नज़रअंदाज़ की गईं, तो नतीजे बेहद ख़तरनाक हो सकते हैं.
अगर आप इन पैमानों पर ट्यूनिशिया को शुरू से कसते रहते, तो जो विस्फोट 2011 में हुआ, वो होने से रोका जा सकता था. लोगों की नाराज़गी इस क़दर हिंसक तरीक़े से सामने नहीं आती.
लैटिन अमरीकी देश वेनेज़ुएला दूसरी मिसाल है. पड़ोसियों के मुक़ाबले ज़्यादा अमीर रहे वेनेज़ुएला में सरकार लंबे वक़्त से जवाबदेही से बच रही थी. क़ानून का राज नहीं था. फिर भी इनकी अनदेखी की जाती रही. आज वहां के हालात अराजक हैं.
इनके मुक़ाबले अमरीका में सरकार कमज़ोर भले हुई है, मगर अब भी वो अपनी मर्ज़ी के फ़ैसले ले सकती है. इन पर अमरीकी संसद की मुहर लगवा सकती है. यानी तमाम कमियों के बावजूद अमरीका आज एक कामयाब मुल्क़ है.
तो, किस देश को महान या ख़ुशहाल कहा जा सकता है?
एक तो वो देश हैं, जिन्होंने जीडीपी के मामले पर काफ़ी प्रगति कर ली है. फिर वो देश हैं जो सामाजिक प्रगति के मोर्चे पर बाज़ी मार रहे हैं. इन देशों में ऐसी संस्थाएं-व्यवस्थाएं है, जो हालात को बिगड़ने से बचा लेंगी. आम नागरिक की मुसीबत में मदद करेंगी.
आप सिर्फ़ जीडीपी बेहतर करके नागरिकों को ख़ुशहाल नहीं बना सकते. न ही कोई नया क़ानून बनाकर. बल्कि इसके लिए सरकारों को ये दिखाना होगा कि वो नागरिकों की भलाई के लिए प्रतिबद्ध हैं. उसके लिए वक़्त-वक़्त पर ठोस क़दम उठाएंगी.
यही बातें किसी देश की ख़ुशहाली का असल पैमाना हैं.
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