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क्या मौत के बाद भी उगते हैं नाखून?
- Author, क्लाउडिया हैमंड
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
दिल धड़कना बंद हो जाता है. लहू सर्द हो जाता है. हाथ-पैर अकड़ जाते हैं. ये वो संकेत हैं जिनसे मालूम होता है कि कोई इंसान इस दुनिया से गुज़र चुका है.
लेकिन, मौत के बाद भी किसी के नाख़ून और बाल बढ़ते रहते हैं. अक्सर लोग ऐसे दावे करते हैं.
एरिक मारिया रेमार्क के उपन्यास 'ऑल क्वाइट ऑन द वेस्टर्न फ्रंट' में कहानी सुनाने वाला ये देखता है कि उसके एक दोस्त के नाख़ून मरने के बाद भी बढ़ रहे हैं. जबकि उसके दोस्त की गैंग्रीन से मौत हो चुकी है.
फिर भी उपन्यास का क़िस्सागो ये देखता है कि उसके दोस्त के सिर के बाल बड़े हो रहे हैं. ठीक उसी तरह जैसे अच्छी मिट्टी में घास तेज़ी से बढ़ती है.ये एक ऐसा ख़याल है जो सोचने पर अच्छा नहीं मालूम होता. मगर इसके चर्चे ख़ूब होते हैं.
क्या है असलियत?
अफ़सोस की बात ये है कि इस मामले में इतने क़िस्से-कहानियों के बावजूद इस पर ठोस वैज्ञानिक रिसर्च बहुत कम हुई है कि क्या मरने के बाद भी इंसान के नाख़ून और बाल बढ़ते रहते हैं.
इतिहास में ऐसे बहुत से क़िस्से दर्ज हैं. मेडिकल की पढ़ाई करने वाले कई लोगों ने इसकी मिसालों का ज़िक्र किया है. अंग प्रत्यर्पण करने वाले बहुत से सर्जनों ने भी ये पाया है कि मनुष्य के कई अंगों का आकार मरने के बाद बढ़ गया.
असल में इंसान की मौत के बाद उसके शरीर के अलग-अलग हिस्सों की कोशिकाएं अलग-अलग वक़्त पर काम करना बंद करती हैं. जब दिल काम करना बंद कर देता है, तो दिमाग़ को ऑक्सीजन की सप्लाई रुक जाती है. दिमाग़ी कोशिकाओं के पास काम करने के लिए स्टोर में ईंधन नहीं होता. इसलिए दिल धड़कना बंद होने के पांच से सात मिनट के भीतर दिमाग़ की सारी कोशिकाएं मर जाती हैं.
अगर किसी इंसान के अंगों का प्रत्यर्पण होना है, तो उसकी मौत के आधे घंटे के भीतर शरीर से जिगर, गुर्दे और दिल को निकाल लेना ज़रूरी होता है. इन्हें अगले छह घंटों में अंगदान लेने वाले के शरीर में लगाना होता है. हालांकि चमड़ी की कोशिकाएं मौत के काफ़ी देर बाद भी काफ़ी देर तक ज़िंदा रहती हैं. चमड़ी का ट्रांसप्लांट किसी इंसान के मरने के 12 घंटे बाद तक किया जा सकता है.
नाखूनों का विज्ञान
नाख़ूनों के बढ़ने के लिए ज़रूरी है कि हमारे शरीर में नई कोशिकाएं बनती रहें. हमारा शरीर बिना ग्लूकोज़ के नहीं कर सकता है. हमारे नाख़ून रोज़ाना औसतन क़रीब 0.11 मिलीमीटर की दर से बढ़ते हैं. उम्र बढ़ने के साथ नाख़ून बढ़ने की रफ़्तार धीमी हो जाती है.
नाख़ून की चमड़ी के नीचे एक परत होती है. इसे जर्मिनल मैट्रिक्स कहा जाता है. इसमें बनने वाली कोशिकाओं की वजह से ही हमारे नाख़ून बढ़ते रहते हैं. नई कोशिकाएं, नीचे से पुरानी सेल्स को धक्का देकर आगे बढ़ाती रहती हैं. इस तरह से हमारे नाख़ून ऊपर की तरफ़ बढ़ते रहते हैं.
मौत होने के बाद इन कोशिकाओं को ईंधन यानी ग्लूकोज़ की सप्लाई रुक जाती है. इसलिए नाख़ून भी बढ़ने रुक जाते हैं.
कमोबेश यही प्रक्रिया बालों के साथ होती है. हर बाल के नीचे स्थित फॉलिकिल में नई कोशिकाएं बनती रहती हैं. इन्हीं की वजह से हमारे बाल बढ़ते रहते हैं. इस फॉलिकिल मैट्रिक्स की कोशिकाएं बहुत तेज़ी से बढ़ती हैं.
इससे हमारे बाल ताक़तवर होते जाते हैं. लेकिन ये तभी होता है, जब इन कोशिकाओं को ईंधन की सप्लाई बेरोक-टोक होती रहती है. यानी ख़ून के ज़रिए इन कोशिकाओं तक ग्लूकोज़ पहुंचता रहता है. मौत होने के बाद दिल धड़कना बंद होता है. इससे शरीर में ख़ून का बहाव रुक जाता है. नतीजा ये कि हमारे बालों का बढ़ना भी रुक जाता है. क्योंकि इन्हें बढ़ाने वाली कोशिकाओं को ख़ुराक ही नहीं मिलती.
क्यों होती रहती है ऐसी बात?
अब सवाल ये है कि इन वैज्ञानिक तथ्यों के बावजूद मौत के बाद भी नाख़ूनों और बालों के बढ़ने की बात क्यों होती रहती है?
हालांकि ये सारे के सारे दावे ग़लत होते हैं. मगर ऐसी अटकलों की एक वैज्ञानिक वजह ज़रूर है. असल में मौत के बाद लोगों के नाख़ून या बाल नहीं बढ़ते. मगर, ख़ून की सप्लाई रुकने की वजह से इनके इर्द-गिर्द की चमड़ी सूख कर सिकुड़ जाती है. यही वजह है कि नाख़ून और बाल मरने के बाद बढ़े हुए मालूम होते हैं.
मौत के बाद दफ़नाने से पहले कई बार चमड़ी को गीला भी किया जाता है, ताकि चेहरा सामान्य दिखे.
मरे हुए इंसान की ठोढ़ी के आस-पास की चमड़ी भी सूख जाती है. इससे ये खोपड़ी की तरफ़ खिंच जाती है. इसी वजह से मरने वाले की दाढ़ी भी बढ़ी हुई लगती है.
तो, अगर आपके ज़हन में ये ख़याल है कि क़ब्रिस्तानों में क़ब्र से निकले हुए नाख़ून दिखते हैं. लाशों से उगे हुए बाल दिखते हैं. तो ऐसे ख़यालों को दिमाग़ से निकाल दें.
हॉरर फ़िल्मों और डरावने उपन्यासों में इनका ज़िक्र भले होता रहा हो, हक़ीक़त से इन तस्वीरों का कोई वास्ता नहीं.
(मूल लेख अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)