भारत में कभी चल पाएंगी ऑटोमैटिक कारें?

    • Author, ऐड गेंट
    • पदनाम, बीबीसी फ्यूचर

हिंदुस्तान में सड़कें बेशक़ीमती हैं. एक-एक इंच सड़क का सदुपयोग होता है. ज़रा सी जगह दिखी नहीं कि घुसा दी कोई कार, स्कूटर या साइकिल.

सड़क इस्तेमाल करने वालों की तादाद इतनी है कि जानवर भी सड़क पर अपना हक़ समझते हैं. कहीं, कुत्ते, तो कहीं गाय-बैल या भैंस. तो, कहीं हाथी-ऊंट या घोड़े.

कुल मिलाकर ये कहें कि भारत की सड़कें, सड़कें नहीं बल्कि अजायबघर हैं- तो ग़लत नहीं होगा. आपको सड़क पर चलते वक़्त 60 सेकेंड में सत्तर विकल्प सोचने होते हैं. आप के आगे की कार दाएं जाएगी या बाएं मुड़ेगी? सीधी जाएगी या फिर अचानक ब्रेक मार देगी? कुछ भी पता नहीं होता.

जगह हो या ना हो, आपके दाएं या बाएं से लोग आगे निकलने की कोशिश करेंगे. ट्रैफिक सिग्नल अक्सर ख़राब होते हैं. ज़रा सी रफ़्तार धीमी हुई नहीं कि पीछे वाला हॉर्न बजाकर आपके कान के पर्दे फाड़ देने पर आमादा होगा.

अपना रास्ता निकालने का हुनर

सड़कों पर दिखने वाले इस पागलपन में भी एक क़ायदा दिखता है. सब लोग बड़े आराम से भारी भीड़ के बीच भी अपना रास्ता निकालते हुए चले जाते हैं. किसी और देश में हों, तो इतने में तो न जाने कितने हादसे हो जाएं. पर भारत में आप आराम से गाली देते हुए ड्राइव करते निकल जाते हैं.

भारत की सड़कों पर दिखने वाले इस पागलपन की कई वजहें हैं. पहली वजह तो सड़क से ज़्यादा तेज़ी से बढ़ती गाड़ियां हैं. साल 2000 से 2013 के बीच हिंदुस्तान में गाड़ियों की तादाद चार गुनी बढ़ गई. अब सड़कों में तो इतना इज़ाफ़ा हुआ नहीं, ऐसे में ज़ाहिर है कि सड़क के हर इंच पर गाड़ी तो दिखेगी ही. दूसरी वजह, आबादी की रॉकेट जैसी रफ़्तार. शहरों में बढ़ती भीड़ ने हालात और बिगाड़ दिए हैं.

वैसे, ये हाल सिर्फ़ भारत का हो, ऐसा नहीं है. चीन, ब्राज़ील और फिलिपींस जैसे देशों में भी ऐसे ही मंज़र आम हैं.

बहुत सी तकनीकी कंपनियों के लिए भारत की सड़कें तजुर्बे की जगह हैं. जहां पर बेहतर भविष्य की तकनीक का परीक्षण किया जा रहा है.

बिना ड्राइवर की कार

अब, सड़कों पर भीड़ बढ़ने को तो हम रोक नहीं पा रहे हैं. ऐसे में बेहतर यही होगा कि हम इसी के साथ जीने और इसी में तकनीकी बेहतरी से विकल्प तलाशने की कोशिश करें. ऐसा ही ख़्याल है, बिना ड्राइवर की कार का जो कई देशों में टेस्ट की जा रही है.

वैसे तो ऐसी कारें ज़्यादातर पश्चिमी देशों में ही आज़माई जा रही हैं. मगर भारत की भीड़ भरी सड़कें, ऑटोमैटिक कारों के लिए अच्छा टेस्टिंग ग्राउंड साबित हो सकती हैं. हालांकि उबर के पूर्व सीईओ ट्रैविस कलानिक जैसे कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो भारत में ख़ुद से चलने वाली कारों को लेकर बिल्कुल ही नाउम्मीद हैं.

लेकिन, कई कंपनियां ऐसी हैं जो बनावटी अक़्ल यानी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की तकनीक का भारत की सड़कों पर परीक्षण कर रही हैं. ऐसी ही कंपनी है टाटा एलेक्सी. इस कंपनी ने कुछ कारें बना ली हैं, जिनका बंगलुरु में टेस्ट हो रहा है.

टाटा एलेक्सी के मार्केटिंग प्रमुख नितिन पाई कहते हैं कि भारत में ड्राइविंग बहुत ख़राब है. कोई भी नियम के हिसाब से नहीं चलता.

बिना ड्राइवर की कार चलेंगी कैसे?

खुद से चलने वाली कारें, मशीनों से सीखती हैं. वो ढेर सारे आंकड़ों की मदद से सामने और दाहिने-बाएं तरफ़ से आने वाली गाड़ियों का हिसाब लगाती हैं. इसके बाद वो अपना रास्ता तय करती हैं. ऐसी कारें फिलहाल अमरीका के सेंट पीटर्सबर्ग और सैन फ्रांसिस्को में टेस्ट की जा रही हैं. इसके अलावा जापान और चीन के कुछ छोटे शहरों में भी इन्हें परखा जा रहा है.

इन देशों में ड्राइवर उतना पागलपन नहीं दिखाते, जितना हिंदुस्तान में दिखता है. ट्रैफिक सिग्नल काम करते हैं. सड़कों पर भीड़ नहीं होती.

टाटा एलेक्सी ने सड़कों पर भीड़ के आंकड़े जर्मनी की कंपनी कार्ल्सरू से लिए हैं. ये आंकड़े जर्मनी की सड़कों के हैं, जो भारत से बिल्कुल अलग होती हैं. अब जीपीएस और सेंसर से लैस टाटा एलेक्सी की गाड़ी, इन आंकड़ों की मदद से ख़ुद से सड़क पर अपना रास्ता तलाशती है.

कंपनी के अधिकारी राजेश कुमार कहते हैं कि मशीन उतनी ही अच्छी हैं जितने उसके पास आंकड़े हैं. अब जर्मनी के आंकड़ों के हिसाब से तो भारत में ख़ुद से चलने वाली कारें नहीं बनाई जा सकतीं.

कारों के सामने इंसान के साथ जानवर भी

राजेश कहते हैं कि विदेशी सड़कों के आंकड़े में ऑटोरिक्शा या साइकिल रिक्शा के आंकड़े नहीं होंगे. मगर भारत की हर सड़क पर इनकी भरमार है. इसके अलावा स्कूटर, बाइक और जानवर भी सड़क पर चलते हैं. सड़क पर कभी भी आपका सामना बंदर, कुत्ते, घोड़े, गाय-बैल या भैंसों से भी हो सकता है.

ऐसे में भारतीय सड़कों के आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई सेल्फ ड्राइविंग कारें, बहुत मुश्किल हालात झेलने के लिहाज़ से तैयार होंगी. टाटा एलेक्सी तमाम सेंसर लगी हुई गाड़ी को ऐसी ही भीड़-भरी सड़कों से गुज़ार कर पहले आंकड़े इकट्ठे करती है. फिर इन आंकड़ों की मदद से अपनी सेल्फ ड्राइविंग कार की टेस्टिंग करती है.

टाटा एलेक्सी को लगता है कि उनकी सेल्फ ड्राइविंग कार के पहले ग्राहक तो पश्चिमी देश होंगे. मगर, आगे चलकर भारतीय बाज़ार में भी इस तकनीक की मांग बढ़नी तय है.

तेज़ तर्रार होगा ट्रांसपोर्ट सिस्टम?

टाटा एलेक्सी के अलावा आईआईटी मद्रास में भी ऐसा ही रिसर्च चल रहा है. इस रिसर्च की अगुवाई ललिता देवी कर रही हैं, जो आईआईटी मद्रास में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं.

वो बेहद तेज़-तर्रार ट्रांसपोर्ट सिस्टम विकसित करने में लगी हैं. हालांकि ब्रिटेन और अमरीका जैसे देशों में ये तकनीक काफ़ी वक़्त से काम में लाई जा रही है.

ललिता की टीम ने वीडियो कैमरा का एक नेटवर्क तैयार किया है. ये कैमरे चेन्नई की सड़कों पर ट्रैफिक की निगरानी करते हैं. ये आंकड़ा आईआईटी में ललिता की लैब में भेजा जाता है.

ललिता कहती हैं कि पश्चिमी देशों में दो गाड़ियां एक दूसरे से बेहद करीब चलती हैं. लेकिन यहां तो दो गाड़ियों के बीच में भी कोई गाड़ी आ जाती है.

ललिता के कुछ शागिर्द ऐसा स्कूटर बनाना चाहते हैं, जो भीड़ भरे इलाक़ों में आराम से निकल सके. इसके लिए आंकड़ों की ज़रूरत होगी.

लेन में कोई चलता नहीं, आंकड़े क्या कर पाएंगे?

आईआईटी मद्रास की टीम अपने जीपीएस से सरकारी बसों को ट्रैक करती है और उनके आने-जाने का सही वक़्त बताती है. ये तकनीक लोगों के काफ़ी काम आ सकती है. क्योंकि लोग बसों से चलना चाहते हैं. मगर सरकारी बसों का भरोसा नहीं होता, इसीलिए वो अपनी निजी गाड़ियां लेकर सड़कों पर उतरने को मजबूर होते हैं.

आईआईटी मद्रास से तकनीकी मदद मिलने पर ट्रैफिक पुलिस को जाम हटाने में काफ़ी मदद मिल सकती है.

ललिता बताती हैं कि सड़क पर भीड़ के आंकड़े जमा करने के लिए ज़मीन के नीचे सेंसर वाले तार बिछाए गए हैं. दिक़्क़त ये है कि भारत में कोई भी अपनी लेन में चलता ही नहीं. ऐसे में ये आंकड़े कितने कारगर होंगे, ये देखना होगा.

टाटा एलेक्सी या आईआईटी मद्रास में चल रहे प्रोजेक्ट काफी दिलचस्प मालूम होते हैं. मगर ये तजुर्बे अभी शुरुआती दौर में हैं. साथ ही ये दूसरे देशों के आंकड़ों पर गौर करके तकनीक विकसित कर रहे हैं.

तकनीक के देसी विकल्प

फिर हिंदुस्तान में विदेशी तकनीक या विदेशी सामान को लेकर दिलचस्पी भी बहुत ज़्यादा है. हालांकि मोदी सरकार देसी तकनीक को बढ़ावा देने की बात कर रही है. इसी के तहत स्मार्ट सिटी योजना में देसी तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. ललिता देवी को उम्मीद है कि सरकार के ज़ोर देने की वजह से सरकारी अफ़सर, तकनीक के देसी विकल्प आजमाएंगे.

अब अगर बस के आने का सही समय मालूम हो, तो बहुत से लोग बस से सफ़र करना पसंद करेंगे. इसके अलावा अगर ट्रैफिक लाइट ख़राब न हों, ठीक से काम करें, तो भी ट्रेफिक जाम की दिक़्क़त को कम किया जा सकता है.

फिलहाल तो ये तकनीक ऐसी गाड़ियों की मदद कर सकती है, जो इंसान चलाते हैं. खुद से चलने वाली कारों के लिए अभी बहुत ढेर सारा आंकड़े जुटाने की ज़रूरत है.

कुछ लोगों का मानना है कि भारत में लोगों की ड्राइव करने की आदत को बदलने की ज़रूरत है. हालांकि ये कमोबेश नामुमकिन है. यहां तो लोग बहाव के साथ बहना पसंद करते हैं.

ललिता कहती हैं कि सड़क पर लोग जिस तरह चलते हैं, उससे साफ है कि हिंदुस्तान के चलने का ढंग ऐसे ही रहने वाला है.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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