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नज़रिया- 'सड़क पर नहीं आया तो किसान की कौन सुनेगा'
- Author, हरवीर सिंह
- पदनाम, संपादक, आउटलुक हिंदी
बीते कुछ महीनों में भारत ने किसानों के अनूठे और हिंसक प्रदर्शन देखे हैं.
जहां देश की राजधानी तमिलनाडु में किसानों ने लंबा प्रदर्शन किया तो मध्य प्रदेश में बेकाबू किसानों के आंदोलन को रोकने के लिए पुलिस को गोलियां चलानी पड़ी.
महाराष्ट्र में हाल ही में किसानों ने 11 दिनों के बाद विरोध प्रदर्शन बंद किए हैं.
आख़िर भारत का किसान आज सड़कों पर अपनी मांगें लिए क्यों खड़ा है?
बात सिर्फ महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की नहीं है, कल को ये हरियाणा और कई अन्य प्रदेशों में भी हो सकता है. किसानों का प्रदर्शन बताता है कि परिस्थितियां बिगड़ी हैं.
बाज़ार और सरकार के फ़ैसले किसान के ख़िलाफ़ गए हैं. और किसानों के आंदोलन से साबित करते हैं कि उनका अब सरकार के आश्वासनों पर भरोसा नहीं रह गया है.
दो साल पहले लगातार सूखा पड़ा, कुछ इलाकों में पिछला मानसून सामान्य था फसल भी अच्छी हुई लेकिन किसान को उसका दाम नहीं मिला.
देश में दालों का संकट था तो सरकार ने कई कदम उठाए ताकि किसान अधिक दाल पैदा करे. लेकिन किसान आंदोलनों के मौजूदा मामलों में या तो सरकारों ने फसल खरीदी ही नहीं या फिर उसका समर्थन मूल्य काफी नीचे चला गया.
कई जगहों पर किसानों ने प्याज़ और टमाटर सड़क पर ही गिरा दिए. हरियाणा में तो मामला इतना बिगड़ा कि बासमती चावल जो 5000 रुपये क्विंटल बिकता था, वो 1500-1600 तक आ गया. दूध, अंगूर सब का यही हाल है.
कीमतों पर नियंत्रण
देश में कई जगहों पर किसान को लगा कि सरकार हमारे साथ नहीं है. जहां दालों का जबर्दस्त आयात हुआ, वहीं निर्यात पर मिनिमम एक्सपोर्ट प्राइस लगाकर उस पर अंकुश लगा दिया गया.
राज्य स्तर पर कई सरकारों ने किसानों से कर्ज़ माफ करने का वायदा किया था, लेकिन केंद्र इस पर कोई मदद करने के लिए तैयार नहीं है.
राज्य सरकारें इसे लटका रही हैं तो ऐसे में किसान को लगा कि अगर मैं सड़क पर नहीं आया तो कोई मेरी बात नहीं सुनेगा.
इस महीने की 16 तारीख को देश के 60 से अधिक किसान समूह एकत्र हो रहे हैं और व्यापक आंदोलन की संभावना है.
सरकार अगर लोगों को सस्ता भोजन देना चाहती है तो वो इसके लिए सब्सिडा दे, ना कि किसान को तंग करके कीमतों पर नियंत्रण रखने की कोशिश करे.
इसके लिए केंद्र सरकार ऐसा क्या कर सकती है जो वो नहीं कर रही है. हरवीर सिंह कहते हैं कि किसानों को ब्याजमुक्त ऋण दिया जाना चाहिए.
जब कॉर्पोरेट को दिए ऋण माफ किए जा सकते हैं, तो किसान भी इसी देश का नागरिक ही तो है.
कहते हैं कि भारतीय बैंकिंग सिस्टम में प्रमुख लोग माफी के ख़िलाफ़ हैं लेकिन कुछ फसलों को छोड़ा जाए तो अधिकतर किसान अपना कर्ज़ समय पर चुकाते हैं.
(आउटलुक हिंदी के संपादक हरवीर सिंह से बातचीत पर आधारित. उनसे बात की बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने)
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