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पूरब और पश्चिम की सोच अलग क्यों है?
- Author, डेविड रॉबसन
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
आपको मनोज कुमार की फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' तो याद होगी! फ़िल्म का वो गाना...है प्रीत जहां की रीत सदा...बेहद मशहूर हुआ था. फ़िल्म की कहानी पूरब की सभ्यता और पश्चिम की सभ्यता का फ़र्क़ बताने वाली थी. पूरब और पश्चिम में बोली-भाषा, खान-पान, रहन-सहन से लेकर सोच और बर्ताव तक में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है. मनोज कुमार ने अपनी फ़िल्म में पश्चिमी समाज-सभ्यता और भारतीय जीवन दर्शन के बीच के इसी फ़ासले को पेश किया था.
मगर पूरब और पश्चिम की सभ्यताओं में फ़र्क़ है, ये तो सबको पता है. हम जीवन दर्शन में आगे हैं. वो, साइंस में आगे हैं. हमारा ज़ोर आध्यात्म पर है. पश्चिमी देशों में दुनियावी सुख पर ज़ोर दिया जाता है. हमारे समाज में सब-कुछ सार्वजनिक है. साझा है. वहां निजता पर ज़ोर है.
आपने कभी सोचा कि ये फ़र्क़ किस वजह से है? आख़िर इंसान एक है, तो उसके बीच सोच का ये फ़ासला क्यों?
आज ये समझने की कोशिश की जा रही है कि जापान के लोग तकनीक के मामले में सबसे आगे क्यों हैं? या विज्ञान की दुनिया में अमरीका या पश्चिमी देशों के लोग ही क्यों आगे रहते हैं?
हम जिस तरह के माहौल में रहते हैं, उसका असर हमारे सोचने समझने की सलाहियत पर भी पड़ता था. जिस तरह पूरब पश्चिम के देशों या अकेले अमरीका में ही अलग-अलग सोच के लोग हैं, उससे ज़ाहिर होता है कि हमारा इतिहास, संस्कृति, भौगोलिक और सामाजिक माहौल मिलकर इंसान के सोचने के तरीक़े पर असर डालते हैं. यही तमाम देशों के लोगों की सोच में फ़र्क़ की सबसे बड़ी वजह है.
साल 2010 में बिहैवियरल ऐंड ब्रेन साइंसेज नाम की पत्रिका में एक लेख छपा था. इसे कई वैज्ञानिकों ने अपने तजुर्बे के आधार पर लिखा था. इसके मुताबिक़ एशियाई और पश्चिमी देशों के लोगों के दरम्यान सबसे बड़ा अंतर 'व्यक्तिवाद' और 'समूहवाद' का है. रिसर्च की बुनियाद पर ज़्यादातर जानकारों का मानना है कि पश्चिमी देशों के लोग ख़ुदपरस्त होते हैं. वो किसी और के बारे में सोचने से पहले ख़ुद अपने बारे में सोचते हैं. उनके लिए अपनी ख़ुशी सबसे पहले आती है. ऐसा करके वो अपना आत्मविश्वास बढ़ाते हैं.
अमरीकियों में ख़ुद के बारे में ग़ज़ब की ख़ामख़याली होती है. क़रीब 94 फ़ीसद अमरीकी प्रोफेसर मानते हैं कि वो बाक़ी दुनिया के प्रोफ़ेसर्स के मुक़ाबले बेहतर हैं.
वहीं एशियाई देशों के लोग, ख़ास तौर से भारत, चीन और जापान के लोग सिर्फ़ अपने बारे में ना सोचकर समूह के बारे में सोचते हैं. वो अक्सर अपनी क़ाबिलियत को कम करके बताते हैं.
पश्चिमी देशों के लोग अपनी निजी पसंद और आज़ादी को सबसे ज़्यादा तरजीह देते हैं.
ये लेख लिखने वालों में अमरीका की ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी के जोसेफ हेनरिक भी थे. वो कहते हैं कि हम जिस तरह के सामाजिक तानेबाने से निकलकर आते हैं, उसका असर हमारी तार्किक क्षमताओं पर भी पड़ता है. पूर्वी सभ्यता के लोग रिश्तों को ज़्यादा गंभीरता और गहराई से देखते हैं. साथ ही वो हर एक समस्या को दूसरी मुश्किलों से जोड़कर उसका हल तलाशते हैं.
वहीं पश्चिमी सभ्यता में लोग, हर समस्या को उसी स्तर पर निपटाना चाहते हैं. वो दो मुसीबतों को जोड़कर नहीं देखते. उन्हें लगता है जो हालात हैं, वो हैं. उनका किसी और बात से ताल्लुक़ नहीं.
मिसाल के लिए अगर आप व्यक्तिवादी, यानी पश्चिमी देशों में रहने वाले किसी शख़्स को ऐसी तस्वीर दिखाते हैं जिसमें एक लंबे क़द वाला इंसान छोटे क़द वाले को कुछ समझा रहा है, या डांट रहा है. इसे देखने के बाद वो यक़ीनन यही कहेगा कि लंबा आदमी बहुत ख़राब है. वहीं पूर्वी देशों के लोग इसी तस्वीर को देखकर पहले छोटे और बड़े आदमी के बीच रिश्ता तलाशेंगे. जैसे कि वो ये सोचेंगे कि कहीं लंबे कद वाला छोटे कद वाले का बॉस या पिता तो नहीं.
कुछ जानकार मानते हैं कि अलग-अलग समाज में रहने वालों की सोच के इस फ़र्क़ की वजह आनुवांशिक है. यानी उन्हें पुश्तैनी तौर पर ऐसी सोच मिलती है.
लेकिन कुछ जानकारों ने इस दावे को अपने तजुर्बे में ग़लत पाया. ब्रिटेन की एक्सटर यूनिवर्सिटी के अलेक्स मसूदी ने ब्रिटेन में रहने वाले बांग्लादेशी मूल के लोगों पर एक तजुर्बा किया. उन्होंने पाया कि बांग्लादेश से आकर बसे लोगों के बच्चों की सोच, ब्रिटिश बच्चों जैसी थी. वो वहीं पैदा हुए और पले-बढ़े थे. इसलिए उन्हें ब्रिटिश समाज से ज़्यादा सीखने को मिला. वहीं उनके मां-बाप अपने वतन वालों के ज़्यादा क़रीब की सोच रखते थे.
इस मुद्दे पर नज़र रखने वाले अमरीका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के रिचर्ड निस्बेट कहते हैं कि आप जिस समाज में रहते हैं, वहां के जीवन मूल्य अपना लेते हैं. पश्चिमी देश का रहने वाला कोई शख़्स भारत, चीन या जापान में रहने लगता है, तो वहां के रंग में रंग जाता है. इसी तरह भारतीय या चीनी लोग जब पश्चिमी देशों में जाकर बसते हैं, तो वहां की सोच उन पर असर डालती है.
रिचर्ड निस्बेट मानते हैं कि पूरब के देशों में सबको साथ लेकर चलने का पाठ पढ़ाया जाता है. जैसे भारत में ही 'वसुधैव कुटुम्बकम' का सबक़ याद कराया जाता है. यानी ये समझाया जाता है कि पूरा विश्व एक परिवार है. इसी तरह चीन में ताओ धर्म में समाज के प्रति जवाबदेही, राजा के प्रति आदर का पाठ पढ़ाने के सबक़ हैं. हमारे देश में भी कहा जाता है कि बड़े बुजुर्ग हों, या राजा सबके प्रति सम्मान का भाव होना चाहिए.
इनके मुक़ाबले पश्चिमी देशों में निजता पर ज़ोर होता है. इतिहासकार, फ्रेडरिक जैक्सन टर्नर ने इस बारे में काफ़ी काम किया है. वो कहते हैं कि अमरीका में व्यक्तिवाद हावी होने की बड़ी वजह ये है कि जब यूरोपीय लोग यहां आकर बसे, तो हर शख़्स का दूसरे से मुक़ाबला था. मुक़ाबला, ज़्यादा से ज़्यादा ज़मीन पर क़ब्ज़े का, नए इलाक़े जीतने का. विस्तार का. इस मुक़ाबले में साथ रहने का भाव नहीं था. अब नस्ल दर नस्ल अमरीकियों में वही भावना भरती जाती है. इसीलिए वो इतने ख़ुदगर्ज़ होते हैं.
जापान के उत्तरी द्वीप होकैडो के बारे में भी यही कहा जाता है. बरसों तक ये द्वीप वीरान पड़ा था. यहां गिने-चुने आदिवासी रहते थे. मगर उन्नीसवीं सदी में रूस के हमले के डर से जापान के राजा मेजी ने यहां लोगों को बसाना शुरू किया. वहां खेती कराने के लिए जापान ने अमरीका से कई जानकार बुलाए. इन लोगों ने कुछ ही सालों ने होकैडो द्वीप की रंगत ही बदल डाली. विस्तार की भावना होकैडो में रहने वालों में इस क़दर भर गई, कि आज ये जापान के पड़ोसी द्वीप होंशु के रहने वालों से बिल्कुल अलग सोच वाले लोग होते हैं. इन पर अमरीकी ख़याल ज़्यादा हावी हैं.
2008 में वैज्ञानिक कोरे फिंचर इसकी अलग ही थ्योरी लेकर आए. उन्होंने कहा कि जो लोग अक्सर बीमार होते हैं. वो दूसरों से ज़्यादा हमदर्दी रखते हैं. सबको साथ लेकर चलने वाले होते हैं. वहीं मज़बूत लोग ख़ुदपरस्त होते हैं.
कुछ जानकार मानते हैं कि कई बार इलाक़ा, नदी या और क़ुदरती चीज़ें भी हमारी सोच पर असर डालती हैं.
पूरब और पश्चिम की सोच के फ़र्क़ की वजह बताने वाली ऐसी ही, सबसे मज़ेदार थ्योरी तो अमरीका की शिकागो यूनिवर्सिटी से आई. हाल ही में यहां के प्रोफ़ेसर थॉमस टालहेम ने चीन के 28 सूबों का दौरा किया. जिसके बाद उन्होंने पाया कि असल में इस फ़ासले की वजह तो खान-पान और फ़सलें हैं.
जब थॉमस टालहेम उत्तरी चीन यानी राजधानी बीजिंग गए, तो उन्होंने पाया कि वहां के लोग बहुत मिलनसार थे. अगर वो अकेले बैठे खाना खा रहे होते थे, तो लोग उनके पास आकर बतियाने लगते थे.
मगर जब प्रोफ़ेसर थॉमस दक्षिणी चीन के शहर ग्वांगज़ो गए तो उन्हें यहां के लोगों का रवैया एकदम अलग दिखा. लोग कटे-कटे से रहते थे.
थॉमस टालहेम का मानना है कि उत्तरी चीन में गेहूं की फ़सल ज़्यादा होती है. जिसमें मेहनत कम है. गिने-चुने लोग मिलकर ये खेती कर लेते हैं. वहीं दक्षिणी चीन में धान ज़्यादा उगाया जाता है. धान के लिए मेहनत ज़्यादा करनी पड़ती है. खेती के लिए लोगों को आपस में सहयोग करने की भी ज़रूरत होती है.
इस थ्योरी को परखने के लिए थॉमस टालहेम ने दोनों ही इलाक़ों के एक हज़ार से ज़्यादा लोगों से बात की. उन्हें समूह की तस्वीरें बनाने को कहा गया. टालहेम ने देखा कि गेहूं की खेती वाले इलाक़े में लोग समूह में भी अपनी तस्वीर बड़ी बनाते थे. वहीं धान की बुवाई वाले इलाक़े के लोगों ने सबकी बराबर तस्वीर ही उकेरी. यानी जिस इलाक़े में गेहूं बोया जाता था, वहां के लोग व्यक्तिवादी थे. अपनी निजता पर भरोसा करते थे. ख़ुदपरस्त मालूम हुए. वहीं धान की बुवाई वाले इलाक़े के लोग आपसी तालमेल का भाव रखते थे.
प्रोफ़ेसर थॉमस का मानना है कि दो तरह की इस सोच के बीच चीन की यांग्त्जी नदी की दीवार थी. नदी के उस पार यानी उत्तर में वैसे लोग थे, जो ज़्यादा ख़ुदपरस्त थे. वहीं नदी के इस पार के लोग सबको साथ लेकर चलने वाली विचारधारा के हामी मालूम हुए.
तो, क्या नतीजा ये निकाला जाए कि दाना-पानी हमारी सोच पर असर डालता है? पूरब और पश्चिम के फ़र्क़ की बड़ी वजह खान-पान है.
वैसे पानी का तो फ़र्क़ पड़ता है. आख़िर आपने हिंदुस्तान के बारे में वो कहावत तो सुनी होगी न, 'कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी'. यानी भारत में हर कोस पर पानी का मिज़ाज बदल जाता है. और चार कोस पर लोगों की बोली बदल जाती है.
तभी तो सूबे क्या, ज़िले बदलते ही लोगों के मिज़ाज बदले नज़र आते हैं.
सबसे खरी बात तो स्कॉटलैंड की एडिनबरा यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर दिलावर हुसैन कहते हैं. प्रोफ़ेसर हुसैन मानते हैं कि सभ्यताओं के फ़र्क़ की वजह, इलाक़े से लेकर खान-पान और इतिहास तक हो सकती हैं. किसी एक वजह को बुनियाद बनाना ठीक नहीं होगा. प्रोफ़ेसर हुसैन मानते हैं कि कई ऐसी बातें हैं, जहां पूरब और पश्चिम की सभ्यताओं का मेल भी होता है. हर सभ्यता से जुड़े कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो दूसरी सभ्यता के ज़्यादा क़रीब मालूम होते हैं.
तभी तो ये दुनिया रंग बिरंगी मालूम होती है. ये फ़र्क़ न होता, तो भारत कुमार...मतलब मनोज कुमार, 'पूरब और पश्चिम' फ़िल्म कैसे बनाते?
फिर..कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे, तड़पता हुआ जब तुम्हें छोड़ दे...
तो, ये सोचना कि शायद उस दिन उसने किसी ख़ास नदी का पानी पी लिया, या कुछ ऐसा खा लिया कि ख़ुदग़र्ज़ बनकर ऐसा कर गया.
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