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औरत-मर्द के मिज़ाज और सोच अलग होते हैं?
- Author, क्रिश्चियन जैरेट
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
हम आप अक्सर सुनते हैं कि औरत और मर्द में बहुत फ़र्क़ होता है. इस बात का मज़ाक़ भी बनता है.
इस पर बहुत सी क़िताबें भी लिखी गई हैं. मसलन, अमरीकी लेखक जॉन ग्रे की क़िताब, 'मेन आर फ्रॉम मार्स, विमेन आर फ्रॉम वीनस'.
इसी तरह और भी बहुत सी क़िताबें लिखी गई हैं जिनका ज़ोर यह साबित करने पर रहा है कि औरतों और मर्दों में बहुत फ़र्क़ होता है. बहुत सी फ़िल्में भी बनी हैं और नाटक-टीवी सीरियल भी.
औरतों और मर्दों के बीच डील-डौल का फ़र्क़ तो सबको समझ में आता है. पर क्या दोनों के मिज़ाज और उनकी सोच में भी बहुत अंतर होता है? इस बात की कई मनोवैज्ञानिकों ने पड़ताल की है. ज़्यादातर के नतीजे कमोबेश एक जैसे ही आए हैं.
इसमें सबसे चर्चित प्रयोग पालो कोस्टा, रॉबर्ट मैक्रे और एंतोनियो टेराचियानो ने मिलकर साल 2001 में किया था.
इसमें भारत, अमरीका, ब्रिटेन, जापान, सिंगापुर और हांगकांग समेत 26 देशों के 23,000 से ज़्यादा लोगों ने हिस्सा लिया था. इन सबसे अपनी-अपनी ख़ूबियों की रेटिंग करने को कहा गया था.
औरतों ने ख़ुद को दोस्ताना, हमदर्द और गर्मजोशी के पैमाने पर मर्दों से बेहतर बताया था. वहीं मर्दों ने ख़ुद को अपनी बात मज़बूती से रखने वाला और खुले मिज़ाज वाला करार दिया था.
इस रेटिंग में महिलाओं ने दूसरों की राय पर रज़ामंदी और तनाव, फिक्र जैसे मोर्चे पर आगे बताया था. वहीं मर्दों ने ख़ुद को तजुर्बे और दूसरों से खुले दिमाग़ से मिलने के मोर्चे पर आगे ठहराया था.
ऐसा ही एक प्रयोग 2008 में हुआ था. जिसमें 55 देशों के 17,000 से ज़्यादा लोगों ने हिस्सा लिया था.
इसमें भी महिलाओं ने दूसरों की राय पर राज़ी होने और कुछ दिमाग़ी परेशानियों के मोर्चे पर ख़ुद को आगे बताया था. साथ ही गर्मजोशी और हंसी-मज़ाक़ के मामले पर भी महिलाओं ने ख़ुद के मर्दों से आगे होने का दावा किया था.
दोनों ही रिसर्च पर लोगों ने सवाल उठाए थे. सबसे बड़ा सवाल यह था कि इन दोनों ही प्रयोगों में औरतों और मर्दों ने ख़ुद की रेटिंग की थी.
अक्सर लोग उसी तरह सोचते हैं जैसा समाज उनके दिमाग़ में उनके बारे में बातें डालता है. ऐसे में जानकारों का कहता था कि दोनों ही तजुर्बों में औरतों और मर्दों की ईमानदार राय सामने नहीं आई.
हालांकि रॉबर्ट मैक्रे और उनके साथियों ने 55 देशों के 12,000 लोगों से जब औरतों और मर्दों की ख़ूबियां जानने की कोशिश की, तो कमोबेश पुराने सर्वे जैसे नतीजे ही सामने आए.
साल 2013 में हुए एक रिसर्च में ये भी पता चला कि बचपन से ही लड़के और लड़कियां अलग तरह का बर्ताव करने लगते हैं.
इस रिसर्च में 357 जुड़वां बच्चों के बर्ताव की निगरानी की गई थी. जिसमें पता चला कि लड़के ज़्यादा सक्रिय थे, वहीं लड़कियां आमतौर पर ज़्यादा शांत और शर्मीली थीं. लड़के बिंदास थे.
बचपन में आया यह फ़र्क़ बुढ़ापे तक बना रहता है, चाहे वो शर्मीलापन हो या फिर खुलकर इज़हार करने की आदत.
मनोवैज्ञानिक और मानवविज्ञानी, दोनों ही इस बात पर एकमत हैं कि यह इंसान की क़ुदरती विकास की प्रक्रिया से हुआ है. क्योंकि ज़्यादा हमदर्दी और रज़ामंदी का भाव रखने वाली औरतें, बच्चों की परवरिश बेहतर कर पाती हैं.
वे बेहतर साथी भी तलाश लेती हैं. वहीं आक्रामक मर्द, मादा साथी की तलाश में बाज़ी मार ले जाते हैं. उन्हें बेहतर साथी मिलते हैं.
आदि मानवों के बीच हुए इस संघर्ष में जो कामयाब रहे, वो गुण पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते हुए हम लोगों तक पहुंचे.
लेकिन बहुत से जानकार इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. वे मानते हैं कि मानव के बर्ताव पर समाज और संस्कृति का गहरा असर पड़ता है. औरतों और मर्दों के बर्ताव में फ़र्क़ की वजह उनका माहौल ज़्यादा है.
वैसे हर समाज में औरतो और मर्दों को बराबरी का हक़ हासिल नहीं. तरक़्क़ी कर चुके देशों में भी ये फ़र्क़ देखा जाता है. इसका असर औरतों और मर्दों के मिज़ाज पर पड़ता है. इस बारे में और भी कई प्रयोग हुए हैं.
इटली की पाडुआ यूनिवर्सिटी और तूरिन यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञानियों ने जो प्रयोग किए हैं. उनमें यह बात सामने आई है कि औरतों और मर्दों के किरदार पर माहौल का असर पड़ता है. साथ ही कुछ फ़र्क़ उनमें क़ुदरती तौर पर भी रहता है.
लेकिन सभी तजुर्बे मिलाकर किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने में नाकाम रहे हैं. ऐसे में ये बहस अभी लंबी खिंचनी तय है.
औरतों और मर्दों में डील-डौल के साथ मिज़ाज का फ़र्क़ होता है, इससे किसी को इनकार नहीं. लेकिन, दोनों ही इंसान हैं और इसीलिए फ़र्क़ से ज़्यादा दोनों में समानताएं होती हैं. शायद हमें इस बात पर ज़्यादा ज़ोर देने की ज़रूरत है.
पीढ़ी दर पीढ़ी, औरतों को संवारने और बेहतर करने में मर्दों का योगदान रहा है. इसी तरह मर्दों की कामयाबी के पीछे औरतों का हाथ रहा है.
दोनों में फ़र्क़ तलाशना एक पेंचीदा मसला है. बेहतर हो कि हम इस फ़र्क़ को पाटने और दोनों को बराबर समझने पर ज़ोर दें. इससे इंसानियत का ज़्यादा भला होगा.