दुनिया के सबसे जीवट जीव, जो कभी हार नहीं मानते

टार्डिग्रेड

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इमेज कैप्शन, ऐसे दिखते हैं टार्डिग्रेड
    • Author, इला डेविस
    • पदनाम, बीबीसी अर्थ

अगर आप सबसे जीवट जीव की तलाश कर रहे हों तो आपको टार्डीग्रेड को छोड़कर कहीं और तांकने-झांकने की जरूरत नहीं.

आठ पैरों वाला यह जीव भीषण गर्मी और भयंकर ठंड में भी ज़िंदा रह सकता है, यहां तक कि अंतरिक्ष के निर्वात में भी.

टार्डीग्रेड हिमालय में, समुद्र की गहराइयों में, ज्वालामुखी से निकले कीचड़ में और अंटार्कटिका की ठंड में भी पाए गए हैं.

किसी भी परिस्थिति में ज़िंदा रहने की इनकी खासियत की प्रमुख वजह यह है कि यह बिना पानी के भी रह लेते हैं.

मुश्किल हालात में ये जीव "क्रिप्टोबायोसिस" अवस्था में चले जाते हैं. इसमें ये अपने शरीर का पानी बाहर निकाल देते हैं और एक विशेष प्रोटीन और शुगर के सहारे अपनी कोशिकाओं को बचा लेते हैं.

पानी में रहने वाली प्रजातियां पानी से ही पुनर्जीवित हो जाती हैं.

इस खासियत और थुलथुले शरीर की वजह से इस जीव को "वाटर बीयर" या जलीय भालू का उपनाम मिला है.

इससे पहले कि आप इन टार्डीग्रेड्स के सम्मान में अपनी स्पोर्ट्स टीम का नाम रख लें, यह जान लेना जरूरी है कि इनका आकार एक मिलीमीटर से बड़ा नहीं होता.

अगर आप "छोटे मगर ताक़तवर" जीव से बड़े जानवर की तलाश में हैं तो विषम परिस्थितियों में रहने वाले जानवरों के बारे में आगे पढ़िए.

येती क्रैब

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ठंड हो या गर्मी इनको फ़र्क नहीं पड़ता

धरती पर सबसे ठंडा पानी अंटार्कटिका की बर्फ के नीचे मिलता है. उसी दक्षिणी ध्रुव पर कहीं-कहीं समुद्र की तलहटी की दरारों से खौलता पानी भी बाहर आता है.

इस तरह की विपरीत परिस्थितियों में भी एक जीव मज़े से रह लेता है. वह है 'येती क्रैब' या येती केकड़ा (किवा एस.). बाल से भरे लंबे हाथों की वजह से इनको ये नाम मिला है.

कड़े खोल वाला यह जीव देख नहीं सकता, लेकिन यह समुद्र तल से 2,300 फीट (700 मीटर) नीचे रहने के लिए अनुकूलित है जहां, पानी का भारी दबाव रहता है और सूरज की रोशनी भी नहीं पहुंच पाती.

इनका अस्तित्व उस छिद्रों पर टिका होता है जिनके करीब ये रहते हैं. वहां से 400 डिग्री सेल्सियस तक गर्म पानी निकलता है, जिसमें खनिज घुले होते हैं.

बैक्टीरिया उन छिद्रों के चारों ओर तेज़ी से बढ़ते हैं. वे खनिजों को ऊर्जा में बदल देते हैं.

येती क्रैब उन बैक्टीरिया को खाकर ज़िंदा रहते हैं. लेकिन खौलते पानी वाले छिद्रों और जमा देने वाले ठंडे महासागर के बीच रहने के लिए उनको एक नाजुक संतुलन बनाना पड़ता है.

ब्लू पैनेट-II सीरीज़ में वैज्ञानिकों ने एक अलग के दिखने वाले क्रैब को पहचाना था. सीने पर बाल होने के कारण उनको "हॉफ़ क्रैब" (किवा टायलेरी) के नाम से जाना जाता है.

हॉफ़ क्रैब खनिजों से भरे गर्म पानी फेंकने वाले छिद्रों के चिमनी-नुमा ढांचे के पास अपनी जगह को लेकर लड़ते-भिड़ते रहते हैं.

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याक

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ऊंचाई के महाराजा

समुद्र की तलहटी से पहाड़ की चोटियों पर जाएं तो वहां अलग तरह की चुनौतियां मिलती हैं. चोटियों पर तापमान बहुत बड़ा कारक है.

ऊंची चोटियों पर इतनी ठंड हो सकती है कि चमड़ी तक जम जाए. इसीलिए याक (बॉस म्यूटस) की चमड़ी मोटी होती है.

याक के लंबे बालों के नीचे ऊन के दो स्तर होते हैं. इससे उनका सीना और दूसरे मुख्य अंग गर्म रहते हैं.

इस कुदरती इंतज़ाम के बाद भी याक 18,000 फीट (5,500 मीटर) से ऊपर नहीं मिलते, क्योंकि जैसे-जैसे हम ऊपर जाते हैं, हवा कम होती जाती है.

हवा के कम दबाव का मतलब है ऑक्सीजन कम होना. इसलिए बेहद ही ठंडे और ऊंचाई पर रहने वाले जीवों में ऐसी ख़ासियत होनी चाहिए कि वह जितना ऑक्सीजन है उतने में ही अच्छे से काम चला ले.

बड़े फेफड़े, विशिष्ट मांसपेशियां और शरीर की सभी कोशिकाओं तक ऑक्सीजन पहुंचाने वाली ढेरों रक्त नलिकाएं- ये सबसे ज्यादा ऊंचाई पर उड़ने वाले पक्षी की विशेषताएं हैं. यह पक्षी है सिर पर धारियों वाला हंस (एंसर इंडिकस).

सालाना प्रवासन के दौरान ये पक्षी कुछ अद्भुत काम करते हैं. ये हंस हर साल हिमालय को पार करते हैं.

ये पक्षी 30,000 फीट ऊंचे माउंट एवरेस्ट को भी पार कर जाते हैं. सामान्य तौर पर वे कम ऊंचाई वाले आसान दर्रों को चुनते हैं, लेकिन वे पहाड़ी दर्रे भी पर्वतारोहियों की सांस फुला देने वाले हैं.

सिर पर धारियों वाले हंस 4,000 मीटर की ऊंचाई से 6,000 मीटर की ऊंचाई तक सिर्फ़ 7 से 8 घंटे में पहुंच जाते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि वे बिना किसी ट्रेनिंग के ही ऐसा कर जाते हैं.

ऊंट

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सूखा-सूखा जीवन

धरती पर जीवन के लिए पानी सबसे ज़रूरी है. दुनिया के सबसे सूखे इलाकों में ज़िंदा रहने वाली प्रजातियां खुद को इसके लिए अनुकूलित करती हैं.

रेगिस्तान में रहने वाले सभी जानवरों में ऊंट सबसे ख़ास है. चाहे उनकी पीठ पर एक कूबड़ (कैमेलस ड्रोमेडेरियस) हो या दो कूबड़ (कैमेलस बैक्ट्रीएनस) हो, वे 40 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक तापमान में रह लेते हैं और शरीर के वजन के चौथाई हिस्से के बराबर पानी कम हो जाए तो भी सह लेते हैं.

ऊंट अपने कूबड़ में पानी नहीं रखते. वहां वसा जमा रहता है.

यह वसा टूटकर पानी में बदल सकता है, जिसके लिए ऑक्सीजन की जरूरत होती है. शुष्क परिस्थितियों में सांस लेने पर जानवरों के शरीर से ढेर सारा पानी निकल जाता है.

ऊंट अपनी वसा का इस्तेमाल भोजन की कमी पूरी करने के लिए करते हैं.

कूबड़ उन्हें सूरज की गर्मी से भी बचाते हैं. वसा की परत सूरज की ऊष्मा के असर से शरीर के दूसरे हिस्सों को बचा लेती है, जिससे वे ठंडे रहते हैं. कूबड़ को पानी के फ्लास्क की जगर आप पिकनिक का छाता समझना ज्यादा सही है.

ऊंट के कूबड़ को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है, लेकिन इस जानवर की ख़ासियत उनके शरीर के अंदर होती हैं.

ऊंटों के विकासक्रम की खोज करने वाले वैज्ञानिकों ने इनके शरीर की उन ख़ासियत की पहचान की है, जो रेगिस्तानी वातावरण में उन्हें अनुकूलन के योग्य बनाती हैं.

ऊंटों की किडनी और उनकी आंतें बहुत कारगर हैं, जिससे उनके शरीर से पानी की बर्बादी बहुत कम होती है.

वे कभी-कभी ही पेशाब करते हैं. उनका मूत्र बेहद गाढ़ा और मल बहुत सूखा होता है.

उनकी लाल रक्त कोशिकाएं नमी में उतार-चढ़ाव को बर्दाश्त करने के अनुकूलित होती हैं. वह अपने आकार के 240 फीसदी तक बड़ी हो सकती हैं, जबकि दूसरी प्रजातियों में 150 फीसदी फूलने पर ही वह फट जाती हैं.

ऊंटों की लाल रक्त कोशिकाएं छोटी और अंडाकार होती हैं. मतलब यह कि जब नमी घट जाए और खून गाढ़ा हो जाए तब भी वह आसानी से बह सकती हैं.

मतलब यह कि विपरीत परिस्थितियों में अस्तित्व बचाए रखने का राज़ वास्तव में खून में ही छिपा है.

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(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.)

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