वो फ़िल्म निर्देशक जिन्होंने सेंसरशिप को दी ज़ोरदार चुनौती

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- Author, कलीम आफ़ताब
- पदनाम, बीबीसी कल्चर
सूडान से लेकर ईरान और सऊदी अरब तक, फ़िल्म निर्देशकों ने दमनकारी सत्ता से लड़ते हुए फ़िल्में बनाई हैं.
1989 में सूडान का फलता-फूलता सिनेमा बर्लिन की दीवार की तरह ढह गया.
एक जुलाई 1989 को उमर अल-बशीर ने तख्ता-पलट करके सत्ता हथियाई थी. 2019 में पद से हटाए जाने तक वह कट्टरपंथी इस्लामी एजेंडा चलाते रहे जिसका ख़मियाज़ा सिनेमा को उठाना पड़ा.
सेंसरशिप क़ानून, टैक्स और आयात शुल्क की ऊंची दरों ने सिनेमा को घाटे का बिज़नेस बना दिया.

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सूडान के फ़िल्म निर्माता गिरफ्तार करके जेल में डाले गए. उन्हें नई सरकार के लिए ख़तरे के रूप में देखा गया.
उनमे से कई निर्वासित हो गए. सूडानी फ़िल्म इंडस्ट्री मर गई. लेकिन क्या सच में मर गई?
'टॉकिंग एबाउट ट्रीज़' डॉक्यूमेंट्री सूडान में बनी है जिसमें सिनेमा को ज़िंदा रखने की असाधारण कोशिशों का ब्योरा है.
इसके निर्माता सुहैब गास्मेलबरी ने इब्राहिम शादाद, सुलेमान मुहम्मद इब्राहिम, अल्तायब महदी और मनार अल-हिलो हना जैसे फ़िल्मकारों के बारे में बताया है.
उनके लिए फ़िल्में बनाना नामुमकिन था इसलिए उन्होंने सूडानी फ़िल्म ग्रुप (SFG) बनाया ताकि कम से कम फ़िल्मों का प्रदर्शन कर सकें.
1989 में गठित होने के बाद यह ग्रुप अस्थायी सिनेमाघरों में, दीवारों पर हॉलीवुड और बॉलीवुड से अलग फ़िल्में दिखाता था.
2018 में उन्होंने सूडानी सिनेमा को पूरी तरह खुलवाने के प्रयास किए. उन्होंने एक सर्वेक्षण भी कराया कि सबसे पहले क्या दिखाई जाए.
इस सर्वेक्षण में क्वेंटिन टैरनटिनो की 'जैंगो अनचेन्ड' पहले नंबर पर आई. लेकिन फ़िल्म दिखाने से पहले उनको नौकरशाही और पैसे की तंगी का सामना करना पड़ा.
सिनेमा के लिए हुए बाग़ी
चारों बुज़ुर्ग फ़िल्मकारों ने सोवियत मोंटाज़ और फ्रेंच न्यू वेव से प्रभावित राजनीतिक फ़िल्में बनाईं.
SFG के प्रमुख इब्राहिम ने 1973-79 के बीच मास्को के VGIK सिनेमेटोग्राफी इंस्टीट्यूट में पढ़ाई की थी जो उस समय अफ्रीकी और मध्य-पूर्व के फ़िल्मकारों में बहुत लोकप्रिय था.
अल-बशीर के शासनकाल में फ़िल्मों के लिए पैसे मिलने बंद हो गए थे. 1995 में सरकारी सूडानी फ़िल्म आयोग भी बंद हो गया.
सरकार ने फ़िल्में बनाना प्रतिबंधित नहीं किया, लेकिन परमिट मिलना बहुत मुश्किल बना दिया गया था. सरकार फ़िल्मों के स्क्रिप्ट पढ़ती थी.
पहली बार के निर्देशक गास्मेलबरी ने चारों फ़िल्मकारों को अपने तजुर्बे के बारे में बातें करते हुए रिकॉर्ड किया. वे अपने उत्पीड़न, यातना और कुछ के निर्वासन पर चर्चा करते हैं.

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शादाद मिस्र चले गए थे जबकि इब्राहिम सूडान में ही रहे. उनको पूछताछ के लिए बुलाया गया. जवाब नहीं देने पर थप्पड़ मारा गया और समकालीन फ़िल्मकारों की आलोचना नहीं करने पर बदबूदार जेल में डाल दिया गया.
गास्मेलबरी एक बार SFG की स्क्रीनिंग में गए जहां उन्होंने डॉक्यूमेंट्री बनाने का फ़ैसला किया. "मुझे लगा कि खार्तूम के पास के गांव की यात्रा ने मुझे प्रतिरोध और संकल्प का अहम सबक दिया है."
डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म की शूटिंग अप्रैल 2019 में अल-बशीर के पतन से पहले हुई. गास्मेलबरी घबराए हुए थे, मगर उनकी कोशिशें रंग लाईं.
'टॉकिंग एबाउट ट्रीज़' को पिछले साल बर्लिन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में दिखाया गया जहां इसे सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री का पुरस्कार मिला.
तब से इसे कई फ़िल्म समारोहों में दिखाया गया है जहां इसने कई पुरस्कार जीते. एक सूडानी फ़िल्म के लिए यह शानदार उपलब्धि है.
पाबंदियों के बावजूद सिनेमा
एक और डॉक्यूमेंट्री 'खार्तूम ऑफ़साइड' निर्देशक मारवा ज़ीन ने बनायी है. वह सूडानी मां-बाप की औलाद हैं जिनका जन्म सऊदी अरब में हुआ था.
'ख़ार्तूम ऑफ़साइड' उन सूडानी महिलाओं के बारे में है जो पाबंदियों के बावजूद फुटबॉल खेलना चाहती है.
यह फ़िल्म एक टेक्स्ट से शुरू होती है- 'सूडान के मौजूदा राजनीतिक इस्लामी सैन्य शासन में महिलाओं को फुटबॉल खेलने की इजाज़त नहीं है और हमें फ़िल्में बनाने की इजाज़त नहीं है- फिर भी..
इस डॉक्यूमेंट्री को बनाने में चार साल लगे. ज़ीन को कई बार रोका गया. उनके साथ कोई हिंसा नहीं हुई लेकिन कैमरा और दूसरे सामान तोड़ने की धमकियां दी गईं.
वह अधिकारियों को यह समझाने में कामयाब रहीं कि वह किसी ख़बर की शूटिंग नहीं कर रही हैं या कोई खुलासा नहीं करना चाहतीं.
वह बीच-बीच में काहिरा जाती रहीं, जहां वह अवसाद में घिर गईं और उनकी शादी टूट गई. फिर भी वह लगी रहीं.
"मेरा प्रतिरोध मुझे आगे ले गया. डर मेरी ज़िंदगी को नियंत्रित नहीं कर सका. मैं उदास हुई, कभी-कभी कमजोर भी पड़ी लेकिन मुझे हमेशा लगा कि रास्ता मिल जाएगा."
इस बीच, पिछले साल के वेनिस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में सूडानी फ़िल्म निर्माता अमजद अबू अलाला को बेस्ट डेब्यू फ़िल्म का लायन ऑफ़ द फ्यूचर अवॉर्ड मिला.
उनकी फ़िल्म 'यू विल डाइ एट ट्वेंटी' 19 साल के एक लड़के की कहानी है जो एक धार्मिक भविष्यवाणी के साये में जीता है कि 20 साल का होने पर उसकी मौत हो जाएगी.
यह फ़िल्म अल-बशीर के शासन में ज़िंदगी का रूपक है जहां तर्क पर अंधविश्वास हावी था.
अबू अलाला को यूरोप से फ़ंडिंग मिली थी. उन्हें कलाकारों को नियुक्त करना था और शूटिंग की मशीनें लानी थी. उनकी फ़िल्म फोन कैमरा से नहीं बन सकती थी.
उनकी टीम को फ़िल्म शूट करने का परमिट मिल गया, लेकिन मशीनें कस्टम में रोक ली गईं.
"आख़िरी मिनट में हमें प्रोडक्शन शेड्यूल बदलना पड़ा. हमारी लाइट्स कस्टम में थी इसलिए हम अंदर के सीन शूट नहीं कर सकते थे. एक अहम सीन के लिए मुझे पूर्णिमा की चांद का इंतज़ार करना पड़ा ताकि रोशनी मिले."
सूडानी बैंक इंटरनेशनल ट्रांसफ़र मंज़ूर नहीं करते थे. इसलिए निर्माता 7 लाख डॉलर बैग में भरकर हवाई जहाज से ले गए ताकि ख़र्च का भुगतान कर सकें.

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सेंशरशिप से महान कला का जन्म
सूडान की नई फ़िल्मों का फ़िल्म समारोहों में पुरस्कार जीतना क्या हैरान करता है? सिनेमा के इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जब दमनकारी सत्ता के समय फ़िल्मकारों ने बेहतरीन काम किए.
ईरानी फ़िल्मकार इसके सबसे बेहतर उदाहरण हैं. 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद अब्बास कियारोस्तमी, मोहसेन मखमलबाफ, जफ़र पानही और हाल में असगर फ़रहादी की फ़िल्में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर हुईं.
उनकी फ़िल्में सभी प्रमुख फ़िल्म समारोहों में, यहां तक ऑस्कर में भी सम्मानित हुईं.
फ़िल्मकार और समीक्षक मार्क कजिन्स ने ईरानी सिनेमा को हमारे समय के "महान कलात्मक आंदोलनों में से एक कहा है."
उन्होंने इस सफलता का कुछ श्रेय 1979 की क्रांति के बाद लगी सेंशरशिप को दिया है, जिसमें पश्चिमी सिनेमा में दिखाई जाने वाली दो प्रमुख चीज़ों- सेक्स और हिंसा पर पाबंदी लगाई गई थी.
ईरान में सरकार पर अप्रत्यक्ष रूप से हमला करने वाली फ़िल्में भी नहीं बनाई जा सकती थीं.
फ़िल्मकार प्रत्यक्ष राजनीतिक आलोचना की जगह काव्यात्मक फ़िल्में बनाने को मजबूर हुए. इससे इन निर्देशकों को सही दिशा मिली और पुरस्कार भी मिले.
ईरानी ग्रीन मूवमेंट के दौरान फ़िल्में बनाने पर और पाबंदियां लगीं. 2009 के विवादित चुनाव के बाद प्रदर्शनकारियों ने महमूद अहमदीनेजाद को पद से हटाने की मांग की.
मोहसेन मखमलबाफ और उनकी बेटी समीरा जैसे फ़िल्मकार निर्वासन में चले गए. उनकी एक और बेटी हना ने आंदोलन पर 'ग्रीन डेज़' डॉक्यूमेंट्री बनाई जबकि मशहूर फ़िल्म निर्माता अबोल्फ़ज़ल जलीली ने फ़िल्में बनाना पूरी तरह बंद कर दिया.
2010 में पानही को हिरासत में लिए जाने के बाद सरकार और कलाकारों के बीच की तल्खी सामने आ गई. उनको 6 साल जेल की सज़ा सुनाई गई और 20 साल तक उनके फ़िल्म बनाने पर रोक लगा दी गई.
पानही ने पुरस्कार जीतने वाली कई फ़िल्में बनाई थीं. इनमें शामिल थीं 1997 की 'द मिरर' जिसे लोकार्नो में गोल्डन लेपर्ड अवॉर्ड मिला था, 2000 की फ़िल्म 'द सर्कल', जिसे वेनिस फ़िल्म फेस्टिवल में गोल्डन लायन अवॉर्ड मिला था और 2006 की 'ऑफ़साइड' जिसे बर्लन में सिल्वर बीयर मिला था.
जेल भेजे जाने के बाद पानही के सम्मान में कई फ़िल्म समारोहों में एक सीट खाली छोड़ी गई.
पानही नहीं झुके. 2011 में ट्रायल के दौरान उन्होंने फोन पर एक वीडियो डायरी बनाई जिसका नाम रखा 'दिस इज़ नॉट ए फ़िल्म.'
इसे एक केक के अंदर फ्लैश ड्राइव में छिपाकर ईरान से बाहर निकाला गया और कान फ़िल्म फेस्टिवल में दिखाया गया.
घर पर नज़रबंदी की सज़ा काटते हुए भी वह फ़िल्में बना रहे हैं. 2015 में उनकी फ़िल्म 'टैक्सी' ने बर्लिन में गोल्डन बीयर जीता. हाल में '3 फेसेज़' ने कान में बेस्ट स्क्रीनप्ले का पुरस्कार जीता.
पानही और मोहम्मद रसूलोफ़ जैसे दूसरे निर्देशकों को सिर्फ़ फ़िल्में बनाने के लिए और सज़ा नहीं दी जा सकती, लेकिन ऐसा करने के लिए उनकी कोई मदद नहीं की जाएगी. ईरान में 'समस्याग्रस्त' समझी जाने वाली फ़िल्में शूट करने के लिए आसानी से सलाखों के पीछे डाला जा सकता है.
रसूलोफ़ को पिछले साल जुलाई में एक साल के लिए जेल भेजा गया था. उनकी एक फ़िल्म 'देयर इज़ नो इविल' इस साल बर्लिन फ़िल्म फेस्टिवल में दिखाई गई.

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साहसी निर्देशक
2013 में होसैन राजाबियन ने महिलाओं के तलाक अधिकार को लेकर 'द अपसाइड-डाउन' बनाना शुरू किया तो उनको गिरफ्तार कर लिया गया और फ़िल्म की सामग्रियां जब्त कर ली गईं.
उनको अंधेरे कमरे में 100 दिनों तक रखा गया और पूछताछ की गई. अंत में ट्रायल तक जमानत पर छोड़ा गया.
मुकदमे की सुनवाई 2016 में हुई तो तीन मिनट की सुनवाई में ही उनको छह साल जेल की सज़ा सुना दी गई.
तीन साल जेल काटने के बाद अब वह जमानत पर हैं लेकिन उनके पास नागरिक अधिकार नहीं हैं.
रिहाई के बाद राजाबियन नई फ़िल्म 'क्रिएशन बिटवीन टू सरफेसेज़' बना रहे हैं जिसे वह ऑनलाइन रिलीज़ करेंगे.
यह एक शादीशुदा जोड़े की कहानी है जो पैसे के लिए अपने ऊपर मनोवैज्ञानिक प्रयोग कराते हैं.
पति को लगता है कि मानसिक रोग उसके परिवार में आनुवंशिक है. उसे बच्चा पैदा नहीं करना. उसने इसी शर्त पर शादी भी की है.
उसकी पत्नी दो गर्भपात करा चुकी है और अब वो तीसरे के बारे में निश्चित नहीं है. यह फ़िल्म राज्य के नियंत्रण, मानसिक पीड़ा और आज़ादी की संभावना नहीं होने के बारे में है.
राजाबियन कहते हैं, "इसमें आज के सामाजिक जीवन, लोगों की निराशा की परछाई है. भविष्य न केवल अंधकारमय है बल्कि पूरी तरह अनुमान से परे भी है."
"एक तरफ युद्ध का ख़तरा है, पाबंदियों के रूप में अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दबाव है, दूसरी तरफ ईरान पूरी दुनिया से अलग-थलग है और अपनी आबादी पर मनोवैज्ञानिक दबाव डाल रहा है."
इतना दबाव झेलने के बाद भी राजाबियन फ़िल्में बनाना चाहते हैं. "मैं वर्षों तक जेल में रहा हूं. इसलिए मैं इसे छोड़ नहीं सकता. मैंने इसके लिए बड़ी कीमत चुकाई है."
गुप्त रूप से फ़िल्म बनाने का नया युग
नई तकनीक, जैसे फ़ोन के 4के कैमरे ने पानही और राजाबियन जैसे फ़िल्मकारों की मदद की है.
वे दिन चले गए जब पब्लिक स्क्रीनिंग के लिए फ़िल्म बनाने में बड़े कैमरों और रील की ज़रूरत होती थी.
अब चूंकि फोन के कैमरे से सभी लोग कुछ ना कुछ रिकॉर्ड करते ही रहते है, इसलिए उनसे फ़िल्मों की रिकॉर्डिंग करना सामान्य बात लगती है. सरकारी अधिकारियों के लिए भी इसे नियंत्रित करना मुश्किल है.
फ़िल्मकारों को सिर्फ़ मध्य-पूर्व के देशों में दिक्कत नहीं हो रही. जनवरी-फ़रवरी में हुए रॉटरडम इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में वेनेजुएला में बनी एक दुर्लभ फ़िल्म 'ला फ़ोर्टलेज़ा' दिखाई गई.
वेनेजुएला में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की वामपंथी सरकार है, मगर 23 जनवरी 2019 को हुए विवादित चुनाव के बाद विपक्ष के नेता ख़ुआन गोइदो ने ख़ुद को राष्ट्रपति घोषित कर दिया है.
जॉर्ज थिएलेन-आर्मंड की निर्देशित फ़िल्म 'ला फ़ोर्टलेज़ा' में मौजूदा राजनीतिक संकट को कराकस की दीवार पर बनाई गई दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज़ की एक तस्वीर से दिखाया गया है.
वेनेजुएला में फ़िल्म बनाने पर पाबंदी नहीं है, लेकिन जो लोग सरकार को नाखुश करते हैं उन पर दबाव डाला जाता है.
थिएलेन-आर्मंड कहते हैं, "नेशनल सेंटर फ़ॉर ऑटोनोमस सिनेमा या फ़िल्म बोर्ड को गैर-पक्षपाती माना जाता है, लेकिन पिछले कुछ साल से वे खुलेआम सरकार का समर्थन कर रहे हैं. आप उनके ट्विटर को देख सकते हैं."
'ला फ़ोर्टलेज़ा' टीम के कई सदस्यों को बुरे नतीजों की धमकी दी गई. "वेनेजुएला में फ़िल्म बनाना उससे जुड़े सभी लोगों के लिए जोखिम का काम है, लेकिन हम जितना हो सकता था उतना निगरानी में रहे."
वेनेजुएला के दूरसंचार विभाग कोनाटेल के लोगों ने प्रोड्यूसर के घर आकर पूछताछ की. "मुझे नहीं पता कि यह डराने के लिए था या सचमुच की पूछताछ थी, लेकिन यह भयावह था."
आर्मंड की पार्टनर मो स्कारपेली इससे पहले अफगानिस्तान (फ्रेम बाय फ्रेम) और इथियोपिया (एनबेसा) के मुश्किल हालात में फ़िल्में बना चुकी हैं.
उन्होंने वेनेजुएला में 'ला फ़ॉर्टलेज़ा' की शूटिंग पर एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाई है जो इसी साल दिखाई जाएगी.
स्कारपेली ने जब एनबेसा बनाई थी तब देश में इमरजेंसी लगी थी और निर्देशक ने परमिट लेने की जगह निगरानी में काम करना पसंद किया.
वह कहती हैं, "कई सरकारें ग़लत सूचनाओं का उपयोग करके अपने लोगों, कलाकारों या फ़िल्मकारों को दुविधा में रखती हैं."
"वे समझ नहीं पाते कि अपने मन की बात कहने का नतीजा क्या होगा. आपको क्रू के सदस्यों की ज़िंदगी की चिंता होती है. इस ख़तरे का आपकी कलात्मक प्रक्रिया पर असर पड़ता है."

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ताक़तवर माध्यम
दमनकारी सत्ता के बारे में बाहरी दुनिया को बताने के लिए सिनेमा इतना ताक़तवर माध्यम है कि अधिक से अधिक फ़िल्मकार इस माध्यम को अपना रहे हैं.
2012 में हाइफ़ा अल-मंसूर ने जब सऊदी अरब में अपनी पहली फ़िल्म 'वादजा' बनाई तो उस देश में कोई सिनेमा नहीं था. फ़िल्में बनाना गैर-कानूनी था. इसलिए उन्होंने कैमरा और उपकरण एक वैन में छिपा दिए थे.
आठ साल बाद उनकी नई फ़िल्म 'द परफेक्ट कैंडिडेट' को सरकार से आर्थिक मदद मिली है और सऊदी अरब में सिनेमा खोल दिया गया है.
"सऊदी फ़िल्मों के लिए एक पब्लिक फ़ंड है. उन्होंने कई शॉर्ट फ़िल्मों और डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मों को वित्तीय सहायता दी है. यूरोप में ऐसे फ़ंड आम हैं. महिला अधिकारों और इस जैसी चीज़ों के लिए फ़िल्म बनाते समय आपको सरकार से सहायता की ज़रूरत पड़ती है. इसके लिए पब्लिक फ़ंड होना बहुत अहम है."
'द परफेक्ट कैंडिडेट' एक महिला डॉक्टर के बारे में है जो पार्षद के चुनाव की उम्मीदवार है. वह शासन से अपनी शिकायतों को छिपाती नहीं है.
सऊदी अरब ने अपना फ़िल्म फेस्टिवल (रेड सी फ़िल्म फेस्टिवल) भी शुरू करने का एलान किया है, हालांकि कोरोना वायरस के कारण अभी इसे टाल दिया गया है.
फ़िल्मकार बनाम सरकार
सिनेमा के इतिहास में फ़िल्मकारों और सरकारी अधिकारियों के बीच हमेशा एक तल्खी रही है.
सिनेमा की पहली सदी में, जब फ़िल्में बहुत महंगी थीं और उनको बनाना बहुत मुश्किल था, तब फ़िल्मकारों को बहुत सावधानी से चलना पड़ता था. उनका करियर ख़त्म होने का जोखिम रहता था.
ट्रोम्सो इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल (जनवरी 2020) में रूसी मूक सिनेमा की दो क्लासिक फ़िल्में दिखाई गईं- जाकोव प्रोतज़ानोव की 'ऐलिटा, क्वीन ऑफ़ मार्स' (1924) और लेव कुलेशोव की 'बाय दि लॉ' (1926).
इन दोनों फिल्मों को बनाने में सरकार की मदद मिली थी. शर्त यह थी कि वे बोल्शेविक क्रांति के लक्ष्यों को बढ़ावा दें.
प्रोतज़ानोव ने फ़िल्म में कम्युनिस्ट विचारधारा की कुछ आलोचना भी डाल दी. रिलीज़ के कुछ समय बाद सोवियत अधिकारियों ने इसे पहचान लिया और शीत युद्ध ख़त्म होने तक इस फ़िल्म को देखना मुश्किल बना दिया गया.
इसके उलट कुलेशोव ने जैक लंदन की एक कहानी पर फ़िल्म बनाई और सरकार को दिखाया कि वह उनके एजेंडे पर फ़िल्म बना सकते हैं.
जर्मनी की नाज़ी पार्टी प्रचार के लिए फ़िल्मों का इस्तेमाल करने में माहिर थी. नाज़ी सरकार फ़िल्में बनाने पर रोक नहीं लगाती थी. जब तक फ़िल्में उसके एजेंडे पर चलती थी वह मदद भी करती थी.
लेनी राइफेन्स्टल ने नवीन तकनीकों के साथ फ़िल्में बनाई और उस समय जर्मन सिनेमा की बड़ी हस्ती बनीं. लेकिन तत्कालीन जर्मनी के कई महान निर्देशकों ने ख़ुद को सत्ता के प्रभाव से दूर रखा.
हिटलर के उदय के बाद फ्रिट्ज़ लांग और बिली वाइल्डर जैसे फ़िल्मकार हॉलीवुड चले गए, जहां वे फले-फूले.
अमरीकी फ़िल्मकारों को भी सरकारी नियम-क़ायदों से निपटना पड़ा है. 1934 के हेस कोड ने सेक्स, हिंसा और नैतिक शालीलना के नाम पर कई पाबंदियां लगाईं. हालांकि जैसे-जैसे समय बीतता गया, फ़िल्मकारों ने इससे बचने के उपाय निकाल लिए.
सिनेमा ने बार-बार साबित किया है कि पाबंदियों के बावजूद फ़िल्में बनाईं जा सकती हैं.
सूडान और सऊदी अरब जैसे देशों को सिनेमा को अपनाना पड़ा है. फ़िल्मकारों ने दिखाया है कि उनमें नियम बनाने वालों से ज़्यादा दमख़म है.
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