बच्चों के इस मोज़े की कीमत बीस हज़ार रूपए!

- Author, निकोलस मैनकॉल-बिटल
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
लिंडसे इलियट मां बनीं तो अपनी बेटी हेज़ेल को थोड़ी देर के लिए भी अकेला छोड़ने में उनका जी घबराता था.
29 साल की इलियट टीचर हैं. घर से दूर जाने पर उन्हें हर वक़्त हेज़ेल की सेहत की चिंता लगी रहती थी.
इलियट की चिंता एक मोजे ने दूर की. 300 डॉलर का यह स्मार्ट मोजा नब्ज़ मापता है और उसके आधार पर ऑक्सीजन स्तर, दिल की धड़कन और तापमान का डेटा तैयार करता है.
इसे अस्पतालों की प्रेरणा से बनाया गया है. यह एप्पल वॉच और फिटबिट जैसा गैजेट है.
इलियट कहती हैं, "मुझे हमेशा डर लगा रहता था कि उसकी सांस बंद हो जाएगी. मैं बेचैन रहती थी. लेकिन ऑक्सीजन स्तर देखने से मुझे तसल्ली मिलती है."
इलियट अमरीका के फ्लोरिडा में विंटर पार्क में रहती हैं. अब वह अच्छे से सो पाती हैं और आया पर भरोसा करते डिनर के लिए बाहर भी जा पाती हैं.

इमेज स्रोत, @Alamy
हेज़ेल ने अगर स्मार्ट मोजा पहन रखा है तो इलियट अपने स्मार्टफोन से उसकी सेहत पर नज़र रख सकती हैं.
इलियट जैसे कई मां-बाप ने स्मार्ट बेबी टेक्नोलॉजी को अपनाया है. यह पीढ़ी फ़ीडबैक और डेटा को सबसे ज्यादा अहमियत देती है.
वे अपनी फिटनेस, नींद, खान-पान और काम करने की आदतों को ट्रैक करने के लिए ऐप्स और पहनने योग्य गैजेट्स का इस्तेमाल करते हैं.
कई लोगों के लिए बच्चे की सेहत पर नज़र रखने के लिए इनका इस्तेमाल बस एक अगला कदम है.
पिछले कुछ साल में कई कंपनियों ने पहनने योग्य और अन्य स्मार्ट उत्पादों से बच्चों को लैस करने के बाज़ार को पहचान लिया है.
ऑस्ट्रेलिया की सोशल रिसर्च फ़र्म मैक्क्रिंडल के मुताबिक हर हफ्ते दुनिया भर में 'जेनरेशन अल्फा' के 25 लाख नये सदस्य पैदा हो रहे हैं.

इमेज स्रोत, @Monit Corp
2010 में हुई शुरुआत
इस पीढ़ी की शुरुआत 2010 में पैदा हुए बच्चों से मानी जाती है. उस साल आईपैड और इंस्टाग्राम लॉन्च हुए थे.
2025 में इस पीढ़ी के औपचारिक तौर पर समाप्त होने तक इसमें 2 अरब सदस्य शामिल हो जाएंगे.
इन उत्पादों की मदद से मां-बाप नर्सरी से लगातार जुड़े रहते हैं. उनको बोतल, डमी, कॉट, प्रैम, कपड़े वगैरह के फीडबैक लगातार मिलते रहते हैं.
इनमें से कुछ उत्पाद मां-बाप के तनाव को कम करते हैं तो कुछ दूसरे उत्पाद परवरिश के उन हिस्सों को पूरी तरह स्वचालित बना देते हैं, जिनके लिए मां-बाप पहले अनुभूतियों पर निर्भर रहते थे.
उदाहरण के लिए दूध के बोतल की पेंदी से जुड़ा 'इंटेलीजेंट बेबी फीडिंग मॉनिटर' ब्लूटूथ से स्मार्टफ़ोन को डेटा भेजता है.
बच्चे को दूध पिलाने के लिए मां पहले अपने अनुभव पर निर्भर रहती थीं. अब दूध की मात्रा, समय, उसके तापमान और बोतल के कोण तक को ऐप्स से नियंत्रित किया जाता है.

इमेज स्रोत, @Alamy
इलियट मानती हैं कि स्मार्ट बेबी गैजेट्स जरूरी नहीं हैं, लेकिन उनकी पीढ़ी बच्चे की परवरिश को आसान बनाने के लिए इन तकनीकों को अपनाने के प्रति उत्साहित है.
"मैंने कुछ बुजुर्ग अभिभावकों से बात की जिनके पास यह तकनीक नहीं थी. उन्होंने कहा कि हम तो बस यह देख लेते थे कि बच्चा सांस ले रहा है या नहीं. मैंने कहा- नई चीजें आ रही हैं."
2016 में अमरीका में होने वाले सालाना कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक शो (जो दुनिया का सबसे बड़ा कंज्यूमर टेक्नोलॉजी ट्रेड शो है) में एक विशेष शाखा लॉन्च की गई- बेबी टेक समिट.
इस समिट के प्रोड्यूसर जिल गिल्बर्ट कहते हैं कि पहले यह कार्यक्रम उन स्टार्ट-अप्स के बीच लोकप्रिय था जो बच्चों के लिए किसी एक काम को करने वाले उत्पाद बनाते थे.
शुरुआत में जो उत्पाद बने उनमें सेंसर वाली कार सीट और नैपी बदलने का अलार्म देने वाले सेंसर शामिल थे. धीरे-धीरे ये बेबी प्रोडक्ट जटिल होते गए. उनमें ज्यादा सेंसर जुड़ते गए, वे कई तरह के डेटा देने लगे और पूरी तरह डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आ गए.

नये बाज़ार का जन्म
अब बड़े और वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त ब्रांड इस बाज़ार में आ रहे हैं.
मोटोरोला ने नर्सरी उत्पादों का एक सूट बनाया है. फिलिप्स ने एक ऐप प्लेटफॉर्म तैयार किया है जो बेबी मॉनिटर से मिले डेटा को मां-बाप द्वारा दर्ज रुझानों और डॉक्टरों के ऑनलाइन वीडियो परामर्शों से जोड़ता है.
बेबी टेक सेक्टर नया है. इसके बारे में कम अध्ययन हुए हैं. फिर भी, हेक्सा के मार्केट रिसर्चर का अनुमान है कि अकेले बेबी मॉनिटरिंग सब-मार्केट 2016 के 92.9 करोड़ डॉलर से बढ़कर 2025 तक 163 करोड़ डॉलर पहुंच सकता है.
फिलहाल चीन इस क्षेत्र में सबसे आगे है. हेक्सा के मुताबिक 2025 तक एशिया प्रशांत क्षेत्र का भी वैश्विक बाज़ार में अच्छा खासा हिस्सा होगा.
अमरीका, जर्मनी, फ्रांस और चीन में ज्यादा मिलेनियल पैरेंट्स घर छोड़कर काम पर जाते हैं. अनुमान है कि वे अपने नवजात बच्चे से जुड़े रहने के लिए डिजिटल बेबी मॉनिटर्स पर भरोसा करेंगे.
अगली कड़ी में भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और थाईलैंड जैसे उभरते बाज़ारों के माता-पिता भी इसे अपना सकते हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
डेटा को सब पता है!
दोह्योंग पार्क दक्षिण कोरिया की स्मार्ट नैपी मॉनिटर कंपनी मॉनिट के सीईओ हैं. वह कहते हैं, "बच्चे के बारे में सोच-सोचकर तनाव लेना परवरिश का सबसे अच्छा तरीका नहीं हैं. अगर आप बच्चे को खुश रखना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको खुश रहना चाहिए. इससे परवरिश अच्छी होगी."
दोह्योंग ऐसी तकनीक विकसित कर रहे हैं जो ठीक यही काम कर सकती है.
मॉनिट मां-बाप को बच्चे के शौच के बारे में अलर्ट करता है. इससे उन्हें तुरंत नैपी बदलने में सहूलियत हो जाती है. बच्चे नैपी रैश या यूरेनरी ट्रैक इंफेक्शन से बचे रहते हैं.
दोह्योंग को लगता है कि मॉनिट से मिलने वाले डेटा मां-बाप को बच्चे को दूसरे कमरे में रखने की आज़ादी देते हैं और वे बच्चे के रोने के आधार पर गलत अनुमान लगाने से बचे रहते हैं.

इमेज स्रोत, SPL
बच्चा अगर रात में न सोये तो मां-बाप को भी जागना पड़ता है. तकनीक और डेटा से जुड़ी नर्सरी में बच्चे की इस आदत को ट्रैक करके इसे सुधारा जा सकता है.
स्मार्टफोन पर जानकारियां मिलते रहने से बच्चे से अलग रहने की बेचैनी दूर हो जाती है. उसकी सेहत को लेकर पैदा हुआ तनाव दूर हो जाता है.
गिल्बर्ट कहते हैं, "मिलेनियल्स टेक्नोलॉजी को जीवन का हिस्सा मानते हैं पिछली पीढ़ी अपने घर में टीवी लगाना चाहती थी. नये मां-बाप स्मार्ट मॉनिटर और कनेक्टेड प्लेटफॉर्म चाहते हैं."

इमेज स्रोत, Getty Images
'असल में नियंत्रण नहीं'
बेबी टेक्नोलॉजी के मेडिकल, इमोशनल और मनोवैज्ञानिक असर के बारे में अभी विस्तार में अध्ययन नहीं हुए हैं. इसके असर या इसकी जरूरत को लेकर भी विशेषज्ञों के बीच आम राय नहीं बन पाई है.
चाइल्ड डेवलपमेंट रिसर्च ग्रुप 'ज़ीरो टू थ्री' की सीनियर डायरेक्टर रेबेका पार्लेकियन को लगता है कि मशीनों को देखते रहने से मां-बाप बच्चे की खास जरूरतों को नहीं समझ पाते.
बच्चे अपने मां-बाप को देखकर भावनाओं पर नियंत्रण करना सीखते हैं. उसे गोद में लेने की जगह मशीनीकृत कॉट पर रखने से मां-बाप यह समझ नहीं पाते कि बच्चा क्या चाहता है- उसे झूला झुलाना पसंद है, मां की लाड़ अच्छी लगती है या कुछ और.

पार्लेकियन के मुताबिक हेल्थ मॉनिटर्स का असर बच्चे के साथ-साथ मां-बाप पर भी पड़ता है. "अगर आप पहले से बेचैन हैं और आपको लगातार डेटा नहीं मिल रहे तो आपकी बेचैनी बढ़ सकती है."
हेज़ेल इलियट के 300 डॉलर के मोजे बनाने वाली कंपनी ऑलेट के सीईओ कर्ट वर्कमैन इससे सहमत नहीं.
वह 'ग्लोबल पेड्रियाट्रिक हेल्थ' जर्नल के साथ किए गए अपनी कंपनी के एक अध्ययन के बारे में बताते हैं जिससे पता चला कि ऑलेट के करीब 50 हजार यूज़र्स में 96 फीसद मानते हैं कि स्मार्ट मोजे के इस्तेमाल से उनका तनाव घटा है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिशिगन मेडिकल स्कूल में डेवलपमेंट बिहैवेरियल पेड्रियाट्रिक्स की सहायक प्रोफेसर जेनी रेडेस्की कहती हैं कि तनाव वास्तव में एक सक्षम और स्वस्थ माता-पिता बनने का अभिन्न अंग है.
रेडेस्की को चिंता है कि सेहत पर निगरानी रखने वाले उपकरण मां-बाप को नियंत्रण की झूठी समझ दे सकते हैं जबकि मां-बाप को चाहिए कि वे मासूम बच्चे की देखभाल करते हुए तनाव बर्दाश्त करें और बच्चे पर पूर्ण नियंत्रण की ना सोचें.

इमेज स्रोत, Alamy
कितनी महंगी तकनीक
बच्चों की देखभाल से जुड़ी टेक्नोलॉजी महंगी है. तकनीक से जुड़े रहने के बावजूद मिलेनियल्स पीढ़ी महसूस करती है कि आर्थिक तौर वह पिछली पीढ़ी से घाटे में है.
उदाहरण के लिए, बच्चे को झूला झुलाकर सुलाने वाली स्मार्ट कॉट 'दी स्नू' 1,160 डॉलर की है.
अमरीका के टेनेसी के नेशविले में रहने वाली 29 साल की फोटोग्राफर मिशेल डॉडी 3 बच्चों की मां है. उनके पास यह स्मार्ट कॉट है.
वह कहती हैं, "यदि मेरा बच्चा नहीं सोता है तो मेरे पैसे की कीमत वसूल है." डॉडी के लिए यह स्मार्ट कॉट किसी महंगे पालने जैसा है.

इमेज स्रोत, JONAS GRATZER
ब्रिटेन और अमरीका में बच्चे को संभालने के लिए नर्स 200 डॉलर प्रति रात फीस लेती हैं. मतलब यह कि स्नू की कीमत एक हफ्ते में ही वसूल हो रही है.
जिन मां-बाप ने बच्चे के पालने पर सैकड़ों डॉलर खर्च किए हैं, उनके लिए एक स्मार्ट कॉट पर हजार डॉलर खर्च करना बड़ी बात नहीं. लेकिन बच्चों की बुनियादी जरूरतें जुटाने के लिए संघर्ष कर रहे मां-बाप के लिए बेबी टेक्नोलॉजी ना सिर्फ़ पहुंच से बाहर है, बल्कि यह एक लग्ज़री भी है.
पर्सनल फाइनेंस के बारे में सलाह देने वाली वेबसाइट 'इन्वेस्टेट वैलेट' के संस्थापक टॉड कंसमैन कहते हैं, "बच्चा होना पहले से ही काफी खर्चीला है. बुनियादी जरूरतें जैसे कि झूला, खाना, डाइपर वगैरह जुटाना भी आसान नहीं है. ये स्मार्ट प्रोडक्ट अच्छे हो सकते हैं लेकिन ये जरूरी चीजें नहीं हैं."
यूनिवर्सिटी ऑफ़ विक्टोरिया में अर्थशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर एलिसाबेथ गुग्ल ने फैमिली इकोनॉमिक्स पर रिसर्च किया है.

इमेज स्रोत, Getty Images
उनको लगता है कि जब तक यह इंडस्ट्री अपने आर्थिक और सेहत संबंधी दावों को साबित करने वाले सबूत नहीं जुटाती तब तक मां-बाप तथ्यों को कल्पना से अलग करने में सक्षम नहीं हो पाएंगे और कंपनियां झूठे दावे करके अपने उत्पाद बेच सकती हैं.
जो मां-बाप इन उपकरणों का इस्तेमाल यूज़ कर रहे हैं वे इनको बढ़ावा दे रहे हैं.
इलियट कहती हैं, "प्रेग्नेंट होने के बाद मैं जिनसे भी मिली हूं उनको मैंने ऑलेट अपनाने को कहा है. स्नू कॉट के बारे में डॉडी भी यही कहती हैं.
इलियट ने तो ऑलेट मोजे को अपने अगले बच्चे के लिए संभालकर रख लिया है.
दूसरे शब्दों में, डेटा के आधार पर पली-बढ़ी पीढ़ी आ चुकी है. दोह्योंग कहते हैं, "यह पसंद का मामला नहीं है. यह समय का मामला है."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)














