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हंगामा है क्यों बरपा.......! | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
टी-20 विश्व कप से भारतीय टीम के लचर और बेपरवाह अभियान से क्रिकेट प्रशंसकों की भीड़ भले ही हैरान हो, लेकिन इससे इस खेल में लालच और प्रदर्शन की कड़वी हक़ीक़त भी एक झटके सामने आ गई है. आख़िर कितनी क्रिकेट को बहुत ज़्यादा क्रिकेट कहेंगे और क्या. सिर्फ़ उद्योग घरानों के धनबल पर टीम को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीम बनाया जा सकता है, ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो आज हमारे सामने खड़े हैं. इस बहस से बचना और कोच गैरी कर्स्टन द्वारा बताई जा रही हार की वजहों को नकारना न केवल ग़लत है बल्कि ये नज़रिया भारतीय क्रिकेट के भविष्य के लिए भी ठीक नहीं है. कर्स्टन ने विश्व कप टीम के ख़राब प्रदर्शन की वजह आईपीएल में खिलाड़ियों का बुरी तरह थकना बताया था. बेशक, कर्स्टन पुराने ख़्यालों वाले क्रिकेटर हो सकते हैं, लेकिन उनके इन्हीं पुराने तरीक़ों ने भारतीय टीम को आक्रामक और नए तेवर दिए हैं और खिलाड़ी भी मानते हैं कि उनके अच्छे प्रदर्शन में कर्स्टन का ख़ासा योगदान है. कौन ज़िम्मेदार ? ग्रेग चैपल की ‘बांटो और राज करो’ की नीति के बाद वो कर्स्टन ही थे, जिन्होंने टीम को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई और कोच में खिलाड़ियों का भरोसा फिर से जगाया.
उन्हें अभी तक भारतीय टीम का भद्रजन और शांत स्वभाव वाला कोच माना जाता था और अब जब उन्होंने कुछ कहा है तो हमें उनकी अनसुनी सिर्फ़ इसलिए नहीं करनी चाहिए कि उनका नज़रिया हमारे व्यावसायिक हितों से मेल नहीं खाता. क्या ये सही नहीं है कि इस टीम की धार कुछ कुंद पड़ी है? ये सही है कि टी-20 का फॉर्मेट ही कुछ ऐसा है कि नतीजे के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है, लेकिन क्या ये सही नहीं है कि टूर्नामेंट में भारतीय टीम कभी भी विजयी टीम नहीं लगी? मैदान पर भारतीय खिलाड़ी सुस्त थे, उनकी फ़िटनेस का स्तर भी अच्छा नहीं था और अधिकतर खिलाड़ी चोटों से जूझ रहे थे. ये कहना अक्खड़पन होगा कि खिलाड़ियों ने जानबूझकर ख़राब प्रदर्शन किया. लेकिन टीम के प्रदर्शन में आई गिरावट के कुछ कारण हैं. थकान भी वजह आईपीएल में बहुत अधिक क्रिकेट खेलने से टीम को भारी नुक़सान पहुँचा तो हमें इसे हंसी में क्यों उड़ाना चाहिए. खिलाड़ियों की थकान ने न केवल उनके प्रदर्शन पर बुरा असर डाला, बल्कि इससे उनके मनोबल पर भी असर पड़ा. भारतीय खिलाड़ियों के साथ कुछ ऐसा ही हुआ लगता है और कर्स्टन सिर्फ़ इस बात को सामने ला रहे हैं. वो आईपीएल की आलोचना नहीं कर रहे हैं. वो इतना भर कह रहे हैं कि न्यूज़ीलैंड दौरे के ठीक बाद और टी-20 विश्व कप से ठीक पहले आईपीएल का आयोजन ठीक नहीं था. ख़राब प्रदर्शन के लिए वो कोई बहाना नहीं बना रहे हैं, बल्कि हक़ीक़त बयां कर रहे हैं. इसमें बुरा लगने वाली क्या बात है, ख़ासकर तब जब इंग्लैंड में भारतीय टीम ने दयनीय प्रदर्शन किया हो.
यहां मुश्किल ये है कि कई पूर्व और मौजूदा क्रिकेटर हैं जो उनकी जेबें भर रहे आईपीएल की तरफदारी कर रहे हैं. वे इसके समर्थन में ज़ोरदार आवाज़ उठा रहे हैं. बहरहाल, आलोचना आईपीएल की नहीं बल्कि इसके आयोजन के समय की हो रही है. ये समस्या तब तक बनी रहेगी, जब तक कि इसके लिए लिए क्रिकेट कलेंडर में अलग व्यवस्था नहीं होती. इस टूर्नामेंट में पैसे की इस कदर बरसात हो रही है कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड साल में दो आईपीएल आयोजनों की सोच रहा है. कितनी क्रिकेट जिसके करोड़ों रुपये दांव पर लगे होंगे वो क्यों चाहेगा कि टीमें वनडे या टेस्ट क्रिकेट खेलें. बल्कि अगर उसे मौक़ा मिले तो वो दो देशों के बीच होने वाले टी-20 मैचों को नहीं होने देना चाहेगा. ये तो प्रशासकों को तय करना है कि कितनी क्रिकेट अच्छी है और सीमा रेखा कहां खींची जानी चाहिए. करोड़ों लोग भारत के सेमीफ़ाइनल में नहीं पहुंच पाने से निराश हैं क्योंकि उनका मानना है कि इससे उनका सिर नीचे हुआ है, लेकिन साफ कहूं तो जब तक उम्दा क्रिकेट की बात होती रहेगी, मुझे इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन सी टीम जीतती है और कौन सी हारती है. वो चाहे डेक्कन चार्जर्स हो या फिर भारतीय टीम. क्या क्रिकेट प्रशासकों को इस बात की ज़िम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए कि विश्व कप जैसे टूर्नामेंटों के लिए वे ये सुनिश्चित करें कि उनके खिलाड़ी अपनी सर्वश्रेष्ठ फॉर्म में हों. अगर नहीं, तो वे उन लाख़ों करोड़ों क्रिकेट प्रशंसकों के साथ धोखा कर रहे हैं, जिनके बूते ये खेल चल रहा है. क्योंकि हमें ये कभी नहीं भूलना चाहिए कि क्रिकेट भारत में एक धर्म है. (लेखक अंग्रेज़ी अख़बार 'हिंदुस्तान टाइम्स' के खेल सलाहकार हैं) |
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