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भारतीय खेमे में छाया सन्नाटा | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पोर्ट ऑफ़ स्पेन में ग्रुप बी की चारों टीम हिल्टन होटल में रुकी हैं. आम तौर पर होटल की लॉबी में खिलाड़ी अपने प्रशंसकों से मिलते है और उनके साथ तस्वीरें भी खिंचवाते हैं. लेकिन शुक्रवार की रात वहाँ का माहौल कुछ अलग ही था. ना तो कोई भारतीय खिलाड़ी वहाँ नज़र आ रहा था और ना ही टीम प्रबंधन का कोई व्यक्ति. अगर नज़र आ रहे थे तो बांग्लादेश, श्रीलंका और बरमूडा के खिलाड़ी, कोच या फिर अधिकारी. भारतीय खिलाड़ी हार के सदमे से टूटे हुए अपने-अपने कमरों में बंद थे. अंदर का माहौल क्या था- ये तो नहीं पता लेकिन अंदाज़ा यही लग रहा था कि भारतीय खिलाड़ियों को ये सदमा भूलाने में वर्षों लग सकते हैं. बांग्लादेश की बल्ले-बल्ले?
जिस तरह 21 तारीख़ को मैच ना खेलते हुए भी भारतीय टीम की नज़र श्रीलंका-बांग्लादेश के मैच पर थी. कुछ ऐसा ही हाल शुक्रवार को बांग्लादेश की टीम के साथ था. बांग्लादेश की टीम भारत की हार से कितनी ख़ुश थी. इसका अंदाज़ा उनके खिलाड़ियों के चेहरे देखकर मिल रहा था. खिलाड़ी बेहिचक अपने प्रशंसकों से गले मिल रहे थे और माहौल पार्टी जैसा था. मोहम्मद अशरफ़ुल जैसा युवा खिलाड़ी के चेहरे की चमक तो यही बता रही थी कि वे तो बस बरमूडा के ख़िलाफ़ मैच में जीत का इंतज़ार कर रहे हैं ताकि विश्व कप में बांग्लादेश की बल्ले-बल्ले हो जाए. पटना के डॉक्टर साहब
क्वींस पार्क ओवल में वैसे तो मैच देखने बड़ी संख्या में भारतीय आए थे. जिनमें से ज़्यादातर अमरीका में रहने वाले भारतीय थे. लेकिन स्टेडियम का चक्कर लगाते मुझे पटना के डॉक्टर अमरेंद्र राय चौधरी मिले जो अपनी पत्नी मृदुला राय चौधरी के साथ मैच देखने आए थे. परिचय हुआ तो ठेठ भोजपुरी में उतर आए. मुझे अपनी सीट पर बिठा लिया और फिर बताने लगे कैसे उन्होंने इस मैच के लिए तैयारी की थी और क्या-क्या जतन किए थे. उस समय भारतीय टीम की स्थिति ठीक थी. इसलिए वे ख़ुशी-ख़ुशी सबसे मिल रहे थे. लोगों को सीटियाँ बाँट रहे थे जो वे पटना से लेकर आए थे. मैंने सोचा था मैच के बाद उनसे बात करूँगा. लेकिन भारत के नौ विकेट गिरने के बाद जब मैं उनके स्टैंड में पहुँचा तो वो नदारद थे. एक सज्जन ने बताया कि वो सात विकेट गिरने के बाद इतना मायूस हो गए कि अपना बैनर, पोस्टर- सब लेकर चल दिए. नशे में हूँ तो क्या....
भारत में भारतीय टीम की हार की क्या प्रतिक्रिया होनी है- ये तो सबको अंदाज़ा है. लेकिन ये कहानी कुछ अलग सी है. शुक्रवार की रात जब हम खाना खाने एक रेस्तरां में पहुँचे तो हमारे गले में लटके विश्व कप के पास को देखकर नशे से डोल रहे एक सज्जन हमारे पास पहुँच गए. तपाक से पूछा- भारतीय टीम वापस कब जा रही है. मैंने कहा- मुझे क्या पता. उन्होंने मेरे गले में लटके पास की ओर इशारा किया और कहा- आप तो पत्रकार हो और भारतीय भी. तो आपको तो पता होना चाहिए. मैंने पहले तो अपने गले में लटके पास को निकाला और अपने बैग में रखा और फिर उनसे मुख़ातिब हुआ. मैंने कहा- भई मुझे अभी इसकी कोई जानकारी नहीं और वैसे भी बांग्लादेश-बरमूडा मैच तक तो उन्हें इंतज़ार करना ही पड़ेगा. फिर तो वे भारतीय टीम को गरियाने लगे. मैं उनसे पल्ला झाड़ने की कोशिश करता रहा और वे गले पड़ते रहे. अब इसे जाने दीजिए कि मैंने उनसे कैसे पीछा छुड़ाया. खैर वो सज्जन तो नशे में थे. लेकिन जो समर्थक नशे में नहीं- उनकी भी प्रतिक्रिया में कोई ज़्यादा का तो अंतर नहीं होगा. |
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