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गुरुवार, 22 मार्च, 2007 को 13:40 GMT तक के समाचार
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मुर्गे की बाँग से खुली आँख

मुर्गे की बाँग से अब शहरों कहाँ आँख खुलती है
आप दूर देश में हों और अचानक कुछ ऐसा हो जाए जिससे आपकी कई पुरानी यादें ताज़ा हो जाएँ, तो सचमुच दिल बाग-बाग हो जाता है. जब दिल के बाग-बाग होने की बात आई, तो आपको बता ही दूँ कि इसकी वजह क्या है.

श्रीलंका-बांग्लादेश मैच के बाद मैं थका हारा देर रात घर पहुँचा. अच्छी नींद आई. कितनी देर सोया, पता नहीं.

एकाएक मुर्गे की बाँग ने नींद तोड़ दी. वो भी एक या दो बार नहीं...कई बार. नींद खुली..घड़ी पर नज़र गई.

तो देखा सुबह के पाँच बज रहे हैं. सामने बाल्कनी से बाहर नज़र दौड़ाई तो सूरज की लालिमा दिख रही थी.

सोचा ना जाने कितने सालों के बाद मुर्गे की बाँग कानों को मिली है. नींद जल्दी टूटने के बावजूद मुर्गे की बाँग ने ऐसी शीतलता दी कि लगा अब सोने की आवश्यकता नहीं.

भारतीयता का पैमाना

पोर्ट ऑफ़ स्पेन में बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं. वेस्टइंडीज़ के द्वीप समूहों में गयाना के बाद पोर्ट ऑफ़ स्पेन भारतीयों की आबादी के हिसाब से सबसे बड़ा शहर है. इस शहर में घूमते-फिरते आपको भारतीयों से टकराना ही पड़ता है.

कम भाररतीय नहीं हैं वेस्टइंडीज़ के भारतवंशी

क्वींस पार्क ओवल में भी एक सज्जन मुझसे टकराए. भारतीय टीम की पोशाक में नज़र आए, तो मैंने उनसे बात करनी चाही. बोले- मैं हिंदी नहीं जानता. मैंने कहा- आप हिंदी बोलते तो आसानी रहती क्योंकि हमारे श्रोता हिंदी भाषी ज़्यादा हैं.

उन्होंने हँसते हुए- हम यहाँ पैदा हुए और पले-बढ़े हैं. आपको क्या लगता है हम हिंदी में नहीं बोलते तो हम भारतीय नहीं. हम आपसे ज़्यादा भारतीय हैं क्योंकि हमने अपनी परंपराओं को जीवित रखा है.

सचमुच मैं लाजवाब हो गया.

भारतीय मीडिया

बात विश्व कप की हो और भारतीयों की ना हो- ऐसा हो नहीं सकता. लेकिन जितनी बड़ी संख्या में यहाँ भारतीय मीडिया मौजूद है- आप कल्पना नहीं कर सकते.

भारतीय पत्रकार बड़ी संख्या में मौजूद हैं

पोर्ट ऑफ़ स्पेन के क्वींस पार्क ओवल का मीडिया सेंटर भारतीय पत्रकारों से भरा रहता है. लगता है भारतीयों के अलावा कोई क्रिकेट को कवर ही नहीं कर रहा.

श्रीलंका-बांग्लादेश मैच के दौरान भारतीय मीडिया का एक तबका टीम प्रैक्टिस पर मौजूद था. इसलिए मीडिया सेंटर में अपेक्षाकृत कम भीड़ थी. लेकिन सीट पर जिन लोगों के नाम लिखे गए थे, वो ज़्यादातर भारतीय थे. मैं कई ख़ाली सीटों के पास से गुज़रा, तो किसी पर मराठी अख़बार, किसी पर बंगाली अख़बार, मलयाली अख़बार, टीवी चैनल और समाचार एजेंसी- सभी पर भारतीयों के नाम लिखे हुए हैं.

भई समझ लीजिए. बात क्रिकेट प्रेमियों और बाज़ार की ही नहीं- मीडिया के लिए भारत का सुपर-8 में पहुँचना कितना मायने रखता है.

जायज़ ग़ुस्सा

हम पत्रकारों को कभी-कभी ऐसी परिस्थिति से गुज़रना पड़ता है. जब ग़ुस्सा तो बहुत आता है लेकिन बाद में सोचने पर बात समझ में आती है.

अपनी टीम का टी-शर्ट पहनकर मैच देखते प्रशंसक

श्रीलंका-बांग्लादेश मैच के दौरान मैं दर्शकों के स्टैंड में घूम रहा था. श्रीलंका या बांग्लादेश के क्रिकेट प्रेमियों की तस्वीरें लेने के लिए.

ऐसा ही एक ग्रुप एक कोने में बैठा- लंबे समय से ढोल-नगाड़े पीट रहा था. बांग्लादेश के ये क्रिकेट प्रेमी अपने को बांग्लादेशी राष्ट्रीय ध्वज के रंग से रंगे थे.

मेरे वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते मैच में ट्विस्ट आ गया था. मुझे इसका अंदाज़ा तो था लेकिन मैं सहज भाव से उनके पास पहुँच गया.

जब तस्वीर खींचने के लिए कैमरा निकाला तो एक सज्जन नाराज़ हो गए और तस्वीरें खिंचवाने से इनकार कर दिया. दरअसल उसी समय 100 से कम के स्कोर पर बांग्लादेश का छठा विकेट गिरा था.

और मैं उनकी निराशा के बीच उनकी फोटो उतारने पहँच गया. मेरे कैमरे के क्लिक करने से पहले उन्होंने अपना मुँह फेर लिया.

उस समय मुझे भी थोड़ा क्षोभ हुआ लेकिन बाद में सोचा तो एहसास हुआ कि क्रिकेट को लेकर लोगों की दीवानगी में ऐसा ग़ुस्सा तो जायज़ ही था.

अच्छों से मिलना
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