|
अच्छा लगता है अच्छों से मिलना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वेस्टइंडीज़ आने का यह पहला मौक़ा है लेकिन पहले ही मौक़े में यहाँ के लोग मन को छू गए. लंदन से क़रीब आठ घंटे की फ़्लाइट के बाद जब बारबडोस की धरती पर क़दम रखा तो लगा जैसे शहरों की भीड़-भाड़ से दूर गाँव में नदी किनारे आ गए हो. एकदम शांति, भीड़-भाड़ कम और लोग इतने मिलनसार कि पूछिए मत. बारबडोस का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा अभी निर्माणाधीन है और चीन के भारी-भरकम निवेश से बड़ी इमारतें खड़ी हो रही हैं. इस नयी-नवेली इमारत में जब त्रिनिडाड की फ़्लाइट के लिए पहुँचा तो गिनती के लोग लाइन में थे. और मानो या ना मानो काउंटर भी एक ही था जिस पर एक महिला अपनी मधुर मुस्कान से लोगों का स्वागत कर रही थी. सब कुछ लुभावना लगने के साथ कुछ चीज़ें खटकी भी थीं. वही जिस पर विश्व कप के आयोजन से पहले लोगों को अंदेशा था यानी आधारभूत सुविधाओं में कमी. तकनीकी सुविधाओं का अभाव. इसका नज़रा हवाई अड्डे पर भी देखने को मिला जब काउंटर पर खड़ी अकेली महिला अपने सहयोगी की सहायता की आस में वायरलेस से लंबे समय तक जूझती रही. ख़ैर मेरी बारी आई तो पहले तो देरी के लिए उन्होंने खेद जताया और फिर पासपोर्ट देखते हुए पूछ बैठी. आपका जन्मदिन और मेरा जन्मदिन मिलता है क्यों ना हाथ मिलाएँ. मैंने ख़ुशी-ख़ुशी अपना हाथ आगे बढ़ा दिया. अपना बोर्डिंग कार्ड लेकर जब मैं बोर्डिंग एरिया में पहुँचा, तो सुरक्षा जाँच हुई. अकेला मैं और जाँच करने वाले पाँच-छह. एक ने पूछा- आप क्रिकेट देखने आए हैं. मैंने जब हाँ में गर्दन हिलाई तो भारत की भी बात उठी. एक ने तो कमज़ोर नब्ज़ पर ही हाथ रख दी और पूछा भारत क्या दूसरे दौर में पहुँच जाएगा. फिर बात चली तो पाकिस्तान टीम से होती हुई बॉब वूल्मर तक आई और फिर भारतीय उपमहाद्वीप में क्रिकेट को लेकर दबाव पर भी सवाल उठे. त्रिनिडाड के लिए जब विमान में सवार होने चला तो मन थोड़ा घबराया. विमान बहुत छोटा था. सच पूछिए तो विमान की दशा देखकर मन थोड़ा दुखी भी हुआ. कई सीटें टूटी हुईं और हिलती हुईं. विमान परिचारिका अकेली थी और पायलट भी अकेले ही थे. विमान उड़ा और एक घंटे की फ़्लाइट के दौरान कभी पायलट के केबिन का दरवाज़ा खुल जाता था, तो कभी चर्र-चर्र की ध्वनि निकालते सीट डराते भी थे. हद तो उस समय हो गई जब आगे वाली सीट के ऊपर का एक इलेक्ट्रॉनिक सॉकेट एक झटके से निकल गया. कुछ यात्री थोड़ा घबराए, लेकिन कुछ को तो जैसे इसकी आदत सी हो गई थी. इतना सब कुछ होने के बाद भी विमान परिचारिका को पता नहीं चला. बाद में जब वे पहुँची, तो उस निकले हुए सॉकेट को फ़िट करने की नाकाम कोशिश करती रहीं. ख़ैर एक घंटे बाद बारबाडोस के बाद हम एक और ख़ूबसूरत देश पहुँचे त्रिनिडाड. त्रिनिडाड, जो ग्रुप मैचों में भारतीय टीम के मैचों की मेज़बानी कर रहा है. क्वींस पार्क ओवल के मैदान से गुज़रते हुए यही आस लगाई कि शायद भारत दूसरे दौर में पहुँच ही जाएगा. अगली बार पोर्ट ऑफ़ स्पेन की कहानी. |
इससे जुड़ी ख़बरें बेहतरीन कोच थे बॉब वूल्मर18 मार्च, 2007 | खेल सहवाग को टीम से हटाने की मांग18 मार्च, 2007 | खेल क्रिकेट प्रेमियों के सब्र का बाँध टूटा18 मार्च, 2007 | खेल बांग्लादेश के हाथों भारत की शर्मनाक हार17 मार्च, 2007 | खेल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||