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शुक्रवार, 22 सितंबर, 2006 को 16:41 GMT तक के समाचार
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'भारत हारा नहीं बल्कि ऑस्ट्रेलिया जीता है'

सचिन
भारतीय बल्लेबाज़ों का प्रदर्शन निराश करने वाला था
शुक्रवार के खेल को यह कहने के बजाय कि यह भारत की हार है, मैं इसे ऑस्ट्रेलिया की जीत कहना ज़्यादा बेहतर समझूँगा.

जिस तेज़ी, जिस रणनीति और जिस प्रोफ़ेशनल तैयारी के साथ ऑस्ट्रेलिया ने भारत के साथ मैच खेला वह कम ही देखने को मिलता है. मेरा मानना है कि जो बेहतर होता है, वही हमेशा जीतता है.

जब ऑस्ट्रेलिया ने 214 रनों का लक्ष्य रखा तो हमें लग रहा था कि भारत जीत जाएगा पर जिस ताकत और तैयारी के साथ ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज़ों ने खेल को संभाला उसके बाद यह भी सोचना चाहिए कि भारतीय बल्लेबाज़ों पर क्या गुज़र रही होगी.

उन्होंने प्रोफ़ेशनल तरीके से खेल खेला और हमारे बल्लेबाज़ों को पनपने नहीं दिया.

ऐसा देखने को मिला है कि जब पहली टीम छोटा लक्ष्य सामने रखती है तो दूसरी टीम अक्सर हार जाती है.

पिछले विश्वकप को याद करें. भारत ने 183 बनाए थे और लोग यह सोचकर सो गए कि भारत तो हार गया पर ऐसा नहीं हुआ.

ऐसी स्थिति में टीम एक तरह के प्रभाव में आ जाती है. हालांकि भारत के साथ ऐसी स्थिति नहीं थी. वो तो पहले से ही ख़राब स्थिति में थे.

भारत का प्रदर्शन

न तो टीम में लय थी और न ही बल्लेबाज़ों ने कुछ करके दिखाया. हाँ, गेंदबाज़ों ने अच्छा प्रदर्शन किया है.

पहले मैच में भारत की जिस तरह से शुरुआत हुई थी वो ठीक थी पर बाद में बारिश होने की वजह से, कुछ मनोबल में गिरावट आने की वजह से और फिर बल्लेबाज़ी के निराशाजनक प्रदर्शन से भारत को बाद के मैंचों में नुकसान हुआ है.

डीएलएफ़ कप में जो भारत के लिए हाईलाइट रहा है वह है भारत की गेंदबाज़ी. अक्सर देखने को मिलता है कि बल्लेबाज़ मैच जितवाते हैं पर इस बार भारत ने गेंदबाज़ी में काफ़ी बेहतर प्रदर्शन किया है.

दरअसल हम प्रोफ़ेशनल तरीके से खेल ही नहीं रहे थे. वो कोशिश ही नहीं देखने को मिली जिससे कि हम शीर्ष पर पहुँच पाते.

शीर्ष क्रम के सभी बल्लेबाज़ कोई जलवा नहीं दिखा सके. अगर सचिन तेंदुलकर को छोड़ दें तो बाकी तीन शीर्ष बल्लेबाज़ों का प्रदर्शन निराश करने वाला ही था.

अगर शीर्ष खिलाड़ी ही अच्छा प्रदर्शन न करें तो आप किसको टीम से बाहर कर देंगे. इनका विकल्प क्या है हमारे पास.

वैसे देखा जाए तो इस तरह के ख़राब फ़ार्म का दौर सभी टीमों में देखने को मिलता है. इसका उदाहरण इंग्लैंड की टीम के खेल से देखा जा सकता है.

पाँच वर्षों से वो हर जगह ख़राब प्रदर्शन करते रहे. यही क्रिकेट है. इसी को कहते हैं क्रिकेट.

नसीहत

मुझे लगता है कि भारतीय टीम में हर पहलू पर सुधार की ज़रूरत है. ऑस्ट्रेलिया की टीम के साथ ऐसा है पर हमारे यहाँ ऐसा नहीं हो रहा है.

जैसे-जैसे खेल बढ़ता जाता है, रणनीति खेल के मुताबिक बदलती जाती है और भारत को इस दिशा में चौकन्ना होने की ज़रूरत है.

इस टीम में कोई भी एथलीट नहीं है. कोई भी ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ली के दमखम वाला नहीं नज़र आता. हमें अपनी इस सीमाओं को भी समझना होगा.

इस तरह की कितनी ही चुनौतियाँ हैं हमारी टीम के सामने जिनमें सुधार लाने की ज़रूरत है.

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