'लड़की पायलट हो सकती है तो पहलवान क्यों नहीं'

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रियो ओलंपिक में भारत को कांस्य दिलाकर इतिहास रचने वाली पहलवान साक्षी मलिक की मां पूछती हैं कि जब लड़कियां डॉक्टर, इंजीनियर, पायलट हो सकती हैं, तो फिर पहलवान क्यों नहीं?
भारत को ओलंपिक में पदक दिलाने वाली वो चौथी महिला एथलीट हैं. इससे पहले केवल कर्णम मल्लेश्वरी, मेरी कॉम और साइना नेहवाल ने ही ओलंपिक में भारत के लिए पदक जीते हैं.
रोहतक स्थित साक्षी की माता जी सुदेश मलिक आंगनवाड़ी में सुपरवाइज़र हैं.
पढ़ें सुदेश मलिक से बीबीसी की ख़ास बातचीत, उन्हीं की ज़ुबानी-
"कई लोग बेटी की पहलवानी की ट्रेनिंग के बारे में पूछते थे. हम एक ही सवाल करते थे, जब लड़कियां डॉक्टर, इंजीनियर, पायलट लड़कियां हो सकती हैं तो फिर पहलवान क्यों नहीं?

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साक्षी कई वर्षों से एक रूटीन लाइफ जीती आ रहीं हैं. सुबह चार बजे उठना, फिर प्रैक्टिस करना और नौ बजे वापस आना, थोड़ी देर सोना, खाना-पीना और फिर शाम को वापस प्रैक्टिस पर जाना.
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अगर उसे लगता कि प्रैक्टिस में थोड़ी बहुत भी कमी रह गई तो वो स्वीमिंग भी करती है. जिम भी जाती है. साक्षी ने कई वर्षों से एक ही शेड्यूल बना रखा है. उसे एक दिन में कितना और क्या-क्या करना है.

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मेरी बेटी ने यहां तक पहुंचने के लिए बहुत मेहनत की है. साक्षी ने एक डायरी बना रखी है. जिसमें वो हर दिन लिखती है कि उसने आज क्या किया और कल क्या-क्या करना है. वह टाइम की बहुत पाबंद है.

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उसके कोच भी कहते थे कि बातचीत हो या ट्रेनिंग के लिए मेहनत, वो हर काम बहुत लगन से करती है.
उसकी मेहनत देख कर हमें लग गया था कि एक दिन बेटी इंडिया के लिए ओलंपिक मेडल लाएगी.
लड़कियों का सफ़र कठिन तो होता है लेकिन साक्षी के साथ उसका परिवार हमेशा रहा है. हम सिर्फ उसे उसके खेल पर ध्यान देने की बात करते थे. बाकी सभी काम मैं कर दिया करती थी.

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साक्षी के वापस आने का इंतजार है. मैं और पूरा रोहतक उसका इंतजार कर रहा है.
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