इतिहास धोनी के साथ इंसाफ करेगा?

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- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सितंबर, 2007 में अपने ड्रॉइंग रूम में बैठ कर जब टीम इंडिया को टी-20 विश्व कप लहराते देखा था तब युवराज सिंह के शानदार फ़ॉर्म के साथ ही महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी भी ज़हन में बस गई थी.
भारतीय क्रिकेट के लिए ये एक ऐसा दौर था जहाँ एक सफल कोच से लेकर कप्तान तक की तलाश जारी थी.
चंद महीने पहले राहुल द्रविड़ की कप्तानी में टीम इंडिया एक दिवसीय विश्व कप में मुंह की खा कर लौटी थी.
लेकिन धोनी की उस युवा टीम में सचिन, द्रविड़, लक्ष्मण, कुंबले, ज़हीर और सौरव गांगुली नहीं थे. यही उस टीम और धोनी की उपलब्धि थी.
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एक वर्ष के भीतर ही धोनी को टेस्ट मैचों और एक दिवसीय क्रिकेट में भारतीय टीम की बागडोर सौंपी गई. उसके बाद कप्तान धोनी ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.
टेस्ट क्रिकेट टीमों में शीर्ष स्थान, न्यूज़ीलैंड-वेस्टइंडीज़ में जीत और 2008, 2010 और 2013 में बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफ़ी पर फ़तह मिली.
हालांकि मेरी नज़र में, पूरे 28 वर्षों बाद, 2011 में भारत को एक दिवसीय विश्व कप जितवाने में धोनी की सधी हुई कप्तानी का बड़ा हाथ था.
इतिहास के पन्नों में

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वानखेड़े स्टेडियम के प्रेस बॉक्स से मैंने खुद धोनी को जीत वाला शॉट खेलकर, क्रीज़ पर ख़ामोशी से खड़े होकर, इतिहास के पन्नों में दर्ज होते देखा था.
लेकिन फिर भी, न जाने क्यों, 'एमएस' कभी भी मेरे सबसे चहेते क्रिकेटर न हो सके. शायद मैं ही गलत था.
क्योंकि मैं सचिन के स्ट्रेट ड्राइव, गांगुली के कवर ड्राइव और द्रविड़ के बैकफुट पंच के आगे कुछ और नहीं देखना चाहता था.
नज़र धोनी पर

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शायद दिल्ली के कोटला मैदान में एक ही पारी में 10 पाकिस्तानी विकेट लेने वाले अनिल कुंबले पर मैं ज़्यादा भरोसा करता रहा.
लेकिन बतौर रिपोर्टर जब-जब भारतीय टीम को कवर किया हमेशा एक नज़र धोनी पर ही रहती थी. यह देखने के लिए कि नेट्स पर और मैच के बीच उनका नज़रिया-व्यवहार कैसा है टीम के वरिष्ठ खिलाड़ियों को लेकर.
धोनी से पहले

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2008 में ऑस्ट्रेलिया की टीम भारत के दौरे पर थी और ख़राब फ़ॉर्म और चयनकर्ताओं के दबाव में सौरव 'बंगाल टाइगर' गांगुली ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने की घोषणा कर रखी थी.
बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम के प्रेस बॉक्स से साफ़ देखा कि गांगुली को कप्तान धोनी का बाउंड्री पर फ़ील्डिंग करवाना पसंद नहीं आ रहा था. लेकिन धोनी भविष्य थे और गांगुली बीती हुई बात!
लक्ष्मण का संन्यास

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इंग्लैंड के दौरे में जब राहुल द्रविड़ कई दफ़ा क्लीन बोल्ड हुए तब भी जिस जल्दी में उन्होंने अपने संन्यास की घोषणा की, वो दबाव में भले ही की गई हो, मेरे ऐसे फ़ैन को रास नहीं आई.
मुझे हमेशा लगता रहा कि इन फ़ैसलों में कप्तान की भी सलाह ज़रूर ली गई होगी.
मेरे तमाम शिकवे तब और पुख्ता हुए जब 2012 में न्यूज़ीलैंड के साथ होने वाली टेस्ट शृंखला में अपने चयन के बावजूद वीवीएस लक्ष्मण ने एक प्रेस वार्ता बुलाकर अपने संन्यास की घोषणा कर डाली.
धोनी के संबंध!

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पूछे जाने पर कि उन्होंने ये फैसला कप्तान धोनी को बताया कि नहीं, लक्ष्मण का जवाब था, "मुझे उन तक पहुँच पाने में दिक्कत हुई."
आम राय भी यही है कि इन सभी दिग्गज क्रिकेटरों का संन्यास एकदम सही समय पर हुआ और नए कप्तान धोनी को अपनी मनमाफ़िक टीम मिलनी ही चाहिए थी.
मीडिया में यदा-कदा ऐसे किस्से भी छपते रहे कि सहवाग और गौतम गंभीर जैसे नामचीन क्रिकेटरों से धोनी के संबंध कभी भी मधुर नहीं रहे.
सफलता की ऊँचाई

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2012 में आयोजित टी-20 विश्व कप के दौरान मैं जितनी दफ़ा भारतीय टीम की नेट प्रैक्टिस में गया, कभी भी धोनी और सहवाग को एक दूसरे से बात तक करते नहीं देखा.
बहरहाल, ये एक दूसरा ही मामला है जिसकी सच्चाई सिर्फ़ वही लोग जानते हैं जो इसमें जुड़े रहे.
लेकिन अब जब धोनी टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले चुके हैं मुझे ये कहने में कतई गुरेज़ नहीं कि भले ही धोनी के फ़ैसले सही साबित हुए हों, मुझे उनमें से कई को पचा पाने में खासी मशक्कत करनी पड़ी.
सच ये भी है कि मेरी हर निजी राय को सरेआम धराशाई करते हुए धोनी ने सफलता की जिन ऊंचाइयों को छुआ वो भी काबिले तारीफ़ है!
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