केवल 'भाई' नहीं हैं रामचंद्रन

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भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) के अध्यक्ष चुने गए एन रामचंद्रन को भले ही दुनिया भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष एन श्रीनिसावन के भाई के तौर पर जानती है लेकिन एक खेल प्रशासक के रूप में उनका लंबा अनुभव है.
दुनिया की सबसे अमीर खेल संस्था बीसीसीआई का अध्यक्ष होने के नाते श्रीनिसावन का बड़ा रुतबा और नाम है लेकिन रामचंद्रन ने उनसे इतर अपना अलग मुकाम हासिल किया है.
विश्व स्क्वॉश महासंघ के मुताबिक़ रामचंद्रन का संबंध दक्षिण भारत की सबसे बड़ी सीमेंट कंपनी इंडिया सीमेंट के प्रोमोटरों के परिवार से है और हाल तक वह कंपनी के कार्यकारी निदेशक थे.
आईओए चुनावों में रविवार को निर्विरोध चुने गए रामचंद्रन की खेलों में बहुत दिलचस्पी है और वह कई खेल संगठनों से जुड़े रहे हैं.
जब वह भारतीय ट्राएथलॉन महासंघ के अध्यक्ष थे तो उन्होंने भारत में इस नए खेल के प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभाई.
स्कवॉश राजधानी
भारतीय स्कवॉश रैकेट्स महासंघ के महासचिव के कार्यकाल के दौरान उन्होंने चेन्नई को देश की स्कवॉश राजधानी बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई और इस खेल को नई ऊँचाइयों पर ले गए.
साल 2001 में रामचंद्रन को एशियन स्कवॉश फ़ेडरेशन का अध्यक्ष चुना गया और साल 2005 में एक बार फिर वह इस पद के लिए चुने गए.
रामचंद्रन को साल 2001 में आईओए का एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट चुना गया और फिर चार साल बाद वह इसके उपाध्यक्ष बने. साल 2007 में रामचंद्रन को तमिलनाडु में खेल विकास प्राधिकरण की कार्यकारी समिति का सदस्य बनाया गया.
साल 2008 में उन्हें वित्त और ख़रीद समिति का अध्यक्ष बनाया गया. वह 2010 में दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों की लेखा समिति के सदस्य और इन खेलों के कार्यकारी बोर्ड के सदस्य भी हैं.
चुनौती

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रामचंद्रन को साल 2008 में विश्व स्क्वॉश महासंघ का अध्यक्ष चुना गया. इसके अगले साल वह एशियन स्कवॉश फ़ेडरेशन और भारतीय स्कवॉश रैकेट्स महासंघ के संरक्षक बने.
उसी साल तमिलनाडु सरकार ने उन्हें तमिलनाडु खेल विकास प्राधिकरण का उपाध्यक्ष नियुक्त किया. साल 2012 में रामचंद्रन को एक बार फिर चार साल के लिए विश्व स्क्वॉश महासंघ का अध्यक्ष चुना गया.
रामचंद्रन की असली चुनौती आईओए की ओलंपिक आंदोलन में वापसी कराना है. आईओए चुनावों में आईओसी के पर्यवेक्षक भी मौजूद थे जिनकी रिपोर्ट के बाद ही आईओए का वनवास ख़त्म होगा.
आईओए को दिसंबर 2012 में ललित भनोट और अभय सिंह चौटाला जैसे कथित रूप से 'विवादित' लोगों को चुनने के बाद उठे बवाल के चलते निलंबित कर दिया गया था और भारत के खिलाड़ियों को सोची शीतकालीन ओलंपिक में तिरंगे के बिना उतरना पड़ा.
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