रवींद्र जडेजा कैसे पहुँच गए विराट, रोहित और बुमराह के क्लब में

रवींद्र जडेजा

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    • Author, विमल कुमार
    • पदनाम, खेल पत्रकार, बीबीसी हिन्दी के लिए

"मेरे बारे में कई तरह की ख़बरें आती रहती हैं. बीच में ख़बर आई थी कि मैं मर गया हूँ. मैं ख़बरों के बारे में ज़्यादा नहीं सोचता हूँ. नेट्स में मैं प्रैक्टिस करता हूँ. अपने में सुधार करता हूँ, यही चीज़ फ़ील्ड पर मेरे काम आती है."

रवींद्र जडेजा का ये बयान पिछले साल अगस्त के आख़िरी हफ़्ते में एशिया कप के दौरान प्रेस कॉन्फ़्रेंस में आया था, जब एक पत्रकार ने उनसे ये पूछा कि वो हाल के दिनों में खेल से ज़्यादा अपनी फ़िटनेस को लेकर ख़बरों में आते हैं.

जडेजा की टिप्पणी के बाद हर किसी ने ठहाके लगाए. दरअसल, जडेजा ने बड़ी मासूमियत और मज़ाक वाले अंदाज़ में मीडिया पर ही तंज़ कसा था.

जडेजा मीडिया से नफ़रत तो नहीं करते हैं लेकिन उन्हें ये अहसास था कि इतना बेहतरीन खेल दिखाने के बावजूद उन्हें कभी भी वो दर्जा नहीं मिला, जो उनसे आधी काबिलियत वाले खिलाड़ियों को मिला.

इसे महज इत्तेफ़ाक ही कहा जा सकता है कि उस प्रेस कॉन्फ़्रेंस के बाद जडेजा को फ़िटनेस की ऐसी समस्या हुई कि उन्हें एशिया कप बीच में ही छोड़कर भारत वापस लौटना पड़ा और वो टी20 वर्ल्ड कप में भी नहीं खेल पाए.

दबी जुब़ां में फिर से ये कयास लगाए गए कि क्या उनका करियर ख़त्म होने की कगार पर था.

प्रतिभा पर शक

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क्रिकेट मीडिया में उनके करियर के शुरुआत से ही उनकी प्रतिभा पर शक किया गया. वो जो घरेलू क्रिकेट में एक के बाद एक तिहरे शतक लगा रहे होते थे, तो उनका ये कहकर मज़ाक उड़ाया जाता था कि राजकोट में जब जडेजा भी ट्रिपल सेंचुरी लगा सकता है, तो समझ लो किस तरह पाटा पिच होगी.

लेकिन, अब बीसीसीआई के सालाना करार में जडेजा का नाम देखकर कोई मज़ाक नहीं उड़ा सकता है.

रवींद्र जडेजा के प्रदर्शन पर एक नज़र

पिछले एक दशक के करियर में जडेजा ने हर मुश्किल का सामना करते हुए आज वो मुकाम हासिल किया है, जहाँ बोर्ड उनकी गिनती रोहित शर्मा, विराट कोहली और जसप्रीत बुमराह जैसे चैम्पियन खिलाड़ियों के साथ करती है.

ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ हाल में ही ख़त्म हुई बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफ़ी के दौरान जडेजा को उनके साथी और सहयोगी रविचंद्रन अश्विन के साथ मैन ऑफ द सिरीज़ का पुरस्कार मिला था.

वीडियो कैप्शन, क्रिकेटर शफ़ाली की कहानी उनके परिवार की ज़ुबानी

ऑस्ट्रेलियाई टीम के ख़िलाफ़ किसी भी स्पिनर का रिकॉर्ड इतना सशक्त नहीं है जैसा कि जडेजा का है और आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि अनिल कुंबले, हरभजन सिंह और मुथैया मुरलीधरण जैसे खिलाड़ियों ने भी कंगारूओं के ख़िलाफ बहुत टेस्ट मैच खेले हैं.

एक बात और, बाएँ हाथ के स्पिनर्स, जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट में 150 से ज़्यादा विकेट हासिल किए हैं, उनमें से किसी का भी औसत जडेजा से बेहतर नहीं हैं.

महान बिशन सिंह बेदी और डेरेक अंडरवुड से लेकर रंगना हेरात, साकिब अल हसन और डेनियल वेटोरी जैसे आधुनिक दौर के महान गेंदबाज़ों तक.

लेकिन, ये हैरान करने वाली बात होती है कि जब महानता का ज़िक्र होता है, तो जडेजा का नाम नहीं लिया जाता. इसकी क्या वजह है?

जडेजा की गेंदबाज़ी को उस अंदाज़ में परिभाषित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वो किफ़ायती हैं, प्रभावशाली हैं लेकिन जादूगर की तरह नहीं दिखते हैं.

यही बात उनकी बल्लेबाज़ी पर लागू होती है. वो निचले क्रम में आकर ताबड़तोड़ अंदाज़ में बल्लेबाज़ी करते हैं, टीम के लिए संकटमोचक की भूमिका निभातें है लेकिन फिर भी उन्हें एक बल्लेबाज़ के तौर पर वो सम्मान नहीं मिलता है जिसके वो हक़दार हैं.

उनकी फ़ील्डिंग को लेकर भी आम धारणा यही है कि वो बहुत बेहतरीन है लेकिन उसमें युवराज सिंह वाला ग्लैमर नहीं दिखता है.

विरोधाभास

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और ये बातें कई मायने में अपने आप में एक तरह से विरोधाभासी भी हैं.

आख़िर, जिस खिलाड़ी को रॉकस्टार शेन वार्न ने ख़ुद आईपीएल 2008 के दौरान 'रॉकस्टार' कहकर बुलाना शुरू किया, वो खिलाड़ी अपने खेल के चलते दुनिया की क्रिकेट में रॉकस्टार परफ़ॉर्मर हैं लेकिन आलोचकों ने कभी भी उन्हें A+ वाली क्लास का खिलाड़ी के तौर पर मानने में अक्सर हिचकिचाहट दिखाई.

बीसीसीआई के A+ वाले करार से जडेजा को 7 करोड़ सालाना मिलेंगे, लेकिन इससे कई गुना ज़्यादा बोली अतीत में आईपीएल में उनके लिए कई टीमें लगा चुकी हैं.

टी20 फ़ॉर्मेट में वैसे भी जडेजा का जलवा अलग ही है और चेन्नई सुपर किंग्स के लिए वो अक्सर तुरुप का इक्का भी साबित हुए हैं.

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पिछले साल जडेजा को सीज़न की शुरुआत में चेन्नई की कप्तानी भी दी गई, लेकिन टीम के निराशाजनक खेल के बाद उन्हें ये ज़िम्मेदारी छोड़नी पड़ी.

धोनी फिर से कप्तान बने और जडेजा को पहली बार ऐसा लगा कि उनके साथ फ्रैंचाइजी और धोनी का रवैया सही नहीं था. उन्होंने अपनी नाराज़गी भी ज़ाहिर की.

ये कोई मामूली बात नहीं थी. धोनी और चेन्नई जैसी टीम के ख़िलाफ़ कितने ही खिलाड़ी अपनी नाराज़गी ज़ाहिर कर पाते हैं?

शायद कुछ साल पहले खुद जडेजा भी ऐसा नहीं कर पाते, लेकिन आज के जडेजा को ये पता है कि दुनिया ने उनका लोहा मान लिया है.

बीसीसीआई के A+ करार मिलने से पहले ही अब वो उस कैटेगरी में गिने जाने लगे हैं. तभी तो नए आईपीएल शुरु होने से पहले धोनी और चेन्नई की टीम ने उनसे ख़ास तौर पर अलग से मिलकर विचार-विमर्श किया और पुरानी खटास और विवादों को भूलकर आगे बढ़ने का फैसला किया.

ये बात भी जडेजा के शानदार करियर की तरह कोई मामूली बात नहीं है.

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