निख़त ज़रीन: कैसे बनीं भारतीय मुक्केबाज़ी की पोस्टर गर्ल

निखत ज़रीन

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    • Author, मनोज चतुर्वेदी
    • पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

भारत की स्टार बॉक्सर निख़त ज़रीन ने दिल्ली में चल रही विमेंस वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप के 50 किलो वर्ग में गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया है.

रविवार को हुए मुकाबले में उन्होंने वियतनाम की थी ताम एनगुन को 5-0 से हरा दिया. निख़त पिछले कुछ समय से जबरदस्त प्रदर्शन कर रही हैं.

निख़त ज़रीन अब भारतीय महिला बॉक्सिंग की पोस्टर गर्ल बन गई हैं.

बीते महीने घोषित हुए बीबीसी के 'इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर' पुरस्कार की एक दावेदार निख़त ज़रीन भी थीं.

यह रुतबा उन्होंने एमसी मैरीकॉम से हासिल किया है.

खास बात यह है कि उन्हें देश की इस महान मुक्केबाज की छाया से निकलने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी.

वह पिछले साल इस्तांबुल विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर पहली बार अपना डंका बजाने में कामयाब हो सकीं.

निख़त ज़रीन एमसी मैरीकॉम की छाया से निकलने में कामयाब ही नहीं हुई हैं, बल्कि विश्व चैंपियनशिप में लगातार दूसरा पदक जीतकर उनके पदचिन्हों पर ही चलती नजर आ रहीं हैं.

मैरीकॉम ने विश्व चैंपियनशिप में सबसे ज्यादा छह स्वर्ण सहित आठ पदक जीते हैं.

मैरीकॉम को देश की निर्विवाद रूप से सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाज माना जाता रहा है. इस कारण वह चाहती थीं कि टोक्यो ओलंपिक में उन्हें बिना ट्रायल के भाग लेने को मिले. पर निख़त भी इसी वजन वर्ग से ताल्लुक रखती हैं, इसलिए वह चाहती थीं कि मुक्केबाज के चयन के लिए उनके और मैरीकॉम के बीच ट्रायल हो.

लेकिन बॉक्सिंग फेडरेशन ने ओलंपिक क्वालिफिकेशन में मैरिकॉम को भेजने का फैसला कर लिया.

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मैरीकॉम और निख़त ज़रीन विवाद

इस बात पर निख़त ज़रीन ने खेल मंत्री से ट्रायल कराने की मांग की और उन्होंने हस्तक्षेप करके ट्रायल करा दिए. पर अनुभव की कमी की वजह से निख़त ट्रायल में मैरीकॉम के सामने टिक नहीं सकीं और ओलंपिक में भाग लेने का सपना साकार नहीं हो सका.

मैरीकॉम इस ट्रायल को लेकर इतनी नाराज थीं कि उन्होंने मुकाबला खत्म होने के बाद निख़त से हाथ तक नहीं मिलाया था. निख़त के लिए यह दिल तोड़ने वाली घटना थी, क्योंकि उन्होंने जिससे प्रेरित होकर इस खेल को अपनाया, उसके हाथों ही अपमान झेलना पड़ा.

निख़त के लिए ट्रायल में लगे झटके से उबरना आसान नहीं था. वह इसके बाद अपने घर चली गईं और उसी दौरान कोविड की वजह से लॉकडाउन भी लग गया था. उन्होंने घर वालों के साथ रहकर अपने को इस झटके से उबारा. निख़त की मां परवीन सुल्ताना शुरू में उनके बॉक्सिंग को अपनाने की पक्षधर नहीं थीं.

उन्हें लगता था कि मुक्केबाज बन जाने के बाद निख़त की शादी नहीं होगी. उसी मां ने ट्रायल में हार से लगे झटके से उबारने में उन्हें मदद दी.

मैरीकॉम असल में ओलंपिक में पीले तमगे के साथ संन्यास लेना चाहतीं थीं. पर टोक्यो ओलंपिक में शुरुआती दौर में ही इनग्रिट वालोंसिया से हार जाने के कारण विश्व चैंपियनशिप से अलग हो गई और इसका फायदा निख़त को अपनी क्षमता साबित करने के रूप में मिला.

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इस पदक ने बदल दी तकदीर

निख़त ज़रीन को इस्तांबुल विश्व चैंपियनशिप-2022 में पहली बार अपनी क्षमता दिखाने का मौका मिला. वह थाई मुक्केबाज जितामास जितपोंग को हराकर स्वर्ण पदक जीत गईं. इसके साथ ही उनके करियर में लग रहा अवरोध हटता नजर आने लगा.

2022 में बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीत के साथ ये दिखने लगा था. उन्होंने फाइनल में उत्तरी आयरलैंड की कार्ली मैकनॉल को हराकर गोल्ड मेडल हासिल किया. इसके बाद विश्व चैंपियनशिप में उन्होंने दूसरा स्वर्ण पदक जीता.

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अब ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने का सपना

निख़त ज़रीन का मुख्य सपना ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतना है. वह जिस तरह से सफलताएं हासिल कर रहीं हैं, उससे लगता है कि अगले साल होने वाले पेरिस ओलंपिक में उनका यह सपना भी साकार हो सकता है.

पर इस सपने को साकार करने के लिए उन्हें 51 किलो वर्ग में उतरना होगा. पर इस वर्ग से क्वालिफाई करने के लिए उन्हें नीतू घनघस की चुनौती का भी सामना करना पड़ सकता है.

इसकी वजह यह है नीतू आजकल 48 किग्रा वर्ग में लड़ रहीं हैं पर ओलंपिक में यह वजन वर्ग नहीं होने से वह भी थोड़ा वजन बढ़ाकर इस वर्ग में चुनौती पेश करती नजर आ सकती हैं.

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पिता की उम्मीदों को किया पूरा

निजामाबाद में 14 जून 1996 को जन्मीं निख़त की दो बड़ी और एक छोटी बहन है. पिता मोहम्मद जमील क्रिकेट खेलते थे. वो चाहते थे कि उनकी कोई एक बेटी खेलों को अपनाए.

बड़ी दो बहनें अंजुम और मिनाज डाक्टर बन गई थीं. इस कारण निख़त ने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए एथलेटिक्स को अपना लिया. वह स्प्रिंटर बन गई. उन्होंने राज्य स्तर पर एक-दो कामयाबी हासिल की

पर उनके चाचा अपने बेटों को बॉक्सिंग का प्रशिक्षण देते थे और उनके कहने पर निख़त ने एथलेटिक्स को छोड़कर बॉक्सिंग को अपना लिया.

शुरुआत में घर में ही प्रशिक्षण पाने के बाद वह 2009 में विशाखापट्टनम के साई सेंटर में चलीं गई. यहां सही मायने में उनके करियर को आकार मिलना शुरू हुआ क्योंकि द्रोणाचार्य अवार्ड प्राप्त आईवी राव के प्रशिक्षण में उनका कौशल निखरने लगा.

पहली बार उनके करियर को सुर्खियां 2011 में मिलीं, जब उन्होंने यूथ वर्ल्ड बॉक्सिंग में स्वर्ण पदक जीता.

पर उन्हें यहां से विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतने का सफर पूरा करने में 11 साल लग गए. इसकी वजह से उनके वजन वर्ग में ही एमसी मैरिकॉम का भी भाग लेना था. उन्होंने 2019 में सोफिया (बुल्गारिया) में स्ट्रेटडजा मेमोरियल बॉक्सिंग में स्वर्ण जीतकर सीनियर वर्ग में छाप छोड़ना शुरू किया.

शुरुआती दौर की मुश्किलें

हम सभी जानते हैं कि निख़त ज़रीन ऐसे समाज से ताल्लुक रखतीं हैं कि यहां बेटियों को खेलों में भेजना अच्छा नहीं माना जाता है. उसमें भी लड़की का बॉक्सर बनना किसी को भी पचना आसान नहीं था. कुछ रिश्तेदारों ने यहां तक कहा कि वह यदि मुक्केबाजी करेगी, तो उससे शादी कौन करेगा.

मुस्लिम समाज में लड़कियों को खेलों में भेजना इसलिए भी पसंद नहीं किया जाता था, क्योंकि खेलों में लड़कियों को छोटे कपड़े पहनना पसंद नहीं किया जाता था. हमें याद है कि सानिया मिर्ज़ा को नेकर पहनकर खेलने पर उनके खिलाफ फतवा तक जारी कर दिया गया था.

पर हमारे यहां चमत्कार को नमस्कार करने की परंपरा है, इसलिए निख़त ज़रीन के सफलताएं पाते ही जो लोग आलोचना करने से नहीं अघाते थे, वह भी उसकी प्रशंसा में लग गए. पर उनके पिता की तारीफ करनी होगी कि वह अपनी बेटी को मुक्केबाज़ बनाने के लक्ष्य से कभी नहीं भटके.

उन्होंने इस्तांबुल विश्व चैंपियनशिप में निख़त ज़रीन के स्वर्ण पदक जीतने पर कहा था, "वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड जीतना एक ऐसी कामयाबी है, जो मुस्लिम ही नहीं देश की हर लड़की को कामयाबी हासिल करने के लिए प्रेरित करेगी. लड़का हो या लड़की सभी को अपनी राह खुद बनानी पड़ती है और निख़त ने भी ऐसा ही किया है."

निखत ज़रीन

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पढ़ाई जारी रखी और अफसर बनीं

इस मुक्केबाज को घर में पढ़ाई का माहौल होने का भी फायदा मिला. आमतौर पर खिलाड़ियों की पढ़ाई पर ब्रेक लग जाता है. पर निख़त ज़रीन ने हैदराबाद के एवी कालेज से ग्रेजुएशन किया है. यह ग्रेजुएशन आर्ट्स में है.

उन्होंने शुरुआती शिक्षा सरकारी माध्यमिक स्कूल से की. इसके बाद वह निजामाबाद के निर्मला गर्ल्स हाईस्कूल में पढीं. मुक्केबाज़ी में सफलताएं पाने के बाद 19 जून 2021 को उन्हें हैदराबाद में बैंक ऑफ़ इंडिया में स्टाफ अधिकारी की नौकरी मिल गई.

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