वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भारत चार गोल्ड पर पंच लगाने को तैयार

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- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
भारतीय मुक्केबाज़ निख़त ज़रीन की अगुआई में आईबीए महिला विश्व मुक्केबाज़ी चैंपियनशिप में पहली बार चार स्वर्ण पदक पर पंच लगाने जा रहे हैं.
निख़त के फ़ाइनल में पहुंचने की सबसे ख़ास बात यह रही कि उन्होंने सेमीफ़ाइनल में उस मुक्केबाज़ को हराया, जिसने टोक्यो ओलंपिक में भारत की जानीमानी मुक्केबाज़ एमसी मैरी कॉम की चुनौती को तोड़कर उनका सपना चकनाचूर कर दिया था.
निख़त ज़रीन के अलावा लवलीना बोरगोहाईं (75 किलो भारवर्ग), नीतू घनघस (48 किलो भारवर्ग) और स्वीटी बूरा (81 किलो भारवर्ग) ने भी फ़ाइनल में स्थान बनाकर भारत के लिए अधिकतम चार स्वर्ण पदक जीतने की उम्मीदें बना दीं हैं.
भारतीय मुक्केबाज़ यदि इस चैंपियनशिप में चार स्वर्ण जीत जाते हैं तो यह अब तक का उसके बेस्ट प्रदर्शन हो सकता है.
एक दिलचस्प बात यह है कि भारतीय मुक्केबाज़ी की पोस्टर गर्ल मानी जाने वाली निख़त ज़रीन और नीतू घनघस दोनों इस समय देश का सम्मान बढ़ाने के लिए मुक़ाबला कर रहीं हैं, लेकिन कुछ समय बाद 2024 के पेरिस ओलंपिक के लिए दोनों आपस में मुक़ाबला करती नज़र आएंगी.
इसकी वजह यह है कि यहां निख़त 50 किलो भारवर्ग में और नीतू 48 किलो भारवर्ग में लड़ रहीं हैं. लेकिन ओलंपिक में यह दोनों ही भारतवर्ग नहीं हैं, उसमें मुक़ाबले के लिए 51 किलो भारवर्ग है. दोनों इसमें भाग लेने की दावेदार होंगी.

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मैरी कॉम के रास्ते पर हैं निख़त ज़रीन
निख़त ज़रीन लगातार दूसरे विश्व कप में स्वर्ण पदक जीतने की तरफ बढ़कर मैरी कॉम के पदचिन्हों पर चलती दिख रहीं हैं.
मैरी कॉम भारत की ही नहीं दुनिया की सफलतम महिला मुक्केबाज़ों में से एक हैं. उन्होंने इस चैंपियनशिप में छह स्वर्ण पदक समेत कुल आठ पदक जीते हैं.
निख़त ने वालेंसिया के ख़िलाफ़ जिस तरह का प्रदर्शन किया, वह फ़ाइनल में दो बार की एशियाई चैंपियन नगुएन थी ताम पर विजय पाने की उम्मीद बंधाता है.
निख़त के बारे में माना जाता है कि जब उनके सामने तकनीकी रूप से मज़बूत प्रतिद्वंद्वी होता है तब वो बेहतर प्रदर्शन करती हैं. वालेंसिया के ख़िलाफ़ बेहतर प्रदर्शन उनकी इस खूबी को दर्शाता है. नगुएन भी बहुत कुछ वालेंसिया की तरह की ही मुक्केबाज़ हैं, इसलिए सभी को निख़त से एक बार फिर बेस्ट प्रदर्शन देखने की उम्मीद है.
निख़त ज़रीन की यह ख़ूबी है कि जहां भी रहती हैं, वहां रम जाती हैं. निज़ामाबाद में क्रिकेट और फ़ुटबाल खेल चुके उनके पिता चाहते थे कि उनकी चार लड़कियों में से कोई एक खेल को अपने करियर के रूप में अपनाए. इस कारण ही निख़त स्प्रिंटर बन गईं.
लेकिन अपने एक रिश्तेदार की सलाह पर वह मुक्केबाज़ी के मैदान में आ गईं. वह जिस समाज से ताल्लुक रखतीं हैं, वहां लड़की का मुक्केबाज़ बनना आसान नहीं है.
उनके बारे में यहां तक कहा गया कि मुक्केबाज़ी करेगी तो इससे शादी कौन करेगा. लेकिन उनके पिता ने समाज की परवाह किए बग़ैर अपनी बेटी का साथ दिया और अब सारी दुनिया उनकी प्रशंसा कर रहा है.
निख़त का लक्ष्य लगातार दूसरा स्वर्ण पदक जीतना तो है ही, पर उनका असली सपना है ओलंपिक में गोल्ड पर कब्ज़ा करना.
सिलेक्शन के लिए ट्रायल में मैरी कॉम से हार जाने पर टोक्यो ओलंपिक में वह भाग नहीं ले सकीं थीं. पर पेरिस ओलंपिक के लिए उनकी राह खुली हुई है और वह अपना सपना साकार करने का दम भी रखती हैं.

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पदक का रंग बदलने में कामयाब
टोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली लवलीना बोरगोहाईं विश्व चैंपियनशिप में पहले भी दो बार कांस्य पदक जीत चुकीं थीं. उन्हें इंतजार था अपने पदक का रंग बदलने का.
सेमीफ़ाइनल में ली कियान को फतह करके पदक का रंग बदलने में वो कामयाब हो गई हैं, पर इस बार पदक का रंग सिल्वर होगा या गोल्ड, यह फ़ाइनल में केटलिन पारकर से मुक़ाबले के बाद ही तय हो सकेगा. केटलिन पारकर 2018 के गोल्ड कोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स की रजत पदक विजेता हैं.
लवलीना ने अपने करियर की शुरुआत में जिन हालातों में मुक्केबाज़ी की है, उसने उन्हें मानसिक रूप से मज़बूत बनाया है. इस मज़बूती के बूते पर ही वह सेमीफ़ाइनल मुक़ाबला जीतने में कामयाब हो सकीं.
पहला राउंड अपने पक्ष में करने के बाद वो दूसरे में हार गईं. इस स्थिति में सारा दारोमदार तीसरे राउंड पर आ गया.
उनके ख़िलाफ़ खड़ी चीन की मुक्केबाज़ को इस वर्ग में दिग्गज माना जाता है. पर विश्लेषकों का मानना था कि परिणाम तीसरे राउंड पर ही निर्भर रहेगा.
लवलीना ने मैच के बाद कहा "मैं जानती थी कि परिणाम अपने हाथ में भले ही ना हो, कोशिश करना तो अपने हाथ में है." मैच के दौरान इसी हौसले से उन्होंने जैब और पंचों का शानदार प्रदर्शन किया, और जीत हासिल की.
असम के गोलाघाट जिले में जन्मी लवलीना अपनी बड़ी बहनों को किक बॉक्सिंग में देखकर बॉक्सिंग के मैदान में आईं.
उनके पिता टिकेन एक छोटे व्यापारी थे. उनकी इतनी आमदनी नहीं थी कि वह बेटी को मुक्केबाज़ बनाने का खर्चा उठा सकें. लेकिन इरादों की पक्की लवलीना तमाम मुश्किलों के बावजूद इस मुकाम तक पहुंचने में सफल रहीं.
नीतू घनघस के बुलंद इरादे
नीतू घनघस के बारे में कहा जाता है कि वह हमेशा बुलंद इरादे रखती हैं और इस ख़ूबी ने ही उन्हें गोल्ड मेडल का दावेदार बनाया है.
उन्होंने कड़े संघर्ष के बाद कज़ाक़ मुक्केबाज़ अलुआ वाल्कीबेकोवा को हराकर यह सम्मान प्राप्त किया है. पहले दो राउंड आपस में बंट जाने पर तीसरे राउंड में भी दोनों के बीच इतना क़रीबी मुक़ाबला था कि फ़ैसला लेने में ख़ासी मशक्कत हुई.
कहा जाता है कि नीतू अपने आदर्श विजेंदर की तरह ही मानसिक रूप से मज़बूत मुक्केबाज़ हैं. उनके बारे में ये भी कहा जाता है कि विजेंदर के 2008 के बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने से प्रेरित होकर ही उनके पिता जय भगवान अपनी बेटी को विजेंदर के कोच जगदीश से प्रशिक्षण दिलाने भिवानी ले गए थे.
पिता ने देखा कि तमाम उभरती बॉक्सर के बीच नीतू के लिए उभरना बड़ी चुनौती हो सकता है. इसलिए बेटी को लड़कों के साथ अभ्यास करने का सिलसिला शुरू कराकर उन्होंने उसके रिफ़्लेक्सस में तेज़ी ला दी. यही गुण आज उनके काम आ रहा है.
नीतू की कड़ी मेहनत 2016 तक रंग दिखाने लगी थी और 2018 में एशियाई यूथ चैंपियनशिप का स्वर्ण जीतने तक वह सुर्खियों बटोरने लगीं थीं. लेकिन तभी उनका कंधा चोटिल हो जाने पर करियर ही मुश्किल में पड़ता नजर आने लगा.
नीतू के कंधे के ठीक होने में काफी समय लगा और इस कारण वह 2021 में ही रिंग में वापसी कर सकीं. पर उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से दिखाया कि उनके ऊपर कंधे की चोट का कोई असर नहीं है. वह यदि फ़ाइनल में लुतसाई ख़ान को फतह करके स्वर्ण पदक जीत लेतीं हैं तो उनसे इस साल सितम्बर में होने वाले एशियाई खेलों और अगले साल होने वाले पेरिस ओलंपिक में भी पदक की उम्मीद की जा सकती है. पर इसके लिए उन्हें 51 किलो वर्ग में तैयार करना पड़ेगा.

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स्वीटी बूरा की चुनौती भी है दमदार
लेकिन अब नौ साल बाद वह कम से कम रजत पदक जीतना पहले ही पक्का कर चुकीं हैं. वह ऑस्ट्रेलिया की सू एम्मा ग्रीनट्री को कड़े संघर्ष में हराने में सफल रहीं.
लेकिन उन्हें स्वर्ण पदक पक्का करने के लिए 2018 की विश्व चैंपियन वांग लीना के ख़िलाफ़ और बेहतर प्रदर्शन करना होगा.
स्वीटी को खेल अपने परिवार से ही मिला है. उनके पिता महिंदर सिंह किसान होने के साथ राष्ट्रीय स्तर पर बास्केटबॉल खेल चुके हैं.
स्वीटी ने पहले कबड्डी में ख़ुद को आज़माया और राज्य स्तर की खिलाड़ी भी बनीं. पर उनके पिता को यह खेल पसंद नहीं आया और उनके ज़ोर देने पर उन्होंने मुक्केबाज़ी के क्षेत्र में हाथ आज़माया.
वह जब पहली बार रिंग में उतरीं तो प्रतिद्वंद्वी मुक्केबाज़ ने पहले राउंड में उन्हें जमकर पीटा. इस पर भाई ने कहा कि हो गई तुम्हारी मुक्केबाज़ी, पिटकर आ गईं.
इसके बाद दूसरे राउंड में किए प्रदर्शन से स्पोर्ट्स ऑथोरिटी ऑफ़ इंडिया के कोच इतने प्रभावित हुए कि उन्हें अपने सेंटर में ले गए. इसके बाद स्वीटी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है.स्वीटी बूरा ने 2014 में पहले ही प्रयास में विश्व चैंपियनशिप में रजत पदक जीत लिया था. लेकिन वह इस प्रदर्शन को लंबे समय तक दोहरा नहीं सकीं.
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