सौरव गांगुली बीसीसीआई बॉस के तौर पर कामयाब या नाकाम?

    • Author, चंद्रशेखर लूथरा
    • पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

सौरव गांगुली की भारतीय क्रिकेट बोर्ड से विदाई अब औपचारिकता भर है.

नए अध्यक्ष के तौर पर 1983 के वर्ल्ड कप जीत में अहम योगदान दिलाने वाले और टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले ऑलराउंडर रोजर बिन्नी के स्वागत की बोर्ड तैयारी कर रहा है.

बतौर कप्तान सौरव गांगुली को भारतीय क्रिकेट में बहुत बड़े बदलाव लाने और टीम के खिलाड़ियों में आक्रामकता भरने के लिए जाना जाता है. ऐसे में जब अक्टूबर 2019 में वे दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड के निर्विरोध अध्यक्ष बने तो उनसे काफ़ी उम्मीदें की गई थीं.

उन्होंने बोर्ड के कामकाज से लेकर भारतीय क्रिकेट में बदलाव की बातें भी की. आम क्रिकेट प्रेमियों में भी इस बात की खुशी थी कि एक कामयाब पूर्व कप्तान पहली बार क्रिकेट प्रशासन के शीर्ष तक पहुंचा है. वे भारतीय क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष बनने वाले पहले क्रिकेटर भी थे.

लेकिन तीन साल के अपने कार्यकाल के दौरान एक तरह से उन्होंने भारतीय क्रिकेट फैंस को निराश किया. ख़ासकर उनके कार्यकाल के दौरान जिस तरह से विराट कोहली को कप्तानी छोड़नी पड़ी, उसको लेकर गांगुली की काफ़ी आलोचना हुई. पिछले साल दक्षिण अफ़्रीका दौरे से ठीक पहले विराट कोहली ने खुले तौर पर गांगुली को 'झूठा' भी बताया था.

टीम चयन में दखल?

बीसीसीआई सूत्रों के मुताबिक ऐसे ही कुछ आरोपों को चलते सौरव गांगुली को बीसीसीआई अध्यक्ष का दूसरा कार्यकाल नहीं मिला और असहज परिस्थितियों में उनकी विदाई हो रही है. गांगुली के कार्यकाल के दौरान यह चर्चा भी सुनने को मिलती थी कि बीसीसीआई अध्यक्ष के तौर पर टीम इंडिया की सलेक्शन कमेटी की बैठकों में भी शामिल हो जाते थे.

यह बीसीसीआई के संविधान और निष्पक्ष एवं पारदर्शी चयन प्रक्रिया का उल्लंघन था. बीसीसीआई के अंदरखाने इस बात की भी चर्चा है कि एक चयनकर्ता ने बीसीसीआई सचिव को ऐसी एक बैठक की जानकारी देते हुए लिखा था कि गांगुली ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया था, लेकिन यह भयभीत करने वाला अनुभव था.

कोहली के अलावा पश्चिम बंगाल के विकेटकीपर ऋद्धिमान साहा ने यह दावा करके गांगुली की मुश्किलें बढ़ा दी, जब उन्होंने कहा कि गांगुली ने उन्हें भरोसा दिया था 'जब तक वे बीसीसीआई अध्यक्ष हैं, तब वह भारतीय टेस्ट टीम में अपनी जगह को लेकर निश्चिंत रहें.'

साहा के दावे से भी यह सवाल उठता है कि क्या गांगुली अपने कार्यकाल के दौरान टीम चयन में सीधे दखल देते थे?

बीसीसीआई संविधान के मुताबिक चयन समिति की बैठक में हिस्सा लेने की अनुमति बीसीसीआई अध्यक्ष को नहीं है. बीसीसीआई अध्यक्ष के बदले बीसीसीआई सचिव चयनसमिति की बैठक के आयोजन के प्रभारी होते हैं.

गांगुली का कार्यकाल

सौरव गांगुली ने जब बीसीसीआई अध्यक्ष का पदभार संभाला तो उनसे काफ़ी उम्मीदें की जा रही थी. क्रिकेट खिलाड़ियों को उम्मीद थी कि खिलाड़ियों पर पड़ने वाले वर्कलोड को गांगुली बेहतर समझेंगे. कई पूर्व क्रिकेटरों ने घरेलू क्रिकेट में सुधार की मांग भी गांगुली से की थी.

अपने तीन साल के कार्यकाल में गांगुली ने इन दोनों पहलूओं पर कोई ध्यान नहीं दिया. हक़ीक़त ये भी है कि घरेलू क्रिकेट इन दिनों कहीं ज़्यादा खस्ताहाल है. यहां हमें यह भी देखना होगा कि घरेलू क्रिकेट को नुकसान कोविड महामारी के चलते भी हुआ, लेकिन इसी दौरान पैसे की लीग मानी जाने वाली इंडियन प्रीमियर लीग का आयोजन संयुक्त अरब अमीरात में कराया गया.

पूर्व खिलाड़ियों की पेंशन बढ़ाने की मांग पर गांगुली ने बतौर बीसीसीआई अध्यक्ष ध्यान नहीं दिया, इस मामले को बीसीसीआई सचिव जय शाह ने आगे बढ़ाया और पूर्व खिलाड़ियों की पेंशन को दोगुना कराया.

इस दौरान गांगुली की एक पत्रकार से कथित नज़दीकियों ने भी उनके लिए मुश्किलें बढ़ाईं.

इस पत्रकार ने विकेटकीपर ऋद्धिमान साहा को धमकाने वाले संदेश भेजा था. इसके बाद बीसीसीआई ने इस पत्रकार पर पाबंदी लगाई.

बीसीसीआई इन पर आजीवन पाबंदी लगाने वाली थी, लेकिन गांगुली ने यह सुनिश्चित किया कि इन पर दो साल की पाबंदी ही लगे.

बीसीसीआई अध्यक्ष या मार्केटिंग मैनेजर?

गांगुली के बीसीसीआई अध्यक्ष के कार्यकाल की सबसे मुखर आलोचना, भारतीय क्रिकेट बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष एन श्रीनिवासन ने बीसीसीआई पदाधिकारियों के चुनाव के लिए हुई बैठक में की.

गृहमंत्री अमित शाह के आवास पर हुई इस बैठक में खेल मंत्री अनुराग ठाकुर, उनके छोटे भाई और बीसीसीआई कोषाध्यक्ष अरुण धूमल, बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष एन श्रीनिवासन, राजीव शुक्ला, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, बीसीसीआई के अध्यक्ष सौरव गांगुली, आईपीएल चेयरमैन बृजेश पटेल और बीसीसीआई के पूर्व सचिव निरंजन शाह और मौजूदा सचिव जय शाह शामिल हुए थे.

सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में श्रीनिवासन ने गांगुली पर निशाना साधते हुए कहा, "भारतीय क्रिकेट के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि बोर्ड अध्यक्ष खेल के बदले अपने ब्रैंड को प्रमोट करते नजर आए. उन्होंने यह भी कहा कि ना तो वे और ना ही उनके गुट के लोग, बीसीसीआई अध्यक्ष पद के लिए गांगुली का समर्थन करेंगे."

वैसे गांगुली बोर्ड के पहले अध्यक्ष थे जो विभिन्न उत्पादों को प्रमोट कर रहे थे, इससे उन पर 'कॉन्फ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट' का आरोप भी लगा. इस दौरान वे ऑनलाइन गेमिंग ऐप 'माय 11 सर्किल' का प्रचार करने लगे थे, जबकि भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने दूसरी ऑनलाइन गेमिंग ऐप 'ड्रीम-11' के साथ करार किया था.

गांगुली के ऑनलाइन गेमिंग ऐप का प्रचार करने के चलते कोहली सहित दूसरे तमाम खिलाड़ी भी ऐसे गेमिंग ऐप के प्रचार से जुड़ गए. मद्रास हाइकोर्ट की मदुरई बेंच ने एक क्रिकेट फैन की शिकायत पर गांगुली और कोहली को नोटिस दिया था. अभी वर्तमान कप्तान रोहित शर्मा सहित टीम के सभी खिलाड़ी किसी न किसी ऑनलाइन गेमिंग ऐप से जुड़े हुए हैं और इसने क्रिकेट की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया है.

बीसीसीआई के शीर्ष अधिकारियों की दूसरी बैठक 10 अक्टूबर को हुई, जिसमें गांगुली को आईपीएल की चेयरमैनशिप ऑफ़र की गई, जिसे स्वीकार करने से उन्होंने इनकार कर दिया.

क्रिकेटर की जगह क्रिकेटर

क्रिकेट में दिलचस्पी रखने वालों को याद होगा कि गांगुली ने 2019 में कर्नाटक से आने वाले पूर्व भारतीय क्रिकेटर बृजेश पटेल को पछाड़ते हुए बीसीसीआई की टॉप पोस्ट पर क़ब्ज़ा जमाया था.

नामांकन दाखिल होने के कुछ घंटे पहले तक बृजेश पटेल का नाम बीसीसीआई अध्यक्ष के लिए तय माना जा रहा था लेकिन गांगुली ने अंतिम पलों की अपनी रणनीति से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया. तब यह कयास लगाए गए थे कि बंगाल चुनाव से पहले गांगुली ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने का वादा किया था.

इस वादे की पुष्टि तृणमूल कांग्रेस के उस बयान से भी होती है जिसमें कहा गया है कि गांगुली को 'बीसीसीआई अध्यक्ष का दूसरा कार्यकाल इसलिए नहीं मिला क्योंकि वो बीजेपी में शामिल नहीं हुए.'

हालांकि पिछली बार बृजेश पटेल आईपीएल चैयरमैन बन गए थे और इस बार उन्होंने अपने दोस्त और 1983 के कामयाब ऑलराउंडर रोजर बिन्नी का बीसीसीआई अध्यक्ष बनना सुनिश्चित कर दिया है.

गौरतलब है कि बीसीसीआई में आम तौर पर पद छोड़ रहे अध्यक्ष, अगले अध्यक्ष का नाम का प्रस्ताव देते हैं लेकिन गांगुली ने रोजर बिन्नी के नाम का प्रस्ताव नहीं दिया.

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