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ISWOTY- पलक से लेकर अवनि तक: भारत की विकलांग महिला खिलाड़ियों की उड़ान
- Author, वंदना
- पदनाम, भारतीय भाषाओं की टीवी एडिटर
पहली नज़र में 19 साल की पलक कोहली किसी भी सामान्य टीनएजर की तरह दिखती हैं- फुर्तीली, जोशीली, चंचल. सोशल मीडिया पर किसी एक्सपर्ट की तरह स्क्रीन स्क्रॉल करने वाली.
लेकिन आपका ये नज़रिया सिर्फ़ तभी तक है जब तक आपने पलक को बैडमिंटन कोर्ट पर न देखा हो.
(बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर के लिए वोटिंग ख़त्म हो चुकी है. नतीजे 28 मार्च को घोषित किए जाएँगे)
बैडमिंटन कोर्ट पर पलक को देखना, उनका फ़ोरहैंड, बैकहैंड और उनकी रैलीज़ को देखना किसी जादुई करिश्मे से कम नहीं. पलक झपकते ही पलक एक अलग ही शख़्सियत में तब्दील हो जाती हैं.
इस बदलाव को ज़ज़्ब करने में आपको थोड़ा वक़्त लगता है.
पलक का एक बाज़ू पूरी तरह विकसित नहीं हैं. वो एक बाज़ू की मदद से ही खेलती हैं. टोक्यो पैरालंपिक में तीन वर्गों में खेलने वाली 19 साल की पलक एकमात्र भारतीय पैराबैडमिंटन खिलाड़ी थीं.
इतनी कम उम्र में पैरालंपिक तक पहुँचना पलक की लिए बड़ी बात थी. उपलब्धि बड़ी थी तो संघर्ष भी बड़ा और कड़ा रहा है.
विकलांग लोगों के लिए पैरा-स्पोर्ट्स को लेकर जानकारी का इतना अभाव है कि 2016 तक पलक और उसके माता-पिता ने ये शब्द तक नहीं सुना था. और वो तब जब वो जालंधर जैसे शहर में रहते थे.
"तुम पैराबैडमिंटन क्यों नहीं खेलती"
पलक बताती हैं कि ये महज़ इत्तेफ़ाक़ ही था कि एक अजनबी ने उन्हें यूँ ही सरे राह रोका और कहा कि तुम पैराबैडमिंटन क्यों नहीं खेलती और उन्हें 2016 में पहली बार पैरा बैडमिंटन के बारे में पता चला.
और उसी अजनबी के कहने पर पलक ने पहली बार 2017 में बैडमिंटन रैकेट उठाया और खेलना शुरू किया. ये अंजान व्यक्ति (गौरव खन्ना) उनके कोच बने और दो साल के अंदर-अंदर वो विश्व स्तर पर टूर्नामेंट जीतने लगीं.
पलक ने बताया, "हर कोई आपकी विकलांगता पर ही ज़ोर देता है. बचपन में जब भी कोई पहली बार मुझसे मिलता था तो एक ही सवाल पूछता कि तुम्हारी बाज़ू को क्या हुआ. मैं बस इतना बोल देती कि ये बाइ-बर्थ है यानी जन्म से ही ऐसा है. तब मैं बच्ची थी और मुझे पता भी नहीं था कि बाइ-बर्थ का मतलब क्या होता है. बस मुझे ये पता था कि कोई पूछे तो यही रटा रटाया जवाब देना है."
"शुरू में मैंने कभी खेलों में हिस्सा लेने का नहीं सोचा क्योंकि मैं जब भी खेलने जाती हर कोई यही कहता कि तुम विकलांग हो, ये तुम्हारे लिए नहीं है."
पलक कहती हैं कि लोगों के नकारात्मक रवैये के बावजूद उन्होंने ख़ुद को ही चुनौती देने की ठान ली.
"मैंने अपनी डिसेबिलिटी को सुपर-एबिलिटी में बदल डाला. पैरा बैडमिंटन ने मेरी ज़िंदगी बदल दी."
पलक अकेली नहीं हैं, उनके जैसी कई विकलांग भारतीय महिला खिलाड़ी हैं जो खेल में नाम कमा रही हैं. अपने खेल से वो न सिर्फ़ इतिहास रच रही हैं, बल्कि मेडल भी जीत रही हैं. उससे भी ज़्यादा अहम ये कि वो अपने आसपास के लोगों को विकलांगता के बारे में अपना नज़रिया बदलने के लिए प्रेरित और मजबूर भी कर रही हैं.
भारत में आज भी बहुत से खिलाड़ियों को अपने ही घर-परिवार और समाज का विरोध झेलना पड़ता है. ग़रीबी और विकलांगता को लेकर लोगों का रवैया खिलाड़ियों की राह और भी मुश्किल बना देता है.
और अगर वो खिलाड़ी महिला हो तो मुश्किलें दोगुनी हो जाती हैं.
सिमरन ने शादी के बाद अपना सपना सच किया
23 साल की सिमरन भारत की पहली भारतीय महिला एथलीट हैं जिन्होंने टोक्यो पैरालिंपिक्स के लिए 100 मीटर दौड़ में क्ववालीफ़ाई किया था.
उनका प्रीमैच्योर बर्थ था और उनकी आँखों में बचपन से ही दिक़्क़त थी.
टोक्यो पैरालंपिक्स से पहले हुई बातचीत में सिमरन ने बताया था, "मेरी आँखें ठीक नहीं हैं. मतलब मैं एक चीज़ पर ठीक से फ़ोकस नहीं कर पाती. इसलिए बचपन में मेरे अपने रिश्तेदार मुझे बुली करते थे और मेरा मज़ाक उड़ाते थे. वो अक्सर कहते कि ये लड़की देखती कहीं और है और बात कहीं और करती है. मुझे बहुत बुरा लगता था."
सिमरन की ख़ासियत ये थी कि वो बचपन से ही बहुत अच्छी धावक थीं. लेकिन माँ-बाप के पास पैसे नहीं थे. 18 साल की उम्र में सिमरन की शादी हो गई.
लेकिन उनके कोच के मार्गदर्शन में सिमरन को शादी के बाद एक और मौका मिला अपने सपने सच करने का. अपनी ज़िंदगी जीने का.
ये कोच उनके पति भी थे. हालांकि उनके पति के गाँव में उस बात को लेकर काफ़ी बवाल हुआ था कि घर चलाने की बजाए एक नई नवेली दुल्हन बाहर जाकर रोज़ दौड़ लगा रही है.
लेकिन सिमरन और उनके पति ने किसी की परवाह नहीं की. 2019 और 2021 में सिमरन ने वर्ल्ड पैराएथलेक्टिस ग्रां प्री में गोल्ड मेडल जीता.
सिमरन बताती हैं कि जो परिवार उन्हें विकलांगता के लिए चिढ़ाता था वो आज उनकी वाहवाही करता है.
धीरे-धीरे ही सही, महिला पैरा-खिलाड़ियों ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है.
अवनि लेखरा- पैरालंपिक्स में गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय महिला
पैरा शूटर अवनि लेखरा के बारे में तो अब सब जानते हैं. 19 साल की अवनि पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं जिन्होंने पैरालंपिक्स में गोल्ड मेडल जीता है.
अवनि 2021 के लिए बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवीमेन ऑफ़ द ईयर की नॉमिनी भी हैं.
10 साल की उम्र में उनका ऐक्सिडेंट हो गया था और वो तब से व्हीलचेयर पर हैं. पैराशूटिंग ने उन्हें जैसे एक नई ज़िंदगी दी.
बावजूद इसके कि जिस शूटिंग रेंज पर वो जाती थीं वहाँ विकलांग खिलाड़ियों के लिए रैंप तक नहीं था. वो रैंप उन्होंने ख़ुद लगवाया.
शुरू-शुरू में उन्हें और उनके माता-पिता को ये भी नहीं मालूम था कि पैरा शूटर्स के लिए जो ख़ास किस्म के उपकरण चाहिए वो कैसे और कहाँ से मिलेंगे.
व्हीलचेयर ने अवनि को चलने-फिरने से भले रोक दिया हो लेकिन उनके सपनों की उड़ान को नहीं.
जयपुर में शूटिंग रेंज पर अवनि को खेलते हुए देखने का मौका मुझे मिला है और उन्हें खेलते देख अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पैरा शूटिंग में वो क्यों टॉप पर हैं.
कमाल का कॉन्सनट्रेशन, हमेशा परफ़ेक्ट होने की चाह और किसी सूफ़ी जैसा फ़लसफ़ा... ये सब उन्हें सबसे अलग बनाता है.
अवनि कहती हैं, "विकलांग खिलाड़ियों को किसी की सहानूभूति नहीं चाहिए. लोगों को लगता है कि हम व्हीलचेयर पर बैठकर खेलते हैं तो हमारे लिए आसान होता होगा. मैं बस ये कहना चाहती हूँ कि हम भी सामान्य खिलाड़ियों की तरह उतनी ही मेहनत करते हैं. हमें भी समान मौके मिलने चाहिए."
बदलाव
कुछ साल पहले तक की बात करें तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छे प्रदर्शन के बावजूद विकलांग खिलाड़ियों, ख़ासकर महिला खिलाड़ियों को मीडिया में भी उतनी कवरेज नहीं मिलती थी.
लेकिन अब एक धीमा बदलाव देखने को मिल रहा है. गुजरात की पारुल परमार जब वर्ल्ड पैरा बैडमिंटन चैंपियन बनीं तो कुछ आहट हुई.
2019 में भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधू पहली बार वर्ल्ड चैंपियनशिप जीतीं. ठीक उसी समय भारतीय पैराबैडमिंटन खिलाड़ी मानसी जोशी भी वर्ल्ड चैंपियन बनीं तो लोगों में पैराबैडमिंटन और विकलांग खिलाड़ियों को लेकर खुल कर बातें हुईं.
एक सड़क दुर्घटना के बाद मानसी की टाँग को काटना पड़ा था.
पैरा स्पोर्ट को लेकर छोटे शहरों-कस्बों में जानकारी का अभाव, जेंडर के नाम पर महिला खिलाड़ियों के साथ भेदभाव, विकलांग खिलाड़ियों की सहूलियत के हिसाब से बने स्टेडियमों की कमी,- ये कुछ ऐसे कारण हैं जिसकी वजह से विकलांग महिला खिलाड़ी खेल में पीछे छूट जाती हैं.
कोच की कमी भी एक बड़ी बाधा है. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में मानसी जोशी के कोच रहे गोपीचंद ने कहा था, "मुझे कई वीडियो देखने पड़े थे ये समझने के लिए कि एक विकलांग खिलाड़ी को ट्रेन करने का बेहतर तरीका क्या है. यहाँ तक कि मैंने एक टाँग के सहारे खेलने की भी कोशिश की ताकि समझ सकूँ. फिर मैंने अपने स्टाफ़ के साथ मिलकर मानसी के लिए एक स्पेशल ट्रेनिंग मॉड्यूल बनाया."
चुनौतियाँ कई हैं लेकिन भारत की विकलांग महिला खिलाड़ियों ने साबित कर दिया है कि अगर उन्हें सही मौका और सही सुविधाएँ मिलें तो वो किसी से कम नहीं.
दीपा मलिक पैरालंपिक कमेटी ऑफ़ इंडिया की अध्यक्ष हैं और पैरालंपिक में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी भी. उन्होंने 2016 में रजत जीता था.
2021 आते-आते, महिला खिलाड़ियों ने इसे गोल्ड में बदल दिया है.
भाविना हसमुखभाई पटेल- टेबल टेनिस में पदक लाने वाली पहली भारतीय
34 साल की भाविना हसमुखभाई पटेल टोक्यो पैरालिंपिक्स में टेबल टेनिस में पदक जीतने वाली पहली भारतीय बनीं.
उनके कोच लल्लनभाई दोशी कहते हैं कि ये बात ग़ौर करने लायक और काबिले तारीफ़ है कि भाविना 13 साल से टेनिस खेल रही हैं और इस दौरान वो नौकरी भी करती रहीं और शादी के बाद अपना घर भी संभाला.
विकलांग खिलाड़ियों को लेकर नकारात्मक सोच बनी हुई है लेकिन साथ ही बदलाव की आहट भी दिखाई और सुनाई देती है.
व्हीलचेयर पर बैठकर खेलने वाली भाविना को अपने पति और पिता दोनों का पूरा साथ मिला.
रूबीना- वर्ल्ड कप में गोल्ड जीतने वाली पैराशूटर
21 साल की रूबिना की कहानी भी कुछ अलग नहीं है. रूबीना के पिता जबलपुर में मैकेनिक हैं और माँ नर्स.
पिछले साल पेरू में रूबिना ने पैरा शूटिंग वर्ल्ड कप में गोल्ड मेडल जीता.
रूबीना बताती हैं, "पैसों की कमी और जागरूकता की कमी की वजह से बचपन में मेरा इलाज नहीं हो सका. इस वजह से मैं हमेशा के लिए विकलांग हो गई. हमारी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है लेकिन मेरे माता-पिता मुझे राजकुमारी की तरह रखते हैं. पैरा शूटिंग में आगे बढ़ने का मेरा सपना उनके लिए सब कुछ है. शूटिंग ने मेरी ज़िंदगी बदल दी है."
जितनी भी विकलांग महिला खिलाड़ियों से मैंने बात की, उनमें से ज़्यादातर ये मानती हैं कि पैरा-स्पोर्ट ने उनकी ज़िंदगी बदल दी.
बकौल सिमरन, "दरअसल पैरा-स्पोर्ट ने मेरी जान बचाई है, मुझे बचाया है, मुझे एक नई पहचान दी है. एक विकलांग व्यक्ति और एक महिला होते हुए इस खेल ने मुझे इस पुरुष प्रधान समाज में सम्मान दिलाया है."
पिछले साल टोक्यो पैरालंपिक में महिला खिलाड़ियों की संख्या पुरुषों के मुक़ाबले काफ़ी कम थी. लेकिन अवनि लेखरा इसमें भी नई उम्मीद देखती हैं.
वे कहती हैं, "एक महिला खिलाड़ी होना थोड़ा मुश्किल तो है. सुरक्षा के लिहाज़ से परिवार लड़कियों को अकेले नहीं जाने देता. इससे खर्चा भी बढ़ जाता है. इसलिए महिला खिलाड़ियों को कम मौके मिलते हैं. लेकिन जितने भी मौके उन्हें मिल रहे हैं, भारतीय महिला खिलाड़ी बहुत अच्छा कर रही हैं, इसमें विकलांग खिलाड़ी भी शामिल हैं."
"आप देखना, आने वाले दिनों में पुरुष और महिला खिलाड़ी समान मेडल जीतकर आएँगे. अभी रास्ता लंबा है लेकिन हम सही रास्ते पर हैं."
अवनि की ये बातें मन में प्यारी-सी उम्मीद जगाती हैं.
जैसे पलक कहती हैं, "चाहे पूरी दुनिया आपसे कहे कि आप अपने सपने हासिल नहीं कर सकते हैं क्योंकि आप महिला हैं या आप विकलांग हैं, लेकिन आप अपने आप से हमेशा यही कहो कि दुनिया में सब कुछ मुमकिन है. अगर मैं कर सकती हूँ तो आप भी कर सकते हो."
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