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BBC ISWOTY- जमुना बोरो: जब रिश्तेदारों ने कहा मुक्केबाज़ी से शक्ल बिगड़ जाएगी और शादी नहीं होगी
मौजूदा विश्व नंबर पांच और महिलाओं की 54 किलोग्राम वर्ग में भारत की नंबर एक मुक्केबाज़ जमुना बोरो ने एक लंबा सफ़र तय किया है.
असम के छोटे से कस्बे ढेकियाजुली के पास बेलसिरी गाँव में पलीं-बढ़ीं बोरो बचपन से ही बहुत जिज्ञासु थी. एक दिन जब वो स्कूल से लौट रही थीं, तो खेलते हुए कुछ युवाओं पर उनकी नज़र पड़ी. उन्होंने तुरंत वुशु नाम के उस खेल में हाथ आज़माने का फ़ैसला किया.
लेकिन शुरुआती दिनों में, उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन किसी खेल में वो देश का प्रतिनिधित्व करेंगी. वुशु ने उन्हें आगे की राह दिखाई.
लेकिन कुछ समय के बाद उन्होंने मुक्केबाज़ी में कदम रखा, क्योंकि इस खेल में आगे बढ़ने की संभावनाएं अधिक थीं.
रिंग के बाहर की लड़ाई
छोटी जगह से आने के कई नुकसान होते हैं, खासकर संसाधनों के मामले में, बोरो के शुरुआती साल बिना औपचारिक कोचिंग के चले.
जिन्हें ये खेल पसंद था, वो बिना किसी पेशेवर मार्गदर्शन के अभ्यास करते थे. छोटी सी बोरो का संपर्क भी उन्हीं से हुआ.
व्यक्तिगत मोर्चे पर बोरो को कई लड़ाइयां लड़नी पड़ीं. छोटी उम्र में ही उन्होंने अपने पिता को खो दिया, मां को अपने बच्चों को पालने के लिए अकेले ही खेती करनी पड़ी, उन्होंने चाय और सब्ज़ियां बेचीं.
सुविधाओं की कमी एकमात्र चुनौती नहीं थी, रिंग के बाहर अलग-अलग मोर्चों पर भी लड़ना था ताकि खेल को जारी रखा जा सका. रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने उन्हें खेल से दूर करने की कोशिश की, तर्क दिया कि ये खेल महिलाओं के लिए नहीं हैं, क्योंकि एक चोट पूरा चेहरा बिगाड़ सकती है जिसके कारण शादी में दिक्कतें आ सकती हैं.
बोरो भाग्यशाली थीं कि परिवार उनके साथ खड़ा रहा, लगातार प्रैक्टिक करने के लिए प्रेरित करता रहा और आत्मविश्वास की कभी कमी नहीं होने दी.
सफलता का सफ़र
बोरो की प्रतिभा, परिश्रम और परिवार के सहयोग की मदद से बोरो ने 2010 में तमिलनाडु में सब जूनियर महिला बॉक्सिंग चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीता. ये उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण था.
राष्ट्रीय स्तर पर एक्सपोज़र का मतलब था बेहतर कोचिंग और मुश्किल गेम के लिए खेल में सुधार. इसके बाद कई स्पर्धाओं के दरवाज़े खुले और बोरो राष्ट्रीय शिविर तक पहुंचीं.
2015 में उन्होंने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की. उन्होंने ताइपे में विश्व युवा मुक्केबाज़ी चैम्पियनशिप में कांस्य पदक जीता. इस जीत ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव से निपटने के लिए तैयार किया.
54 किलो वर्ग श्रेणी में 2018 में बोरो ने 56वें बेलग्रेड इंटरनेशनल बॉक्सिंग चैंपियनशिप में रजत पदक जीता. एक साल बाद उन्होंने रूस में एआईबीए महिला विश्व मुक्केबाज़ी चैंपियनशिप में कांस्य पदक हासिल किया.
एक साधारण पृष्ठभूमि से अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज़ी के क्षेत्र तक की यात्रा ने उन्हें बहुत सम्मान दिलाया, ख़ासतौर पर उन्हें गृह राज्य असम में.
2019 में उन्हें राज्य के प्रमुख मीडिया समूह सैदिन-प्रतिदिन ने खेल में उत्कृष्टता के लिए अचीवर अवॉर्ड से नवाज़ा.
बोरो का सपना ओलंपिक पदक जीतने का है. वो कहती हैं कि जो लोग सोचते हैं कि महिलाएं खेल के लिए नहीं बनीं, उन्हें अपनी मानसिकता बदलने की ज़रूरत है.
अपने अनुभव के आधार पर बोरो कहती हैं कि देश के ग्रामीण और दूरदराज़ के इलाकों में सुविधाओं की कमी है लेकिन प्रतिभा की नहीं. उनके मुताबिक खेल से जुड़े विभागों को ऐसी जगहों पर स्काउट भेजकर टैलेंट की पहचान करनी चाहिए.
(यह लेख बीबीसी को ईमेल के ज़रिए जमुना बोरो के भेजे जवाबों पर आधारित है.)
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