बिशन सिंह बेदी 'द सरदार ऑफ़ स्पिन'

    • Author, आदेश कुमार गुप्त
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

गो हाथ को जुम्बि़श नहीं आँखों में तो दम है

रहने दो अभी साग़रो-मीना मेरे आगे

उन के देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक़

वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

बीते शुक्रवार की शाम को जब दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में परामर्श संपादक पूर्व क्रिकेटर वेंकट सुंदरम और लेखक सचिन बजाज की संपादित पुस्तक ''बिशन सिंह बेदी, द सरदार ऑफ़ स्पिन'' का जिस अंदाज़ में विमोचन हुआ, तो मिर्ज़ा ग़ालिब के ये शेर ज़ेहन में अचानक तैर गए.

25 सितंबर 1946 को पंजाब के अमृतसर शहर में जन्मे भारत के पूर्व कप्तान, कोच, चयनकर्ता और हवा में लहराती और दिशा बदलती अपनी चतुराई भरी फ़्लाइटेड गेंदों के दम पर 67 टेस्ट मैच में 266 विकेट अपने नाम करने वाले बिशन सिंह बेदी ने अपने जीवन के 75 बसंत पूरे किए हैं.

ज़ाहिर है चर्चा तो उनकी गेंदबाज़ी की होनी चाहिए थी लेकिन बीती शाम तो उनकी मयकशी और आशिक़ मिज़ाजी के क़िस्सों में बीती. बीच-बीच में उनके खेल की बातें भी होती रहीं.

कभी अपनी गेंदों की विविधता के दम पर दुनिया भर के दिग्गज और सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ों के क़दमों की लय बिगाड़ने वाले बिशन सिंह बेदी अपनी स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण जब व्हीलचेयर पर बैठकर अपने परिवार के सदस्यों, पूर्व खिलाड़ियों, दोस्तों, पड़ोसियों, संबंधियों, खेल पत्रकारों और अन्य लोगों के साथ खचाखच भरे हॉल में पहुँचें तो तालियों की गड़गड़ाहट से समां गूंज उठा.

हॉल में बिशन सिंह बेदी की पत्नी, सुपुत्री नेहा, पुत्र अंगद बेदी, पूर्व क्रिकेटर मदन लाल, अंशुमान गायकवाड़, कीर्ति आज़ाद, गुरशरण सिंह, वेंकटसुंदरम, विनय लाम्बा और वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार-लेखक राजदीप सरदेसाई जैसी हस्तियाँ भी मौजूद थीं.

बेदी की, बतौर क्रिकेटर, सुनहरी यादें

बिशन सिंह बेदी के खेल और व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी बातों को सबसे साझा करने के लिए एक मंच बना था जिसका संचालन भारत के पूर्व क्रिकेटर दिलीप सरदेसाई के पुत्र राजदीप सरदेसाई और बिशन सिंह बेदी के पुत्र अंगद बेदी कर रहे थे.

उनका साथ अंशुमान गायकवाड़ ने दिया.

राजदीप सरदेसाई ने अपने एक अनुभव से कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कहा कि कई साल पहले एक आपसी मैच में जब वह बिशन सिंह बेदी का सामना करने मैदान में उतरे तो उनके पहले ही ओवर में दो तीन गेंदों का सामना करने के बाद जब वो एक शॉट खेलने के लिएह कुछ कदम आगे बढ़े तो गेंद उनका स्टंप ले उड़ी.

बाद में बिशन सिंह बेदी ने कहा कि अभी भी लैफ्ट हैंड यानी उलटा हाथ चलता है.

इसके बाद राजदीप सरदेसाई ने व्यक्तिगत बातचीत में कहा कि बेदी साहब की यादें तो बचपन से जुड़ी हुई हैं क्योंकि जब वह क्रिकेट के शौक़ीन थे तब बेदी जी भारत के कप्तान थे.

जब राजदीप सरदेसाई की गिल्लियां बिखेरीं...

वह पिता के साथ खेले तो उसकी भी यादें हैं. उन्होंने क्रिकेट के मैदान के बाहर भी बहुत कुछ किया है और हमेशा सच बोलने की कोशिश की है, ख़ासकर बीसीसीआई जैसी ताक़तवर संस्था को लेकर.

उन्होंने दिखाया है कि क्रिकेटर केवल मैदान के भीतर ही नहीं है बल्कि उसकी आवाज़ बाहर भी है.

बिशन सिंह बेदी से जुड़ी यादों को लेकर पूर्व चयनकर्ता और क्रिकेटर आकाश लाल ने कहा कि जब साल 1969 में ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच दिल्ली के फिरोज़शाह कोटला मैदान में तीसरा टेस्ट मैच खेला जा रहा था और ऑस्ट्रेलिया की दूसरी में डग वॉल्टर्स को बेदी ने जिस तरह आउट किया उस वह भूलते नहीं है.

उन्होंने कहा कि डग वॉल्टर्स ने बेदी की हवा में धीमे रूप से लूप बनाती हुई लगातार चार गेंदों को रक्षात्मक रूप से खेला. अगली गेंद को जैसे ही बेदी ने क्रीज़ के कोने से करने की कोशिश की तो उनके मुंह से निकला, अब वॉल्टर्स गया. वह बेदी की तेज़ आर्म बॉल थी जिस पर वॉल्टर्स ने स्कॉयर कट करने की कोशिश की लेकिन उनका ऑफ़ स्टंप उखड़ गया, बोल्ड हो गए.

आकाश लाल ने कहा कि वह कभी भी उस क्षण को भूल नहीं सकते और न ही उस गेंदबाज़ी एक्शन को.

अभी तो मैं जवान हूँ…

बिशन निर्विवाद रूप से सर्वश्रेष्ठ थे लेकिन वह भारतीय क्रिकेट के ऐसे खिलाड़ी भी रहे जिन्हें कभी भी सही रूप से समझा नहीं गया. विजय हज़ारे भी ऐसे ही थे और दोनों ने अपने बारे में कभी कुछ नहीं कहा. हमने बेदी के बारे में जानने की बहुत कोशिश की लेकिन वह कुछ नहीं बोले जो उनकी महानता है. उन जैसी योग्यताएँ क्रिकेटरों में कम पाई जाती है. वह हमेशा न्याय के पक्ष में खड़े रहते हैं. वह कभी भी ग़लत आदमी का साथ नहीं देते. उन्होंने हमेशा क्रिकेट की बेहतरी के लिए काम किया है क्योंकि वह क्रिकेट से प्यार करते हैं.

अभी ऐसी बातों का सिलसिला चल ही रहा था कि जब बेदी कभी युवावस्था में दिल्ली के पंचशील इलाक़े में रहते थे तब के दिनों की यादें बताते हुए उनके पड़ोस में रहने वाली एक महिला ने कहा कि बेदी उन्हें अपनी मां जैसा समझते थे. बेदी को उनके हाथ की बनी अंडे की भुर्जी बहुत पसंद थी.

उन महिला ने कहा कि पहले उनकी आवाज़ बहुत अच्छी थी और अगर वह ठीक होती तो बिशन के लिए अपना पसंदीदा मलिका पुखराज का गाना सुनाती- अभी तो मैं जवान हूँ. एक पल के लिए माहौल में हंसी गूंजी और मंच संचालन कर रहे राजदीप सरदेसाई ने कहा कि आप अभी भी जवान ही हैं, और आप गाना नहीं तो एक दो ही लाइन सुना दो.

इसके बाद उन महिला ने पूरा गाना सुनाया- अभी तो मैं जवान हूँ, अभी तो मैं जवान हूँ... ज़ाहिर है जमकर तालियाँ तो बजनी ही थीं.

"अंग्रेज़ी समझ में नहीं आई"

बिशन सिंह बेदी से जुड़े क़िस्से सुनाते हुए पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आज़ाद ने कहा कि हालांकि वह दिल्ली के मॉर्डन स्कूल बाराखम्बा रोड और उसके बाद सेंट स्टीफ़न्स कॉलेज से पढ़े हैं लेकिन उन्हें कभी भी बिशन जी की अंग्रेज़ी समझ में नहीं आई, वह उसके बेहद शानदार जानकार है. उन्हें तो बस बिशन के शुरुआत और अंत के दो शब्द समझ में आते थे.

कीर्ति आज़ाद ने आगे कहा कि बिशन उनके कप्तान रहे और हर मैच में लंच से पहले हरे, फिर नीले-पीले पटके बदलकर खेलने के लिए भी मशहूर रहे. लेकिन यह हर कोई नहीं जानता कि वह महिलाओं में भी बड़े लोकप्रिय रहे हैं चाहे वह सोलह साल की हो या साठ साल की. मैदान के बाहर वह उन्हीं से घिरे रहते.

कीर्ति आज़ाद की बेबाक़ी से ख़ुश होकर राजदीप सरदेसाई ने पूर्व क्रिकेटर मदन लाल से कहा कि आप भी बेदी साहब की कुछ अनसेंसर्ड स्टोरी यानी बिना सेंसर किए हुए कुछ राज़ खोलिए तो मदन लाल थोड़ा शर्मा गए. बोले, अनसेंनसर्ड स्टोरी हैं तो उसे यहां थोड़े ही बता सकते हैं. फ़िर मदन लाल अंग्रेज़ी में बोले बिशन वाज़ माई कैप्टन, आई हैव ग्रेट रिस्पेक्ट फ़ॉर हिम सो आई डोंट टेल सीक्रेट स्टोरी. अब मैं हिंदी में बोलूँगा नहीं तो सब मेरी अंग्रेज़ी पकड़ लेंगे, मदन आगे बोले, हम दोनों एक ही शहर अमृतसर से नाता रखते हैं और हमारे उस्ताद भी एक थे स्वर्गीय ज्ञान प्रकाश जी. उन्होंने सिखाया कि विनम्र कैसे रहना है.

पाकिस्तान का वो वाक़िया

ऐसे ही हल्के फुल्के माहौल को नशीला बनाते हुए राजदीप सरदेसाई ने कहा कि बिशन और ड्रिंक्स यानी पीने को लेकर बहुत सी कहानियाँ मशहूर है. कुछ साल पहले जब वह पाकिस्तान गए तो उन्होंने देखा कि दिल्ली के एयरपोर्ट पर बेदी ड्यूटी फ़्री शॉप पर एक रम की और तीन दूसरी बोतलें ख़रीद रहे हैं. यह साल 1978 की बात है जब वह कप्तान थे.

राजदीप ने कहा कि पाकिस्तान में कस्टम में देख ली जाएंगी. इस पर बेदी बोले चिंता मत करो कुछ नहीं होगा. और जब वह पाकिस्तान पहुँचे तो देखा कि कस्टम पर दो लाइनें लग गई. एक बिशन सिंह बेदी के लिए और दूसरी बाकी सब के लिए. सबने देखा कि बेदी साहब रम और दूसरी बोतलों के साथ आराम से निकल गए. इनके पाकिस्तान में बहुत दोस्त हैं, नवजोत सिंह सिद्धू से भी ज़्यादा.

वो मैच जब 97 पर पांच विकेट गिरने पर पारी घोषित कर दी थी

बिशन सिंह बेदी को लेकर भारत के पूर्व बल्लेबाज़ और कोच रहे अंशुमान गायकवाड़ ने कहा कि उन्होंने सभी खिलाड़ियों को एक समान समझा चाहे वह सुनील गावस्कर हों या मदन लाल या फिर कोई और जैसे युवा करसन घावरी. बेदी ने हमेशा युवाओं को प्रोत्साहित किया. उनमें बहुत अधिक आत्मसम्मान है. वह वही करते हैं, जो कहते हैं और वही कहते हैं, जो करते हैं. बिशन बिल्कुल अलग हैं इसीलिए वह यहां आए हैं.

बाद में गायकवाड़ ने बताया कि उन जैसा कप्तान उन्होंने नहीं देखा. वह बहुत मानवीय रहे और अपने बारे में कभी ज़्यादा नहीं सोचते थे, इसीलिए वह बड़ोदा से किताब विमोचन के लिए आए.

साल 1975-76 के वेस्टइंडीज़ दौरे में जब जमैका में एक के बाद एक भारतीय खिलाड़ी लहूलुहान हो रहे थे तब बिशन सिंह बेदी ने दूसरी पारी पाँच विकेट पर 97 रन पर घोषित कर दी और भारत हार गया. गायकवाड़ चोटिल होने के कारण ख़ुद बल्लेबाज़ी करने नहीं उतरे. बेदी के उस निर्णय को लेकर अंशुमान गायकवाड़ ने कहा कि तब तो अलग परिस्थिति थी, और वेस्टइंडीज़ के गेंदबाज़ जैसी गेंदबाज़ी कर रहे थे उसमें जीतने हारने का तो सवाल ही नहीं था. जब उन जैसे बल्लेबाज़ को चोट लग गई तो गेंदबाज़ कैसे बचते? बिशन पाजी ने जो किया सही किया वर्ना चंद्रशेखर और वेंकट राघवन जाकर क्या करते?

क्लब क्लास टू वर्ल्ड क्लास

बिशन सिंह बेदी को लेकर खेल पत्रकार जी राजारमन ने बताया कि उनके बारे में नई चीज़ कहना मुश्किल है. उनका दिल बहुत बड़ा है. वह अपने हिसाब से सबको सिखाते हैं, खिलाड़ी तो महान रहे ही हैं. बेहद पढ़े लिखे हैं. उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता. 266 विकेट से उन्हें मापना सही नहीं होगा. भारत के कप्तान, कोच और चयनकर्ता भी रहे. भारत में आई न्यूज़ीलैंड टीम के डेनियल विटोरी को सिखाकर बताया कि भारत के नहीं बल्कि विश्व के गुरु हैं.

उन्होंने कहा, गावस्कर के आख़िरी टेस्ट मैच में पाकिस्तान के तौसीफ अहमद और इक़बाल क़ासिम को बताया कि जब पिच में बहुत कुछ है तो गेंद को बस सीधी रखो. लोगों ने भारत की हार के बाद इनके ख़िलाफ़ ख़ूब लिखा लेकिन यह नहीं बदले.

क्रिकेट समीक्षक प्रदीप मैगज़ीन ने कहा कि इस समारोह में सबने देखा कि कैसे क्रिकेटर और दूसरों ने उनके खेल के अलावा उनकी दूसरी कमाल की कहानी सुनाई. यह बताता है कि एक कप्तान, कोच के अलावा चयनकर्ता के रूप में उनका कितना योगदान रहा और उन्होंने हमेशा क्रिकेट के लिए आवाज़ उठाई. उन्होंने किसी की परवाह किए बिना अपनी बात कही चाहे वह बीसीसीआई, पदाधिकारी या सरकार के ख़िलाफ़ ही क्यों न हो. उनकी कोचिंग में जब पंजाब चैंपियन बनी तो उन्होंने एक ही बात खिलाड़ियों को समझाई थी कि मैदान में अंपायर चाहे ग़लत फ़ैसला दे लेकिन उनके ख़िलाफ़ अपील नहीं करनी है.

बिशन सिंह बेदी ''सरदार ऑफ़ स्पिन'' किताब के परामर्श संपादक और दिल्ली के पूर्व क्रिकेटर वेंकट सुंदरम ने बताया कि वह पिछले पचपन साल से बिशन सिंह बेदी को जानते हैं और यह उनका 75वां जन्मदिन है तो हमने सोचा उनके लिए कुछ विशेष करें. हम लिखते तो शायद चार पांच किताबें हो जातीं, इतना अधिक हमारे पास जानकारी है. फ़िर सोचा यह मौक़ा उन्हें दो जो बिशन सिंह बेदी के साथ भारत और विदेश में खेले हैं, उनसे लेख लिखवाए ताकि अलग विचार और नज़रिया मिले. इसमें भारत के छह और विदेशों के तीन कप्तानों ने लेख लिखे हैं बाकी अलग हैं. इस किताब में क़िस्से ही क़िस्से हैं. वेंकट सुंदरम् ने इस किताब में एक लेख लिखा है क्लब क्लास टू वर्ल्ड क्लास.

वेंकट कहते हैं कि वह तो दिल्ली के क्लब क्रिकेटर थे, बेदी ने प्रोत्साहित किया. जब वह खेले तो शुरू में कुछ नहीं थे लेकिन अगले दस साल में दिल्ली के पास सारे ख़िताब थे.

अंत में इसी समारोह में बिशन सिंह बेदी के किसी वकील दोस्त ने सलाह दी कि अंगद बेदी अपनी दाढ़ी मूँछ बढ़ाकर बेदी पर फ़िल्म बनाए और खुद बिशन का रोल करें. इस पर संचालन कर रहे राजदीप सरदेसाई ने चुटकी लेते हुए कहा कि अंगद तो हीरो बन जाएगा लेकिन एक हिरोइन से काम थोड़े ही चलेगा, बेदी साहब की तो न जाने कितनी हिरोइनें हैं.

किस कदर लोकप्रिय थे बेदी

वैसे बिशन सिंह बेदी मीडिया में कितने लोकप्रिय रहे हैं इसका जीता जागता उदाहरण मैंने स्वयं देखा है जब वह दिल्ली के कोच थे. दिल्ली में एक रणजी ट्रॉफ़ी मुक़ाबले के पहले ही दिन लगातार धीमे धीमे बारिश होती रही. दिन में एक बजे तक मैदान बहुत गीला हो चुका था सो खेल होना मुमकिन नहीं था लेकिन बेदी साहब ने सभी खिलाड़ियों को मैदान में उतारा और किसी को मैदान के चक्कर लगाने को कहा, किसी को बैटिंग और किसी को गेंदबाज़ी और किसी को कैच के अभ्यास में जोड़ा.

बीच बीच में वह बाउंड्री लाइन के पास रखी कुर्सी पर बैठकर पानी पीते. मैंने कई बार उनसे बात करने की कोशिश की लेकिन हर बार उन्होंने हंसकर टाल दिया, लेकिन मैंने देखा कि वह टीवी चैनल की पत्रकारों से लगातार बात करते रहे.

जब शाम के क़रीब पाँच बज गए तो मुझसे रहा नहीं गया और मैंने हंसते हुए कहा कि बेदी साहब अगर मैं भी लड़की होता तो क्या आप तभी मुझे इंटरव्यू देते. जवाब में बेदी साहब ने भी हँसते हुए कहा जल्दी पूछो जो पूछना है. कमाल की बात है तब किसी ने दिल्ली के सहवाग या दूसरे खिलाड़ियों से बात करने की कोशिश भी नहीं की, यह था बेदी साहब का जलवा.

कभी स्पिन तिकड़ी के नाम मशहूर बेदी, चंद्रा, प्रसन्ना की महत्वपूर्ण कड़ी भागवत चंद्रशेखर किताब में लिखते हैं कि उन्होंने बेदी के साथ मिलकर 42 टेस्ट मैच खेले. वह अक्सर बेदी के साथ एक ही कमरे में ठहरे. चंद्रा के पास मुकेश और बेदी के पास पंजाबी उर्दू और हिंदी के कैसेट होते.

इसी तिकड़ी की तीसरी कड़ी इरापल्ली प्रसन्ना लिखते हैं कि स्पिन गेंदबाज़ी की कला में बेदी जीनियस हैं.

वहीं पूर्व विकेटकीपर बल्लेबाज़ फारूख इंजीनियर ने लिखा, ''पाजी की गेंदबाज़ी पर कीपिंग करना महान वीनू मांकड को कीपिंग करने जैसा महान अनुभव था. उनका आसान गेंदबाज़ी एक्शन ऐसा था जैसे लय में कविता पढ़ी जा रही हो. वह कभी भी बैटर से घबराते नहीं थे. वह उसका दिमाग़ पढ़ लेते थे. उनकी ऑर्मर तेज़ होती थी और लाइन-लेंथ में विविधता. उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती और वह जहां भी खेले बेहद लोकप्रिय हुए.

इत्तेफ़ाक़ से केवल छह साल की उम्र में ही इंजीनियर को वीनू मांकड की गेंदों पर विकेटकीपिंग का मौक़ा मिला था.

बेदी पर क्या बोले कपिल, गावस्कर?

पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर ने लिखा है कि जब तक वसीम अकरम परिदृश्य में सामने नहीं आए थे तब तब बेदी सर्वश्रेष्ठ खब्बू गेंदबाज़ थे. गावस्कर इसे अपने लिए सबसे बड़ा सम्मान मानते हैं कि साल 1971 के वेस्टइंडीज़ दौरे में त्रिनिडाड में खेले गए आख़िरी टेस्ट मैच के दौरान बेदी को पहली बार पिता बनने का सौभाग्य मिला तो उन्होंने बच्चे का नाम गावस इन्द्र सिंह रखा.

पूर्व कप्तान कपिल देव लिखते हैं कि उनकी शुरुआती यादों में बिशन खुले बटन और खड़े कॉलर वाली क़मीज़ पहने गेंदबाज़ी करते दिखते हैं. बेदी कपिल के पहले कप्तान और मैनेजर भी रहे जब टीम ने साल 1990 में न्यूज़ीलैंड और इंग्लैंड का दौरा किया.

बेदी से दिन रात कभी भी क्रिकेट की बात की जा सकती है. उन्होंने साल 1976 में वेस्लीन कांड में लीन इंग्लैंड के तेज़ गेंदबाज़ जॉन लीवर के ख़िलाफ़ अकेले दम पर लड़ाई लड़ी. बेदी को यह क़तई स्वीकार नहीं था कि कोई गेंदबाज़ विकेट लेने के लिए ग़लत तरीक़ों का इस्तेमाल करे.

कपिल लिखते हैं कि साल 1983 की विश्व कप विजेता टीम के चयनकर्ताओ में से एक बेदी थे और जब उसके एक साल बाद इंग्लैंड के ख़िलाफ़ दिल्ली में हारने के बाद उन्हें टीम से बाहर किया गया तब भी बेदी ही चयनकर्ताओ में से एक थे. वह अपने टेस्ट करियर में तभी केवल एक बार बाहर हुए और इसके लिए वह ख़ुद को ज़िम्मेवार मानते हैं.

कपिल लिखते हैं ''बिशन पाजी कुछ स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं लेकिन वह अपने जोश के दम पर खेल के दिनों जैसी ही वापसी करेंगे. उन्होंने राजा की तरह ज़िंदगी जी है और हम सब उन्हें ऐसे ही लगातार देखना चाहते हैं- आज भी.''

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