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भारतीय हॉकी टीम मानसिक मज़बूती से जीती है: पूर्व गोल्ड विजेता कप्तान भास्करन
- Author, विष्णुप्रिया
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत की हॉकी टीम ने 41 साल बाद ओलंपिक में पदक हासिल किया है. भारत के पूर्व कप्तान वासुदेवन भास्करन कहते हैं कि पूर्व हॉकी खिलाड़ी और कोच के तौर पर वे यही कहेंगे कि इंतज़ार लंबा था.
एक समय भारत की हॉकी टीम चैम्पियन थी. भारत ने 1928 से लेकर 1956 तक लगातार 6 गोल्ड मेडल जीते थे. अब तक भारत की हॉकी टीम ने आठ स्वर्ण पदक, एक रजत और तीन कांस्य पदक जीते हैं.
लेकिन ये चैम्पियन टीम 2008 में ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई तक नहीं कर पाई थी. भारत की हॉकी टीम ने अपना आख़िरी मेडल 1980 के मॉस्को ओलंपिक में जीता था. वासुदेव भास्करन 1980 में गोल्ड जीतने वाली भारतीय टीम के कप्तान थे.
अब 41 साल के इंतज़ार के बाद भारत ने फिर ऐतिहासिक जीत हासिल की है और ओलंपिक में कांस्य पदक जीता है. मॉस्को ओलंपिक में गोल्ड जीतने वाली टीम को अब कांस्य से संतोष करना पड़ा है. लेकिन हाल के प्रदर्शन को देखते हुए भारत में इसे भी बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है.
41 साल के लंबे इंतज़ार के बाद भारत के गोल्ड जीतने पर भास्करन कहते हैं, 'भारतीय टीम की मानसिक शक्ति को इस ऐतिहासिक उपलब्धि का श्रेय दिया जा रहा है. साल 2012 और 2016 की भारत की हॉकी ओलंपिक टीमें भी शानदार थीं लेकिन मौजूदा टीम उनसे अलग है. ये टीम कोविड महामारी से प्रभावित रही है. कई सदस्य लंबे समय से अपने परिवार से दूर थे. कोई और टीम क़रीब एक साल से बबल में नहीं थी. इस टीम की मानसिक ताक़त कमाल है."
वो कहते हैं, 'भारतीय हॉकी टीम ने इस साल ओलंपिक के अपने सभी मैचों में शानदार खेल दिखाया है. गुरुवार को हुए मैच में भी एक समय भारत की टीम 1-3 से पिछड़ रही थी लेकिन भारतीय टीम ने जल्दी-जल्दी दो गोल करके स्कोर बराबर कर लिया. यही मैच का टर्निंग प्वाइंट भी रहा. हॉकी का खेल ऐसा ही होता है. पहले हॉफ़ में जर्मनी की टीम ने भारत पर ख़ूब दबान बनाया लेकिन भारतीय टीम इससे उबर गई और शानदार खेल दिखाया."
गुरुवार की जीत को ऐतिहासिक बताते हुए भास्करन कहते हैं, "भारतीय टीम के प्रत्येक खिलाड़ी ने बेहतरीन प्रदर्शन किया. डिफ़ेंस से लेकर गोल कीपर तक सबने. इस टीम में 10 ऐसे खिलाड़ी हैं जो पहली बार ओलंपिक खेल रहे हैं. इन सभी ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिया. यही भारत की जीत की असल वजह है."
एक समय भारत चैम्पियन था. लेकिन फिर भारतीय टीम की इतनी दुर्गति क्यों हुई? ऐस क्या हुआ? इस सवाल पर भास्करन कहते हैं, "ओलंपिक जैसे बड़े खेल आयोजन में हर टीम को हमेशा मौक़ा नहीं मिलता है. आपको जब भी संभव हो, मौक़े को गोल में बदलना होता है. क्योंकि ओलंपिक में मौक़ा चार साल में एक बार ही आता है."
'खिलाड़ियों को तराशने की आवश्यकता'
वो कहते हैं अगर मौजूदा टीम से तुलना की जाए, तो 2016 की टीम इससे भी बेहतरीन थी लेकिन वो क्वार्टर फ़ाइनल के मुक़ाबले में जर्मनी के ख़िलाफ़ अंतिम चार मिनटों में बेहतरीन खेल नहीं दिखा पाई थी और पदक नहीं जीत पाई. एक वजह ये भी है कि 2012 के बाद से ही लगातार कोच बदले जा रहे हैं. इसी वजह से टीम ने अपनी निरंतरता भी खो दी थी.
भास्करन कहते हैं, "अगर कोई एक खिलाड़ी एक मैच में ख़राब खेलता है तो हमें उसे तुरंत नहीं हटाना चाहिए. हमें खिलाड़ी की क़ाबिलियत का विश्लेषण करके उसमें चैम्पियन तराशना चाहिए. मौजूदा कोच ग्राहम रीड ने यही किया है."
क्या इस जीत से भारतीय हॉकी का भविष्य सँवर जाएगा, इस सवाल पर भास्करन कहते हैं, "हाँ ज़ाहिर तौर पर. सिर्फ इस जीत का ही नहीं बल्कि ओलंपिक में भारत की हर जीत का, सिंधू, चानू और दूसरे सभी खिलाड़ियों की उपलब्धि का डिजिटल वीडियो बनाकर भारत के बच्चे-बच्चे तक पहुँचाना चाहिए."
वो कहते हैं, "इन वीडियो के ज़रिए हमें ओलंपिक के बारे में जागरूकता फैलानी चाहिए ताकि बच्चे ओलंपिक में खेलने के लिए प्रेरित हों. क्योंकि भारत के हर खिलाड़ी की एक प्रेरणादायक कहानी है. हमें ये कहानियाँ स्कूलों-कॉलेजों के अपने छात्रों को सुनानी चाहिए. 1983 के क्रिकेट विश्व कप की जीत के बाद से केवल भारत में क्रिकेट ही लोकप्रिय हुआ है. इसी तरह हमें भारत में हॉकी को भी लोकप्रिय करना है."
"भारत में अगर खिलाड़ी हार जाते हैं तो उन पर नकारात्मक टिप्पणियाँ की जाती हैं. हम चार साल तक ये टिप्पणियाँ ही करते हैं, वहीं यूरोपीय देशों में टीमें हार के बाद आगे बढ़ जाती हैं लेकिन हमारे देश में वो हार जाती हैं तो पीछे धकेल दी जाती हैं. जबकि होना ये चाहिए कि हार के बाद हमें कारणों का विश्लेषण करना चाहिए ताकि आगे सुधार हो सके."
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