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ओलंपिक: लवलीना का पदक सेमीफ़ाइनल में ही पक्का, पर सिंधु का क्यों नहीं
भारत की महिला मुक्केबाज़ लवलीना बोरगोहाईं ने क्वार्टर फ़ाइनल में जीत हासिल करके भारत के लिए एक मेडल पक्का कर दिया है. वो सेमी फ़ाइनल में पहुँच गई हैं और ये मुक़ाबला चार अगस्त को होना है.
क्वार्टर फ़ाइनल में लवलीना ने पूर्व वर्ल्ड चैम्पियन चीनी ताइपे की निएन चिन चेन को 4-1 से मात दी.
वहीं भारत की स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु ने भी जापान की अकाने यामागुची को हराकर सेमी फ़ाइनल में जगह बनाई. सिंधु ने सीधे गेम्स में जीत हासिल की.
आपको याद होगा कि रियो ओलंपिक में सिंधु ने सिल्वर जीता था, क्योंकि वे फ़ाइनल में हार गई थीं.
लवलीना के सेमी फ़ाइनल में पहुँचने के साथ ही टोक्यो ओलंपिक में भारत का एक और मेडल पक्का हो गया है. अभी तक टोक्यो ओलंपिक में भारत को सिर्फ़ एक मेडल मिला है.
टोक्यो ओलंपिक में भारत की वेटलिफ़्टर मीराबाई चानू ने रजत पदक जीता है. इसके अलावा अभी तक भारत को कोई सफलता नहीं मिली है.
लेकिन लवलीना का पदक आने वाले दिनों में भारत के खाते में अवश्य जुड़ जाएगा. लवलीना अगर सेमी फ़ाइनल में हार भी जाती हैं, तो भी उन्हें कांस्य अवश्य मिलेगा.
लेकिन ऐसा पीवी सिंधु के साथ क्यों नहीं? सिंधु भी बैडमिंटन मुक़ाबले के सेमी फ़ाइनल में पहुँची हैं, लेकिन उनके लिए पदक का रास्ता अभी दूर है.
आइए आपको समझाते हैं कि लवलीना का पदक क्यों पक्का है और सिंधु का अभी क्यों नहीं?
लवलीना को ये मेडल कैसे मिल रहा है?
भारत की मुक्केबाज़ लवलीना सेमी फ़ाइनल में पहुँच तो गई हैं. लेकिन मुक़ाबले से पहले उन्होंने भारत के लिए मेडल कैसे पक्का कर लिया है. ये सवाल कई लोग पूछ रहे हैं.
दरअसल, बॉक्सिंग में तीसरे स्थान के लिए मैच नहीं होता है. यानी सेमी फ़ाइनल में हारने वाले दोनों खिलाड़ियों को कांस्य पदक दिया जाता है.
इसी कारण लवलीना ने भारत के लिए पदक पक्का कर लिया है. लेकिन बैडमिंटन में ऐसा नहीं होता. यहाँ कांस्य पदक के लिए मैच होता है.
बॉक्सिंग के इसी नियम के आधार पर बीजिंग ओलंपिक में बॉक्सर विजेंदर सिंह ने कांस्य जीता था. लंदन ओलंपिक में मेरी कॉम को भी इसी नियम के आधार पर कांस्य मिला था.
विजेंदर और मेरी कॉम दोनों अपना सेमी फ़ाइनल मैच हार गए थे. फिर भी उन्होंने भारत की झोली में पदक अवश्य डाल दिया.
लेकिन ऐसा नहीं है कि शुरू से ही बॉक्सिंग में ये नियम था.
1948 के ओलंपिक तक बॉक्सिंग में भी तीसरे स्थान के लिए मुक़ाबला होता था और जीतने वाले को कांस्य पदक मिलता था.
लेकिन 1952 के ओलंपिक से नियम बदले और फिर सेमी फ़ाइनल में हारने वाले दोनों खिलाड़ियों को कांस्य पदक दिया जाने लगा.
कुश्ती में रेपेचाज
वैसे तो जूडो, ताइक्वांडो और कुश्ती में भी दो-दो कांस्य पदक दिए जाते हैं. लेकिन यहाँ दो कांस्य पदक का फ़ैसला सेमी फ़ाइनल में हार गए दोनों खिलाड़ियों और दो फ़ाइलनिस्ट खिलाड़ियों से पहले के राउंड्स में हारे खिलाड़ियों के बीच रेपेचाज़ मुक़ाबले के विजेता से होता है.
इसे ही रेपेचाज कहते हैं. यानी रेपेचाज़ मुक़ाबले में वही खिलाड़ी शामिल होते हैं, जिनको हराने वाले फ़ाइनल में पहुँचते हैं.
लेकिन ये बात ध्यान देने की है रेपेचाज प्री क्वॉर्टर फ़ाइनल राउंड से ही लागू होता है, इसके पहले से नहीं.
चलिए इसे रियो ओलंपिक में कांस्य जीतने वाली भारतीय खिलाड़ी साक्षी मलिक के उदाहरण से समझते हैं. साक्षी मलिक रियो ओलंपिक के क्वार्टर फ़ाइनल में रूस की वलेरिया कोब्लोवा से हार गईं थी. लेकिन साक्षी के लिए अच्छी बात ये हुई कि जिस कोब्लोवा से वे हार गईं थी, वो फ़ाइनल में पहुँच गईं.
इसलिए साक्षी को रेपेचाज मुक़ाबले में उतरने का मौक़ा मिल गया. चूँकि साक्षी क्वार्टर फ़ाइनल में हारीं थी, इसलिए उन्हें एक ही रेपेचाज़ मैच खेलने का मौक़ा लिया, जिसे जीतकर वे कांस्य पदक जीत गईं.
दरअसल कुश्ती में रेपेचाज को समझना थोड़ा जटिल है. कुश्ती में रेपेचाज 2008 के बीजिंग ओलंपिक के समय शामिल किया गया था.
इस रेपेचाज मुक़ाबले का फ़ायदा भारत के कई पहलवानों को मिला है. भारत के सुशील कुमार ने बीजिंग ओलंपिक में इसी के तहत कांस्य जीता था.
जबकि योगेश्वर दत्त ने भी लंदन ओलंपिक में रेपेचाज मुक़ाबला जीत तक कांस्य जीता था. जबकि रियो ओलंपिक में साक्षी मलिक ने भी इसी आधार पर जीत हासिल करके कांस्य जीता था.
कॉपी- पंकज प्रियदर्शी
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