टोक्यो ओलंपिक: मनु भाकर समेत पांच युवा निशानेबाज़ क्या भारत को दिला सकते हैं मेडल?

    • Author, आदेश कुमार गुप्त
    • पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

टोक्यो ओलंपिक में भारत को जिन खेलों में पदक का सबसे बड़ा दावेदार माना जा रहा है उसमें निशानेबाज़ी एक है.

भारत ने टोक्यो के लिए निशानेबाज़ी में 15 कोटे हासिल किए हैं. ये अपने आप में एक उपलब्धि है.

भारत के लिए निशाना साधने वाले खिलाड़ियों में अनुभव और युवा जोश का ऐसा मिश्रण है जो इससे पहले कभी देखने को नहीं मिला. भारतीय दल में अधिकतर ऐसे खिलाड़ी हैं जो पहली बार ओलंपिक में हिस्सा लेंगे.

अगर अनुभवी खिलाड़ियों की बात की जाए तो स्कीट में उतरने वाले मेराज अहमद ख़ान 45 साल, राइफ़ल खिलाड़ी तेजस्विनी सावंत 40 साल, संजीव राजपूत 40 साल, अंजुम मोदगिल 27 साल, अपूर्वी चंदेला 28 साल, दीपक कुमार 33 साल, पिस्टल खिलाड़ी अभिषेक वर्मा 31 साल और राही सरनोबत 30 साल की हैं.

युवा खिलाड़ियों की बात की जाए जो पूरे जोश के साथ टोक्यो में शूटिंग रेंज पर उतरकर निशानेबाज़ी की विभिन्न स्पर्धाओं में अपना दमखम दिखाने को तैयार हैं, तो इनमें मनु भाकर, सौरव चौधरी, दिव्यांश सिंह पवार, ऐश्वर्य प्रताप सिंह और यशस्विनी देसवाल शामिल हैं. ये पांच युवा निशानेबाज़ पदक पर निशाना साध सकते हैं.

करिश्माई हैं मनु भाकर

मनु भाकर 19 साल की हैं. वह टोक्यो में 10 मीटर एयर पिस्टल और 25 मीटर एयर पिस्टल के अलावा 10 मीटर पिस्टल के मिश्रित टीम मुक़ाबले में सौरव चौधरी के साथ उतरेंगी.

यूथ ओलंपिक खेल, राष्ट्रमंडल खेल, एशियन शूटिंग चैंपियनशिप और एशियन एयरगन चैंपियनशिप में तो उन्होंने स्वर्ण पदक जीते हैं. फिर निशानेबाज़ी विश्व कप में तो जैसे उनका दबदबा रहा है.

साल 2018 में मनु भाकर तब मीडिया की निगाहों में आईं जब उन्होंने सिडनी में हुए जूनियर विश्व कप में 10 मीटर एयर पिस्टल में व्यक्तिगत और मिश्रित टीम में स्वर्ण पदक जीते. उसी साल उन्होंने जर्मनी में हुए जूनियर विश्व कप में भी एक स्वर्ण और एक रजत पदक जीता. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

जूनियर से सीनियर वर्ग में आते ही उनके निशाने और भी सटीक होते चले गए. उनके खाते में व्यक्तिगत और मिश्रित टीम के कुल मिलाकर सात स्वर्ण और दो रजत पदक हैं.

इसी साल दिल्ली में हुए विश्व कप में मनु भाकर ने मिश्रित टीम स्पर्धा में स्वर्ण और व्यक्तिगत स्पर्धा में रजत पदक जीता. साल 2019 में मनु भाकर ने ताइवान में हुई एशियन एयरगन चैंपियनशिप में 10 मीटर एयर पिस्टल में व्यक्तिगत और मिश्रित टीम में स्वर्ण पदक जीते.

साल 2019 में ही मनु भाकर ने दोहा में हुई एशियन शूटिंग चैंपियनशिप में व्यक्तिगत और मिश्रित टीम में स्वर्ण पदक जीते.

मनु भाकर ने साल 2018 में ब्यूनस आयर्स में हुए यूथ ओलंपिक खेलों में भी हिस्सा लिया और वहां एक स्वर्ण और एक रजत पदक जीता. उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा आईएसएसएफ वर्ल्ड कप फ़ाइनल में भी मनवाया. उन्होंने साल 2019 में चीन में हुई इस चैम्पियनशिप में व्यक्तिगत और मिश्रित टीम में स्वर्ण पदक जीते.

मनु भाकर की अब तक की सबसे बड़ी कामयाबी साल 2018 के गोल्डकोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों में मिला व्यक्तिगत स्पर्धा का स्वर्ण पदक है.

मनु भाकर ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये ढेर सारी कामयाबी बीते तीन-चार साल में ही हासिल की है. मनु भाकर दूसरे निशानेबाज़ों के साथ पिछले ढाई महीने से क्रोएशिया में ट्रेनिंग ले रही हैं. वहीं उन्होंने यूरोपियन चैम्पियनशिप में भी हिस्सा लिया. उन्होंने ओलंपिक के लिए अपनी तैयारी कोच जसपाल राणा के साथ की है.

मनु भाकर की मां सुमेधा भाकर और पिता रामकिशन भाकर को ये श्रेय जाता है कि उन्होंने हर क़दम पर मनु भाकर का हौसला बढ़ाया. वह ख़ुद मानते हैं कि भारत में माता पिता अपने बच्चों को प्रतिभा होते हुए भी आगे नहीं आने देते. रही बात मनु भाकर की तो ओलंपिक को लेकर दो साल पहले से ही उनका मानना था कि जैसी कामयाबी वो हासिल कर रही हैं अगर तैयारी सही रही तो वह पदक जीत सकती हैं.

मनु भाकर उम्मीद के भार को दबाव की जगह प्रेरणा मानती हैं. मनु भाकर का सपना भी टोक्यो में पदक जीतना है. मिश्रित टीम में मनु भाकर का साथ सौरव चौधरी देंगे. ये जोड़ी भारत को विश्व कप में भी कई पदक दिला चुकी है.

सौरव चौधरी दबाव से इंकार नहीं करते

मनु की तरह सौरव चौधरी भी 19 साल के युवा निशानेबाज़ हैं. वह भी छोटी उम्र के बड़े निशानेबाज़ हैं.

सौरव टोक्यो ओलंपिक में 10 मीटर एयर पिस्टल में व्यक्तिगत और मिश्रित टीम स्पर्धा में मनु भाकर के साथ मिलकर उतरेंगे.

वो अभी तक आईएसएसएफ़ विश्व चैम्पियनशिप, विश्व कप, यूथ ओलंपिक गेम्स, एशियन एयरगन चैम्पियनशिप और एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीत चुके हैं.

सौरव चौधरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ ज़िले के कलिंगा गांव के रहने वाले हैं. उनके पिता जगमोहन सिंह की अपनी खेतीबाड़ी है. उन्होंने ही सौरव चौधरी की प्रतिभा को पहचाना और आगे बढ़ाया.

सौरव चौधरी ने भी अपने पिता को निराश नहीं किया और एक क़दम आगे बढ़कर ऐसी कामयाबी हासिल की कि ऐसी उपलब्धियां हासिल करने वाले वो भारत के सबसे युवा खिलाड़ी बन गए.

सौरव चौधरी ने साल 2018 में जूनियर विश्व कप में तीन स्वर्ण पदक जीतकर तहलका मचा दिया. उन्होंने जर्मनी में व्यक्तिगत, मिश्रित टीम और टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीते.

इसके बाद उन्होंने साल 2018 में ब्यूनस आयर्स में हुए यूथ ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीता. अपनी इस कामयाबी को उन्होंने उसी साल जकार्ता में हुए एशियाई खेलों में दोहराया और व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता. इसके बाद सौरव चौधरी किसी परिचय के मोहताज नहीं रहे.

साल 2019 में सौरव चौधरी ने दोहा में हुई एशियन शूटिंग चैम्पियनशिप में दो रजत पदक जीते. साल 2018 सौरव चौधरी के लिए तब और भी ख़ास बन गया जब उन्होंने चांगवॉन में हुई आईएसएसएफ़ विश्व शूटिंग चैम्पियनशिप में एक स्वर्ण, एक रजत और एक कांस्य पदक जीते.

निशानेबाज़ी विश्व कप में सौरव चौधरी अब तक आठ स्वर्ण, तीन रजत और दो कांस्य पदक जीत चुके हैं. उन्होंने इसी साल मार्च में दिल्ली में हुए निशानेबाज़ी विश्व कप में दो स्वर्ण और एक रजत पदक जीते.

सौरव चौधरी एशियाई खेलों में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाले सबसे युवा खिलाड़ी हैं.

उन्होंने साल 2019 में दिल्ली में हुए विश्व कप में 245.0 के स्कोर का विश्व रिकॉर्ड बनाया और इसी के साथ टोक्यो ओलंपिक का टिकट भी हासिल किया.

सौरव ने शुरुआती निशानेबाज़ी अपने मेरठ के पास के गांव से 50 किलोमीटर से अधिक दूर बागपत के बनोली गांव में स्थित निशानेबाज़ी ऐकेडमी में सीखी. सौरव चौधरी मनु भाकर के साथ मिलकर भारत को कई स्वर्ण पदक मिश्रित स्पर्धा में दिला चुके हैं.

सौरव चौधरी जब कामयाबी की सीढ़ी चढ़ रहे थे तभी भारतीय ओलंपिक संघ के एक समारोह में दिल्ली में हमारी मुलाक़ात उनसे हुई. बातचीत के दौरान सौरव चौधरी बेहद संकुचित स्वभाव के दिखे.

ओलंपिक में पदक की बात चलने पर उन्होंने कहा, 'ऐसा लग रहा है कि पदक आ सकता है.' तैयारी और सुविधाओं से पूर्णतः संतुष्ट होकर बोले, 'इतनी बड़ी या इस तरह की प्रतियोगिताओं में स्वभाविक रूप से दबाव बन जाता है'.

श्वर्य प्रताप सिंह तोमर- छोटी उम्र के बड़े सपने

ऐश्वर्य प्रताप सिंह 20 साल के हैं. वे टोक्यो में 50 राइफ़ल थ्री पोजिशन में संजीव राजपूत के साथ नज़र आएंगे.

ऐश्वर्य के लिए विश्व कप में हिस्सा लेना बेहद कामयाबी भरा रहा. वहां उन्होंने तीन पदक जीते. व्यक्तिगत स्पर्धा में उन्होंने स्वर्ण, 10 मीटर एयर राइफ़ल की पुरुष टीम स्पर्धा में रजत और राइफ़ल स्पर्धा में मिश्रित टीम में कांस्य पदक जीते.

ऐश्वर्य प्रताप सिंह जूनियर विश्व कप में हिस्सा भी ले चुके हैं. 2019 विश्व कप में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता. उसी साल ताइवान में हुई एशियन एयरगन चैम्पियनशिप में उन्होंने 10 मीटर एयर राइफ़ल में कांस्य पदक अपने नाम किया.

साल 2019 में दोहा में हुई एशियन शूटिंग चैम्पियनशिप में उन्होंने दो कांस्य पदक जीतकर टोक्यो ओलंपिक का टिकट हासिल किया.

ऐश्वर्य मध्य प्रदेश के किसान परिवार से आते हैं. उनके पिता का नाम वीर बहादुर है.

वो दिल्ली में हुए विश्व कप में 50 मीटर राइफ़ल थ्री पोज़िशन में व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीत कर सुर्ख़ियों में आ गए क्योंकि उस दिन उन्होंने दुनिया के नंबर-1 खिलाड़ी हंगरी के इस्तवान पेनी और साल 2018 के विश्व चैम्पियन डेनमार्क के स्टीफ़न ओलसेन को पीछे छोड़ दिया था.

विश्व कप की कामयाबी की ख़बर जब वे अपने मोबाइल से घरवालों को दे रहे थे, और हमने उनसे बातचीत करने की कोशिश की तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक कहा 'बस थोड़ा समय दीजिए'.

उसके बाद ऐश्वर्य ने कहा, 'बस थोड़ी सी कमी रह गई वरना गोल्ड मेडल ही जीतते'.

वह अपना पसंदीदा इवेंट राइफ़ल थ्री पोज़ीशन को मानते हैं.

दिव्यांश सिंह पवार- कर्म पर भरोसा फल पर नहीं

राजस्थान की गुलाबी नगरी जयपुर से आने वाले दिव्यांश सिंह पवार 18 साल के हैं. वे उस उम्र में टोक्यो जा रहे हैं जब कोई खिलाड़ी ओलंपिक में भाग लेने के सपने देखता है.

दिव्यांश टोक्यो में 10 मीटर एयर राइफ़ल में पुरुष और मिश्रित टीम मुक़ाबलों में हिस्सा लेंगे.

अनुभव के नाम पर उनके पास निशानेबाज़ी विश्व कप ही है क्योंकि एक तो वो अभी बहुत कम उम्र के हैं और दूसरे कोविड ने दुनिया भर के तमाम निशानेबाज़ी टूर्नामेंट की रफ़्तार रोक दी है. इसके बावजूद उनका रिकॉर्ड शानदार है.

उन्होंने साल 2018 में जर्मनी में हुए जूनियर विश्व कप में 10 मीटर एयर राइफ़ल में पुरुष टीम और मिश्रित टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीते. इस कामयाबी ने निशानेबाज़ी में उनके रास्ते खोल दिए.

इसके बाद उन्होंने उसी साल चांगवॉन में हुई विश्व शूटिंग चैम्पियनशिप में 10 मीटर एयर राइफ़ल के जूनियर वर्ग मिश्रित टीम मुक़ाबले में कांस्य पदक जीता.

साल 2019 में तो उन्होंने आईएसएसएफ़ विश्व कप में दोनों हाथों से पदक बटोरे. उस साल दिव्यांश ने चीन के पुतियान में हुए विश्व कप में स्वर्ण पदक जीता. वहां हंगरी के इस्तवान पेनी को उन्होंने दूसरे नम्बर पर छोड़ा.

दिव्यांश ने 2019 में चार स्वर्ण, एक रजत और एक कांस्य सहित छह पदक जीते. इनमें से चार स्वर्ण और एक कांस्य पदक उन्होंने मिश्रित टीम स्पर्धा में जीता.

उनके पिता अशोक पवार जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में डॉक्टर हैं. उन्होंने केवल बारह साल की उम्र से जयपुर की जंगपुरा शूटिंग रेंज में निशानेबाज़ी करना शुरू किया.

साल 2017 में इनके पिता ने इन्हें दिल्ली के कर्णी सिंह शूटिंग रेंज में दीपक कुमार दूबे की कोचिंग में छोड़ दिया.

अच्छी बात ये है कि दिव्यांश ख़ुद पदक जीतने के दावों को नकार कर हर दबाव से मुक्त हैं, और ये बात उन्हें शानदार प्रदर्शन करने को प्रेरित कर सकती है.

दिव्यांश गीता के उपदेश "कर्म किए जा फल की इच्छा मत कर ऐ इंसान, जैसे कर्म करेगा वैसे फल देगा भगवान" की नीति पर चलते हैं.

यशस्विनी देसवाल के इरादे हैं विशाल

इसी साल मार्च महीने में दिल्ली में आईएसएसएफ़ निशानेबाज़ी विश्व कप चल रहा था और गिने चुने खेल पत्रकारों और विभिन्न देशों के निशानेबाज़ों, कोच और अधिकारियों की निगाहें 10 मीटर एयर पिस्टल के व्यक्तिगत महिला फ़ाइनल मुक़ाबले पर टिकी थीं.

शूटिंग हॉल में आठ प्लेयर्स फ़ाइनल में मुक़ाबला कर रहे थे. खिलाड़ियों के ठीक ऊपर टेलीविज़न स्क्रीन लगी थी. उसपर खिलाड़ी और देश के नाम के साथ साथ स्कोर बताने के चिह्न थे.

दर्शकों को स्टेडियम में आने की अनुमति नहीं थी इसलिए बहुत अधिक शोर भी नहीं था. मुक़ाबले में भारत की स्टार निशानेबाज़ मनु भाकर भी थीं और सबको उम्मीद थी कि वही चैम्पियन भी बनेंगी, लेकिन जब परिणाम आया तो सब चौंक गए.

स्टेडियम में लगी विशाल स्क्रीन पर पहला नाम यशस्विनी देसवाल का था, उनका स्कोर था 238.8. दूसरे नम्बर पर थी मनु भाकर जिनका स्कोर था 236.7, और तीसरे नम्बर पर थी 215.9 अंकों के साथ बेलारूस की विक्टोरिया.

ये स्कोर बताता है कि यशस्विनी बेलारूसी निशानेबाज़ से तो बहुत आगे थी साथ ही मनु भाकर को भी उन्होंने आसानी से मात दे दी थी.

यशस्विनी देसवाल ने इसके बाद इसी विश्व कप में सटीक निशाना लगाते हुए टीम स्पर्धा में मनु भाकर और श्रीनिकेता के साथ मिलकर स्वर्ण पदक जीता.

उन्होंने मिश्रित टीम में भी कांस्य पदक जीता. इससे पहले साल 2019 में उन्होंने रियो में हुए विश्व कप में भी एक स्वर्ण और एक रजत पदक जीता था. उनके पास पिछले दिनों क्रोएशिया में हुए विश्व कप का कांस्य पदक भी है.

24 साल की यशस्विनी देसवाल टोक्यो में 10 मीटर एयर पिस्टल में अपना निशाना साधेंगी. सबसे पहली अंतरराष्ट्रीय कामयाबी उन्हें साल 2014 में ही मिल गई थी, तब उन्होंने कुवैत में एशियन जूनियर शूटिंग चैम्पियनशिप में रजत पदक जीता था.

2019 में उन्होंने दोहा में हुई एशियन शूटिंग चैम्पियनशिप में मिश्रित टीम स्पर्धा में रजत पदक जीता. 2017 में यशस्विनी जर्मनी में जूनियर विश्व चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक भी जीत चुकी हैं.

ज़ाहिर है ओलंपिक उनके लिए पहला बहुत बड़ा टूर्नामेंट है जहां उन्हें कुछ बड़ा कर दिखाने का मौक़ा भी मिला है. यशस्विनी की निशानेबाज़ी में रुचि उनके पिता एस एस देसवाल की वजह से जगी.

उनके पिता इंडो-बॉर्डर पुलिस में एक वरिष्ठ अधिकारी हैं. वो यशस्विनी को साल 2010 में दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में निशानेबाज़ी की स्पर्धाएं दिखाने के लिए साथ लेकर आए थे. इसके बाद यशस्विनी ने अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज़ और पूर्व पुलिस अधिकारी टीएस ढिल्लन के साथ अभ्यास शुरू किया.

निशानेबाज़ी की इस यात्रा में उनके परिवार ने पूरा साथ देते हुए एक शूटिंग रेंज बनवाई. घर में बनी शूटिंग रेंज ने उन्हें टोक्यो ओलंपिक की शूटिंग रेंज तक पहुँचा दिया.

यशस्विनी ने साल 2019 में रियो में हुए निशानेबाज़ी विश्व कप में स्वर्ण पदक के साथ टोक्यो ओलंपिक का कोटा हासिल किया. दिल्ली में मिली स्वर्णिम कामयाबी को लेकर उन्होंने कहा कि 'बहुत ख़ुशी मिल रही है, मेहनत का रंग आ रहा है. इससे आगे के लिए प्रेरणा मिली है कि ऐसे ही मेहनत करती रहूं'.

यशस्विनी साल 2017 में जूनियर विश्व चैम्पियन बनना अपना सबसे यादगार लम्हा मानती हैं. यशस्विनी कहती हैं कि 'वो सफलता एक संकेत था कि मेहनत करते रहो सब ठीक होगा'.

अब देखना है कि मनु भाकर, सौरव चौधरी, दिव्यांश सिंह पवार, ऐश्वर्य प्रताप सिंह तोमर और यशस्विनी देसवाल यानी इन पांच निशानेबाज़ों का निशाना रूपी पंच टोक्यो में पदक पर लगता है या नहीं.

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