आसिफ़ सुल्तानी: जान बचाने के लिए अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने से ओलंपिक के सपने तक

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- Author, रिया चौहान
- पदनाम, बीबीसी स्पोर्ट
"हमें रास्तों में लुटेरों ने लूट लिया था. हमारे पास बचा-खुचा सामान था, बंदूक़ की नोक पर सब कुछ छीन लिया. तब मैं सात बरस का था और बुरी तरह से डर गया था."
आसिफ़ सुल्तानी को अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने का वो सफ़र पूरी तरह से तो याद नहीं, लेकिन उनके दिल में धुंधली सी यादें बची हैं.
हज़ारा समुदाय से आने वाले आसिफ़ के परिवार को उत्पीड़न से बचने के लिए मजबूर होकर अफ़ग़ानिस्तान छोड़ना पड़ा था.
पनाह लेने के लिए जब उनका परिवार ईरान पहुँचा, तो उनके साथ शरणार्थियों जैसा बर्ताव नहीं हुआ.
आसिफ़ सुल्तानी ने बीबीसी स्पोर्ट को बताया, "वहाँ दस्तावेज़ न होने के कारण हमारे साथ भेदभाव किया जाता था."
"मुझे याद आता है कि लोग मुझे बहुत परेशान करते थे. लोग मुझे लात-घूंसों से मारते थे. मुझ पर थूक देते थे. बेइज्जत करते थे. और मुझे रहम की भीख मांगने के लिए मजबूर कर देते थे."

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मार्शल आर्ट्स
लेकिन आसिफ़ के पिता ने उन्हें हौंसला दिया और अपनी हिफाजत के लिए मार्शल आर्ट्स सीखने के लिए प्रोत्साहित किया.
वही आसिफ़ टोक्यो ओलंपिक्स में 'टीम रिफ़्यूजी' की तरफ़ से कराटे की प्रतिस्पर्धा में जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
उनके पास वैध दस्तावेज़ नहीं थे, इसलिए नज़दीक के कराटे सेंटर ने उन्हें मौक़ा देने से इनकार कर दिया.
इससे निराश होकर आसिफ़ ने अपने घर के पिछले हिस्से में एक ट्रेनिंग जिम बना ली.
वो बताते हैं, "मेरा दिल टूट गया था, क्योंकि कराटे ही मेरी ज़िंदगी की आख़िरी उम्मीद थी."
"मैंने अपने कुछ दोस्तों को इकट्ठा किया. ख़ुद ही ट्रेनिंग शुरू कर दी. ब्रूस ली की फ़िल्में देखीं और ये माना कि मैं उनकी तरह ही हूँ."
"वो कोई शौक की बात नहीं थी. बस हमारे पास हिम्मत थी, उम्मीद थी और कुछ कर गुज़रने का एक सपना था."

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एक ही रास्ता
लेकिन एक दिन वो सपना टूटने की कगार पर पहुँच गया. तब आसिफ़ सोलह साल के थे, उन्हें अफ़ग़ानिस्तान डिपोर्ट कर दिया गया.
अफ़ग़ानिस्तान में होटल के एक छोटे से कमरे में जान बचाने के लिए उन्हें रहना पड़ा.
आसिफ़ सुल्तानी बताते हैं, "वहाँ लोग सड़कों पर बड़ी बंदूक़ों के साथ आते-जाते दिखा करते थे. मैं बेहद डरा हुआ था क्योंकि हज़ारा समुदाय के लोगों पर अफ़ग़ानिस्तान में सालों से जुल्म होता आया था."
सुल्तानी को लगा कि अब उनके पास केवल एक ही रास्ता रह गया है.
कुछ हफ़्तों बाद वे 100 से ज़्यादा लोगों के उस जत्थे में शामिल हो गए, जो इंडोनेशिया के रास्ते ऑस्ट्रेलिया जा रहा था.
छोटी नावों पर ये सफ़र बड़ी मुश्किलों भरा था. समंदर में उनके नाव का इंजन ख़राब हो गया है और वे वहीं पर फँस गए.
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ऑस्ट्रेलिया में नई शुरुआत
आसिफ़ बताते हैं, "सब लोग रो रहे थे, दुआ कर रहे थे, पानी में कूदने के लिए तैयारी कर रहे थे. वो सब कुछ एक बुरे ख़्वाब में बदल गया था."
कई घंटों तक मंझधार में फँसे रहने के बाद उनकी नाव किनारे तक पहुँचने में कामयाब हो पाई.
सुल्तानी को अपने किशोर उम्र के कुछ साल डिटेंशन सेंटर में गुज़ारने पड़े.
लेकिन 18 साल की उम्र में उन्हें ऑस्ट्रेलिया के हाई स्कूल में दाखिला मिल गया, जहाँ वे दिन में दो बार कराटे की ट्रेनिंग लिया करते थे.
उन्हें इंटरनेशनल ओलंपिक काउंसिल रिफ्यूजी स्कॉलरशिप मिली. टीम रिफ्यूजी की तरफ़ से वे साल 2016 के रियो ओलंपिक में खेले.
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सुल्तानी को जून में ये पता चल पाएगा कि वे टोक्यो ओलंपिक में जगह बना पाए हैं या नहीं.
वे कहते हैं, "मैं गोल्ड मेडल नहीं जीतने जा रहा हूँ."
"एक शरणार्थी के तौर पर हम अपनी ज़िंदगी नहीं चुनते हैं. हम ये नहीं चुनते कि कोई हमारा उत्पीड़न करे या हमें अपना घर-परिवार और मिट्टी से अलग होना पड़े."
"मैं वो शख़्स बनना चाहूँगा, जो दुनिया भर के लाखों विस्थापित बच्चों को उम्मीदों का संदेश दे सके. मैं हर उस बच्चे में ख़ुद को देखता हूँ."
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