अजिंक्य रहाणे ने आपदाग्रस्त टीम को यूँ अवसर में बदल डाला

    • Author, आदेश कुमार गुप्त
    • पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार

ब्रिस्बेन में मेज़बान ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ चौथे और आख़िरी टेस्ट मैच के अंतिम दिन जब भारत जीत के लिए 328 रन के लक्ष्य का पीछा कर रहा था तब चायकाल के बाद मैच में एक दिलचस्प मोड़ आया.

तब तक 80 ओवर हो चुके थे और भारत का स्कोर तीन विकेट पर 228 रन था. चेतेश्वर पुजारा 210 गेंदों का सामना कर 56 और ऋषभ पंत 34 रन बनाकर खेल रहे थे. भारत और जीत के बीच पूरे 100 रन का अंतर रह गया था.

मैच में अभी बीस ओवर का खेल बाक़ी था. ऐसे में लग रहा था कि भारत अब मैच अपने नाम करने के लिए थोड़ा तेज़ खेल सकता है. यह टेस्ट मैच वनडे क्रिकेट जैसा लगने लगा. तभी ऑस्ट्रेलिया के कप्तान टिम पेन ने नियमानुसार दूसरी नई गेंद ली और तेज़ गेंदबाज़ पैट कमिंस को थमा दी.

कमिंस ने दूसरी ही गेंद पर चेतेश्वर पुजारा को एलबीडब्ल्यू कर दिया और भारतीय टीम के ड्रेसिंग रूम की धड़कनें बढ़ा दीं. उसके बाद कमिंस ने नए बल्लेबाज़ मयंक अग्रवाल को भी मैथ्यू वेड के हाथों कैच लपकवाकर भारत को एक झटका और दिया.

मयंक अग्रवाल केवल नौ रन बना सके. ऐसी कठिन परिस्थिति में अपना पहला ही टेस्ट मैच खेल रहें वॉशिंगटन सुंदर ने कमिंस के एक ओवर में पहले तो छक्का और उसके बाद चौका लगाकर अचानक मैच का रूख़ बदल दिया.

उसके बाद ऋषभ पंत ने नाथन लियन के ओवर में दो चौके लगाकर मैच को जैसे टी-20 में बदल दिया. भारत को इसी ओवर में चार रन बाई के भी मिले. अब भारत का स्कोर पाँच विकेट खोकर 304 रन था.

अब तक मैच भारत की पकड़ में आ चुका था और ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के कंधे झुक चुके थे, लेकिन जब भारत जीत से दस रन दूर था तब नाथन लियन ने वॉशिंगटन सुंदर को बोल्ड कर दिया. सुंदर ने केवल 29 गेंदों पर 22 रन बनाए.

इसके बाद शार्दूल ठाकुर भी दो रन बनाकर हेज़लवुड का शिकार हो गए. आख़िरकार ऋषभ पंत ने हेज़लवुड की गेंद पर चौका लगाकर भारत को तीन विकेट से जीत दिला दी और मैदान में मौजूद गिने-चुने भारतीयों को उसी गाबा पर शान से तिरंगा लहराने का अवसर दे दिया, जहाँ पिछले 70 साल से ऑस्ट्रेलिया की जीत का परचम फहरा रहा था.

इससे पहले साल 1951 में वेस्टइंडीज़ ने ऑस्ट्रेलिया को हराया था और जीत के लिए 236 रन का लक्ष्य हासिल किया था. वैसे भारत के टेस्ट क्रिकेट में 300 या उससे अधिक रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए यह केवल तीसरी जीत है.

इससे पहले भारत ने साल 1976 में पोर्ट ऑफ स्पेन में वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ चौथी पारी में चार विकेट पर 406 रन बनाकर चार विकेट से जीत हासिल की थी. इसके बाद भारत ने साल 2008 में चेन्नई में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ खेले गए पहले टेस्ट मैच में चौथी पारी में चार विकेट पर 387 रन बनाकर छह विकेट से जीत हासिल की.

ब्रिस्बेन में मिली नाटकीय जीत का नायक किसे कहा जाए? शुभमन गिल ने 91 रन बनाए, पुजारा ने 56 रन बनाए तो ऋषभ पंत 89 रन बनाकर नाबाद रहे. ऋषभ पंत तो मैन ऑफ द मैच भी चुने गए, जिन्होंने अपनी पारी को अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ पारी कहा. लेकिन मैच को सही मायने में भारत की तरफ़ मोड़ने में वॉशिंगटन सुंदर की तेज़तर्रार 22 रन की पारी भी बेहद महत्वपूर्ण रही.

इसके साथ ही भारत ने चार टेस्ट मैच की सिरीज़ 2-1 से अपने नाम कर ली और गावसकर-बॉर्डर ट्रोफी पर अपना क़ब्ज़ा भी लगातार दूसरी बार बरक़रार रखा.

भारतीय टीम को लेकर पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर भी अभिभूत हुए बिना नहीं रहे और उन्होंने एक खेल चैनल से बातचीत में माना कि इस टीम का संघर्ष वर्षों तक याद किया जाएगा. उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया में वह ख़ुद टीम का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और जानते हैं कि वहाँ खेलना कितना चुनौतीपूर्ण है.

उन्होंने यह भी कहा कि वह पहले ही भारतीय टीम की 2-1 से जीत की भविष्यवाणी कर चुके थे. इस शानदार क़ामयाबी के बाद टीम के कोच रवि शास्त्री ने कहा कि वह ऐसा सब कुछ देखने के लिए आदी हो चुके है.

उन्होंने जीत का श्रेय नए खिलाड़ियों के जुझारु चरित्र को दिया. रवि शास्त्री ने ऋषभ पंत, वॉशिंगटन सुंदर और शार्दुल ठाकुर की भी दिल खोलकर तारीफ़ की. रवि शास्त्री ने यह भी कहा कि यह सिरीज़ लंबे समय तक याद की जाएगी. उन्होंने कहा कि चोटिल खिलाड़ियों की जगह जिसे भी खेलने का मौक़ा मिला, उसने मैदान के भीतर क़दम रखते ही अपनी पूरी क्षमता के साथ प्रदर्शन किया.

यह सिरीज़ कई मायनों में इससे पहले खेली गई टेस्ट सिरीज़ से अलग रही. नियमित कप्तान विराट कोहली एडिलेड में मिली ऐतिहासिक और शर्मनाक हार के बाद भारत लौट गए थे. अजिंक्य रहाणे को मुश्किल हालात में कप्तानी मिली. एक के बाद एक खिलाड़ी चोटिल होते चले गए.

अनुभवहीन गेंदबाज़ों का साथ और क्रिकेट पंडितों का मानना था कि भारत का ऑस्ट्रेलिया में जीतना नामुमकिन है, ख़ासकर यह देखते हुए कि ऑस्ट्रेलिया के पास हेज़लवुड, पैट कमिंस और मिचेल स्टार्क के रूप में सर्वश्रेष्ठ तेज़ गेंदबाज़ी आक्रमण है तो नाथन लियन जैसा अनुभवी स्पिनर भी.

इस सिरीज़ में दोनों टीमों के बीच इतनी शानदार क्रिकेट देखने को मिली कि हैरतअंगेज़ परिणाम के बीच पाँच महत्वपूर्ण बात ढूँढना बेहद मुश्किल है. भारत के सभी खिलाड़ियों ने अपनी जी जान लगा दी फ़िर भी बहुत कुछ ऐसा हुआ जिसने टेस्ट क्रिकेट के रोमांच को बढ़ा दिया. वह भी तब जब टेस्ट मैच तीन चार दिन में समाप्त हो रहे हों.

चेतेश्वर पुजारा का धैर्य और ऋषभ पंत की तेज़ी

इस सिरीज़ में चेतेश्वर पुजारा और ऋषभ पंत आलोचना और तारीफ़ दोनों हासिल करते रहे. चेतेश्वर पुजारा अपनी धीमी पारी और ऋषभ पंत अपनी तेज़ तर्रार पारी के बाद आउट होने के तरीक़े से क्रिकेट समीक्षकों और पूर्व खिलाड़ियों के निशाने पर रहे.

ऋषभ पंत ने तो चयनकर्ताओ को भी संदेह में रखा कि उन्हें टीम में रखें या रिद्धिमान साहा को. ऋषभ पंत की कमज़ोर विकेटकीपिंग सवाल खड़े कर रही थी. लेकिन ऋषभ पंत की दिलेर और चेतेश्वर पुजारा की धैर्यपूर्ण बल्लेबाज़ी से ही भारत को ब्रिस्बेन में ऐतिहासिक जीत मिली.

पुजारा ने 211 गेंदों का सामना कर भले ही 56 रन बनाए हों लेकिन उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज़ों को थका दिया. इसका लाभ दूसरे बल्लेबाज़ों को मिला. ऋषभ पंत को जिस भरोसे के साथ टीम में रखा गया वह उस पर खरे उतरे.

भारत को मैच जीताऊ पारी खेलकर अब ऋषभ पंत ने अपने ऊपर चयन की लटकती तलवार को भी हटा दिया है. ऋषभ पंत ने तीन टेस्ट मैच खेलकर सबसे अधिक 274 और चेतेश्वर पुजारा ने दूसरे स्थान पर रहते हुए 271 रन बनाए.

लेकिन पुजारा ने सिडनी में खेले गए तीसरे टेस्ट मैच को ड्रॉ कराने में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया और दूसरी पारी में 205 गेंदों का सामना करते हुए 77 रन बनाए. पुजारा ने सिडनी और ब्रिस्बेन में अपनी जीवटता का परिचय देते हुए अपने शरीर पर तेज़ गेंदों के प्रहार को भी सहा. पंत ने भी सिडनी में 118 गेंदों का सामना कर 97 रन बनाए और दिखाया कि वह भी संकटमोचक से कम नहीं हैं.

मोहम्मद सिराज, शार्दूल ठाकुर, वॉशिंगटन सुंदर और शुभमन गिल

ब्रिस्बेन में भारत अपने टेस्ट इतिहास के सबसे कम अनुभवी गेंदबाज़ों के साथ उतरा. आर अश्विन और रविंद्र जडेजा जैसे स्पिनर और जसप्रीत बुमराह जैसे तेज़ गेंदबाज़ चोटिल होकर टीम से बाहर थे. ऐसे में मोहम्मद सिराज अपना तीसरा, टी नटराजन और वॉशिंगटन सुंदर पहला, शार्दुल ठाकुर और नवदीप सैनी अपना दूसरा टेस्ट मैच खेलने गाबा पर उतरे, जहाँ ऑस्ट्रेलिया 70 साल से अजेय था.

पहली पारी में नटराजन, ठाकुर और सुंदर ने तीन तीन विकेट आपस में बाँटे तो दूसरी पारी में मोहम्मद सिराज ने पाँच और शार्दुल ठाकुर ने चार विकेट झटके. दूसरी पारी में अगर ऑस्ट्रेलिया 294 रन पर सिमटा तो इसका पूरा श्रेय इन्हीं दोनों गेंदबाज़ों को जाता है.

दोनों ने विकेट टु विकेट गेंदबाज़ी कर ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ों की नाक में दम कर दिया. जब भारतीय टीम जीत के लिए 328 रन के लक्ष्य को सामने रख मैदान में उतरी तो उम्मीदें रोहित शर्मा, अजिंक्य रहाणे और मयंक अग्रवाल से थी जिनके पास पिछले दौरे का भी अनुभव था लेकिन जीत की राह दिखाई शुभमन गिल, चेतेश्वर पुजारा और ऋषभ पंत के अलावा वॉशिंगटन सुंदर ने.

शुभमन गिल ने दूसरी पारी में 91 रन बनाकर दिखाया कि चौथी पारी में दबाव के बीच भी खेला जा सकता है. मयंक अग्रवाल और पृथ्वी शॉ के सलामी बल्लेबाज़ के तौर पर नाकाम रहने के बाद जब शुभमन गिल को मौक़ा मिला तो उन्होंने दोनों हाथों से उसका फ़ायदा उठाया.

तीन टेस्ट मैचों में उन्होंने 259 रन बनाए और अपनी उपयोगिता साबित की. वॉशिंगटन सुंदर आए तो अपनी गेंदबाज़ी के कारण लेकिन बल्लेबाज़ी में कमाल कर गए. दरअसल, पहली पारी में उन्होंने 62 रन बनाए. उन्हें शार्दूल ठाकुर का भी बेहतरीन साथ मिला जिन्होंने 67 रनों की पारी खेली.

इनकी शानदार पारियों की बदौलत भारत 336 रन बनाने में कामयाब रहा और ऑस्ट्रेलिया पहली पारी के आधार पर सिर्फ़ 33 रन की बढ़त हासिल कर सका. ब्रिस्बेन में मिली जीत में वॉशिंगटन सुंदर ने केवल 29 गेंद में 22 रन बनाकर ड्रॉ की तरफ़ बढ़ते मैच को जीत में बदल दिया.

मोहम्मद सिराज ने ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान अपने पिता को खोया और नस्ली टिप्पणी का भी शिकार हुए लेकिन तीन मैच में 13 विकेट बताते हैं कि उन्होंने इन सबकी परवाह छोड़ सिर्फ़ अपने प्रदर्शन पर ध्यान दिया.

36 पर ऑलआउट और उसके बाद रहाणे की कप्तानी का कमाल

यह कल्पना करके ही दिल दहल जाता है कि किसी खिलाड़ी को उस टीम की कमान मिले जो सिरीज़ के पहले ही टेस्ट मैच में 36 रन पर सिमट जाए और उस टीम का सबसे बेहतरीन खिलाड़ी और नियमित कप्तान विराट कोहली पिता बनने के लिए वापस स्वदेश लौट जाएं.

सबसे अनुभवी तेज़ गेंदबाज़ मोहम्मद शमी चोटिल हो जाए. और उसके बाद टीम घायल खिलाड़ियों का जमघट बन जाए, जिसमें जसप्रीत बुमराह, आर अश्विन, रविंद्र जडेजा, ऋषभ पंत, नवदीप सैनी और बाउंसर झेलते चेतेश्वर पुजारा भी शामिल हो. और तो और उस खिलाड़ी की जगह भी टीम में दांव पर हो, लेकिन अजिंक्य रहाणे इन सब परिस्थितियों में नायक साबित हुए.

उन्होंने बेहद शांति और चतुराई से विपक्षी टीम के हर वार का जवाब दिया. सबसे पहले तो उन्होंने अगले ही टेस्ट मैच में मेलबर्न में भारत को आठ विकेट से जीताया और हार का ग़म दूर किया. रहाणे ने पहली पारी में 112 रन की शतकीय पारी भी खेली. यह सिरीज़ बल्लेबाज़ों के लिए कैसी रही इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उनके अलावा ऑस्ट्रेलिया के स्टीव स्मिथ और मार्कस लाबुशेन ही शतक बना सके.

अजिंक्य रहाणे पूरी सिरीज़ में स्टीव स्मिथ पर भी दबाव बनाने में कामयाब रहे. उन्होंने स्मिथ के आते ही आर अश्विन को गेंद दी जिनके सामने स्मिथ सहज होकर नहीं खेल सके. रहाणे ने भले ही इस सिरीज़ के आख़िरी दो टेस्ट मैच में बल्ले से अधिक कमाल नहीं कर सके लेकिन उनकी कप्तानी को देखकर इंग्लैंड के पूर्व कप्तान माइक ब्रेयरली की याद ज़रूर आ जाती है जो सिर्फ़ अपनी कप्तानी के दम पर खेल जाते थे.

अजिंक्य रहाणे की कप्तानी में भारत ने अभी तक पाँच टेस्ट में से चार में जीत हासिल की है और एक मैच ड्रॉ रहा है. रहाणे को बल्लेबाज़ी में फ़िर भी शुभमन गिल, रोहित शर्मा, चेतेश्वर पुजारा, ऋषभ पंत और रविंद्र जडेजा का साथ मिला लेकिन जैसे अनुभवहीन गेंदबाज़ उन्हें मिले उसे देखकर एक बार तो कोई भी कप्तान घबरा सकता था.

अब भविष्य में टीम की कमान भले ही विराट कोहली संभालें लेकिन अजिंक्य रहाणे को कप्तान के तौर पर इसलिए याद किया जाएगा कि उन्होंने आधी से ज़्यादा घायल टीम के साथ उस ऑस्ट्रेलियाई टीम को मात दी जो काग़ज़ पर भारत से बेहतर थी और जिसने हर मैच में शुरुआती दो तीन दिन मैच पर अपनी पकड़ भी बनाए रखी.

आर अश्विन और रविंद्र जडेजा ने मुश्किल से निकाला

एक समय ऐसा भी था जब टेस्ट मैच के अलावा आर अश्विन और रविंद्र जडेजा की जोड़ी एकदिवसीय क्रिकेट में भी भारत की जान थी लेकिन धीरे-धीरे इस जोड़ी का जादू टूटने लगा, ख़ासकर एकदिवसीय क्रिकेट में. आर अश्विन तो पहले टेस्ट मैच में स्मिथ सहित चार विकेट लेकर अपनी उपयोगिता साबित कर चुके थे लेकिन रविंद्र जडेजा तो टीम से बाहर थे.

आख़िरकार उन्हें दूसरा और तीसरा टेस्ट मैच खेलने का मौक़ा मिला. तीसरे टेस्ट मैच के बाद जडेजा बाएँ हाथ के अंगूठे की चोट और अश्विन कमर में दर्द के कारण सिरीज़ से बाहर हो गए. लेकिन इन दोनों ने गेंद के अलावा बल्ले से भी अपना दम दिखाया. जडेजा ने दूसरे टेस्ट मैच की पहली पारी में 57 रन बनाए और गेंदबाज़ी करते हुए ऑस्ट्रेलिया की दूसरी पारी में दो विकेट भी लिए जबकि पहली पारी में उन्हें एक ओवर भी नहीं मिला.

अश्विन ने इस मैच में पाँच विकेट लिए लेकिन अगले मैच में अश्विन का वह रूप देखने को मिला जिसकी उम्मीद नहीं थी. कहने को सिडनी टेस्ट मैच ड्रॉ रहा लेकिन यह सब करना आसान नहीं था. रविंद्र जडेजा ने पहले तो ऑस्ट्रेलिया के चार विकेट झटके और उसके बाद टूटे हाथ के साथ पैड बांधे दूसरी पारी में बल्लेबाज़ी करने को भी तैयार थे, जहाँ भारत मैच का ड्रॉ करने की लड़ाई कर रहा था.

आख़िरकार भारत ने पूरे 131 ओवर खेले और पाँच विकेट पर 334 रन बनाकर अपनी जान खिलाड़ियों की जान पर खेलकर बचाई. ख़ुद आर अश्विन ने अपनी पसलियों पर बाउंसर झेलकर 128 गेंदों का सामना कर नाबाद 39 रन बनाए. रविंद्र जडेजा और आर अश्विन के जज़्बे का असर टीम पर ऐसा पड़ा कि भारत ने ब्रिस्बेन के गाबा मैदान पर लगभग उन्हीं परिस्थितियों का सामना कर जीतकर ही दम लिया.

संकटमोचक साबित हुए हनुमा विहारी

जब हनुमा विहारी का चयन ऑस्ट्रेलिया दौरे के लिए हुआ तो शायद सबको कुछ ताज्जुब हुआ हो लेकिन उन्होंने जिस अंदाज़ में सिडनी टेस्ट मैच ड्रॉ कराने में अपना योगदान दिया वह भी लंबे समय तक याद रखा जाएगा.

ऑस्ट्रेलिया द्वारा पहली पारी में बनाए गए 338 रन के जवाब में जब भारत पहली पारी में बल्लेबाज़ी करने उतरा तो वह चार रन बनाकर रन आउट हो गए लेकिन तब तक वह 38 गेंद खेलकर अपने धैर्य का परिचय दे चुके थे और दूसरी पारी में तो वह अंगद की तरह पांव जमाकर खड़े हो गए.

उन्होंने 161 गेंदों का सामना कर नाबाद 23 रन बनाए और एक निश्चित सी जीत से ऑस्ट्रेलिया को दूर कर मैच ड्रॉ करा दिया. वह उस स्थिति में बल्लेबाज़ी करने उतरे जब वह हैमस्ट्रिंग में चोट के कारण दौड़ भी नहीं सकते थे.

यही कारण है कि वह चौथा और आख़िरी टेस्ट मैच नहीं खेल सके.

ऑस्ट्रेलियाई आक्रमण को शायद ही किसी और टीम ने लगातार इतना परेशान किया हो, वह भी तब जब उसके पास अनुभव की कमी हो. यह भी शायद पहली बार हुआ है कि किसी दौरे पर भारत के सभी खिलाड़ी खेलने में कामयाब रहे.

टेस्ट सिरीज़ में कुलदीप यादव ही नहीं खेल सके. कप्तान अजिंक्य रहाणे अगर सभी के प्रदर्शन से ख़ुश हैं तो उसका श्रेय सबको ही जाता है, लेकिन उन्होंने माना कि वह मैच का रुख़ बदलने वाले खिलाड़ी रहे.

रहाणे ने कहा कि नंबर पाँच पर उन्हें खिलाने का निर्णय टीम का था लेकिन मैदान में उन्हें ही खेलना था. रहाणे पंत की बल्लेबाज़ी के सुधरने से ख़ुश हैं. हनुमा विहारी की पारी को याद कर उन्होंने कहा कि वह पारी शतकीय पारी से भी बेहतर थी.

एडिलेड टेस्ट मैच में मिली हार के बाद बने माहौल को लेकर रहाणे ने कहा कि टीम ने उसके बाद मैच दर मैच रणनीति बनाई ना कि पूरी सिरीज़ को लेकर. अब जबकि दिलों की धड़कन रोक देने वाली टेस्ट सिरीज़ समाप्त हो गई है, तमाम क्रिकेट पंडितों के अनुमान ग़लत साबित हुए हैं, वैसे में भारतीय टीम की 2-1 से जीत के बाद गाबा मैदान में तिरंगे के साथ चक्कर लगाना लंबे समय तक याद रहेगा. वैसे भी जीत के रंगों से बेहतर रंग कौन से होंगे.

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