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बलबीर सिंह सीनियर का हॉकी के जादूगर ध्यानचंद से कैसा 'कनेक्शन' था
- Author, आदेश कुमार गुप्त
- पदनाम, खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
"मेरी मुलाक़ात बलबीर सिंह जी से कोई तीन महीने पहले चंडीगढ़ में एक समारोह के दौरान हुई थी. तब बलबीर सिंह जी व्हीलचेयर पर बैठे थे."
"तब मैं यही सोच रहा था कि यह वही इंसान है जिसने मैदान पर दौड़-दौड़ कर गोल किए, कुदरत का कमाल देखिये कि वही इंसान व्हीलचेयर पर है. शायद यही ज़िंदगी है. हरेक के साथ कुछ ना कुछ ऐसा होता है."
यह कहना है भारत के पूर्व हॉकी खिलाड़ी और दादा ध्यानचंद के पुत्र अशोक कुमार का.
सोमवार की सुबह यह बात जगंल में आग की तरह फैल गई कि हॉकी के महान खिलाड़ी बलबीर सिंह सीनियर दुनिया में नहीं रहे.
बलबीर सिंह 1948-1952 और 1956 के ओलपिंक खेलों में एक खिलाड़ी और बाद में कप्तान के तौर पर भारत के लिए खेले और इन तीनों ओलंपिक में भारत ने स्वर्ण पदक जीते.
अशोक कुमार ने बीबीसी से ख़ास बातचीत में बलबीर सिंह सीनियर को याद करते हुए कहा कि उनसे जब भी मुलाक़ात होती थी वह हमेशा यह कहकर मिलते थे, 'दादा का लड़का-दादा का लड़का'.
अशोक कुमार बलबीर सीनियर से जुड़ी बातों को याद करते हुए कहते हैं कि वह हमेशा हमारे परिवार से बेहद लगाव महसूस करते थे. मैंने कई बार सुना कि वह हमेशा कहते थे कि मैं ध्यानचंद जैसा बनना चाहता हूं.
यह बात सच भी है क्योंकि नई दिल्ली में साल 2010 में विश्व कप हॉकी टूर्नामेंट का आयोजन हुआ और उसी दौरान मुझे उनसे व्यक्तिगत रूप से बातचीत करने का अवसर भी मिला.
बातों ही बातों में मैंने उनसे सवाल किया कि आपके समय में सुना है भारत दो चीज़ों के लिए मशहूर था. एक तो हॉकी में ध्यानचंद और दूसरी गांधी.
इतना सुनकर वह मुस्कुराए और बोले हां. उसके बाद उन्होंने लम्बी बातचीत में कहा कि जब दादा ध्यानचंद साल 1936 में बर्लिन ओलंपिक में खेले तब पहली बार उनके बारे में सुना. उस समय बलबीर सिंह गोलकीपर के तौर पर हॉकी खेलते थे और आठवीं कक्षा में पढ़ते थे.
तब उनके मन में भाव आया कि वह भी ध्यानचंद की तरह खेले और जनता के आदर्श बने, यही लक्ष्य बनाया जाए. और कुदरत ने ऐसा साथ भी दिया कि बलबीर सिंह ने ऐसा कर भी दिखाया.
दादा ध्यानचंद की तरह ही तीन बार स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम के खिलाड़ी और कप्तान. दादा ध्यानचंद ने साल 1928-1932 और 1936 के ओलंपिक खेलों में हिस्सा लिया और हॉकी में भारत ने ब्रिटिश झंडे तले स्वर्ण पदक जीता.
बलबीर सिंह के साथ भी ऐसा ही हुआ. साल 1948 के लंदन, साल 1952 के हेलसिंकी और 1956 के मेलबर्न ऑस्ट्रेलिया में हुए ओलंपिक खेलों में उन्होंने हिस्सा लिया और भारत ने हॉकी में स्वर्ण पदक जीता.
बलबीर सिंह सीनियर को हालांकि दादा ध्यानचंद से तुलना पसंद नहीं थी लेकिन कहीं ना कहीं उनसे बातचीत में लगता था कि जितनी सुर्खियां या प्रचार दादा ध्यानचंद को मिला शायद उन्हें नहीं मिला.
वह कई बार इस बात को कह चुके थे कि वह भी दादा ध्यानचंद की तरह ख़ूब गोल करने में कामयाब रहे, उन्हीं की तरह तीन स्वर्ण पदक भी जीते और एक ओलंपिक में उन्हीं की तरह टीम के कप्तान भी रहे.
बलबीर सिंह को इस बात की बेहद ख़ुशी थी कि साल 1948 में भारत के जब लंदन ओलंपिक में हॉकी में स्वर्ण पदक जीता तो वह आज़ाद भारत का पहला पदक था. नए देश का तिरंगा और राष्ट्रीय गान, सारी दुनिया का ध्यान जाए, उससे अधिक अच्छा समय कोई नही.
रही बात अशोक कुमार से उनके ख़ास लगाव की तो वह दादा ध्यानचंद के पुत्र होने के कारण तो था ही साथ ही इसका एक कारण और भी था.
साल 1975 में जब भारत ने क्वालालुम्पुर मलेशिया में हुआ तीसरा विश्व कप हॉकी टूर्नामेंट जीता तो उस टीम के मैनेजर और कोच की भूमिका बलबीर सिंह सीनियर ने ही निभाई थी और अशोक कुमार टीम के महत्वपूर्ण खिलाड़ी थे.
तब फ़ाइनल में भारत ने पाकिस्तान को 2-1 से हराया था. विजयी गोल अशोक कुमार ने किया था. यह विश्व कप हॉकी टूर्नामेंट के इतिहास में भारत का इकलौता स्वर्ण पदक है.
मिल्खा सिंह ने ऐसे किया याद
उस विश्व कप से जुड़ी यादों के लेकर बलबीर सिंह सीनियर ने बताया था कि इनमें ख़ुशी भी है और अफ़सोस भी. उन्होंने बताया कि चंडीगढ़ में कैंप लगा था. केडी सिंह बाबू को चीफ़ कोच और उन्हें डायरेक्टर बनाया गया. बाबू नहीं आ सके तो उन्हें ही कोच बना दिया. मुख्य चयनकर्ता हरबक्श नियुक्त हुए वह भी नहीं आ सके तो बलबीर सिंह को ही चयनकर्ता भी बना दिया.
इसके बाद बलबीर सिंह ने जो टीम चुनी वह कमाल की थी. बलबीर सिंह ने कहा कि उन्होंने केवल खेल के आधार पर खिलाड़ियों को मौक़ा दिया. उन्होंने राज्य को चयन से दूर रखा. उन्होंने धर्म को भी बीच में नहीं आने दिया.
अफ़सोस वाली बात यह रही कि कैम्प के दौरान ही पहले सप्ताह में बलबीर सिंह सीनियर के पिता के देहांत हो गया. उनके अंतिम संस्कार के बाद के रस्मों रिवाज़ उन्होंने विश्व कप समाप्त होने के बाद स्वदेश आकर किए. कैम्प के दौरान वह कभी घर नही गए.
बलबीर सिंह को याद करते हुए मशहूर धावक और उडन सिख के नाम से पहचान बनाने बाले मिल्खा सिंह से भी बीबीसी ने ख़ास बातचीत की.
उन्होंने कहा, "बलबीर सिंह सीनियर की मौत का बेहद अफ़सोस है. मिल्खा सिंह ने यह कहा कि साल 1960 में पंजाब में प्रताप सिंह कैरो की सरकार ने बलबीर सिंह, ख़ुद मिल्खा सिंह और मिल्खा सिंह की पत्नी को खेल विभाग में नौकरी दी."
मिल्खा सिंह ने यह भी बताया कि बलबीर सिंह 1964 को टोक्यो ओलंपिक के अलावा कई एशियाई खेल और दूसरे खेलों में भी साथ रहे. मिल्खा सिंह ने कहा कि हॉकी में धयान चंद के बाद अगर दूसरा कोई सबसे बड़ा खिलाड़ी हुआ है तो वह बलबीर सिंह ही रहे. बलबीर सिंह के निधन को बहुत बड़ी क्षति मानते हुए मिल्खा सिंह ने कहा कि आज के खिलाड़ियों को उनसे सबक़ लेना चाहिए कि बिना सुविधाओं के भी कैसे बेहतरीन खिलाड़ी बना जा सकता है.
वैसे बलबीर सिंह जब भी मिले बेहद मिलनसार लगे. उनका व्यवहार बेहद विनम्र था. बलबीर सिंह हमेशा सूट-बूट-टाई में रहते थे. उन्हें इस बात का कतई गुमान नही था कि वह कितने बड़े खिलाड़ी है.
बलबीर सिंह ने दस साल पहले हुई एक मुलाक़ात के दौरान यह भी बताया था कि स्वदेश वापस लौटने पर टीम का ख़ूब स्वागत होता था. जिस शहर में जाते लोग फूलों से भर देते. गले-गले तक फूल भर जाते. कई बार बाहर से जब विदेशी टीमें भारत आती तो बलबीर सिंह को उनका स्थानीय मैनेजर बनाया जाता. एक किस्सा याद करते हुए बलबीर सिंह ने कहा कि एक विदेशी टीम ने पंजाब आकर कहा आपके घर चंडीगढ़ चलेंगे. आपने तीन स्वर्ण पदक जीते है देखे कैसा घर है. आप तो बहुत अमीर होंगे.
लेकिन जब वह घर पहुंचे तो बलबीर सिंह की पत्नी ने फूलों की माला के सूखे घागे के ढेर उन्हें दिखाते हुए कहा कि यह है हमारी अमीरी. बलबीर सिंह ने बताया था कि तब बहुत पैसा नहीं मिलता था लेकिन पैसे का कभी विचार भी नहीं आया.
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