हॉकी विश्वकप: चीन का कोच, जिसने भारत से सीखा 'गुरुमंत्र'

किम सांग राइल, विश्वकप हॉकी

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    • Author, सूर्यांशी पांडेय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

हॉकी विश्वकप में भारत की ख़ुशबू रजकर घुली हुई है और हो भी क्यों ना. विश्वकप खेलने के लिए विश्व की 16 टीमें भुवनेश्वर जो पहुंची हुईं हैं. फ़िलहाल विश्वकप का रोमांच अपने चरम पर है क्योंकि ग्रुप स्टेज के मुक़ाबले ख़त्म और अब आर या पार की लड़ाई शुरू हो चुकी है.

लेकिन इसी रोमांच के बीच हमारी दिलचस्प मुलाक़ात हुई किम सांग राइल से, जो चीनी टीम के कोच हैं. उनसे वैसे तो इस सिलसिले में बात शुरू हुई कि चीन हॉकी में अपना पहला विश्वकप इस साल खेल पाया, तो उसके प्रदर्शन से कितने संतुष्ट हैं कोच साहब लेकिन फिर पता चला कि वह पंजाब के पटियाला से गहरा संबंध रखते हैं.

कोई सोच सकता है कि चीनी टीम को कोच करने वाले, जो वैसे तो कोरियन मूल के हैं और कोरियाई टीम को पहले कोच करते थे, उनका भारत की मिट्टी से कोई नाता हो सकता है!

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भारत से क्यों की हॉकी की पढ़ाई

किम सांग रेयल बताते हैं कि "मैं भारत से पढ़ा हुआ हूं. कोच बनने से पहले मैंने यहां से हॉकी के खेल की पढ़ाई की है."

पंजाब के पटियाला में स्थित नेताजी सुभाष नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ स्पोर्ट्स से किम सांग राइल ने 1986 में हॉकी की पढ़ाई की थी.

उन दिनों कोरिया में हॉकी की बहुत पूछ नहीं थी. गुमनामी झेल रहा यह खेल कोरिया में अपना अस्तित्व तलाश रहा था तो हॉकी में अच्छी शिक्षा की तलाश किम सांग राइल को भारत के पंजाब ले आई.

उन्होंने बताया कि 1986 में एशियन गेम्स के दौरान कोरिया-भारत एक्सचेंज प्रोग्राम के ज़रिए उनको पढ़ाई करने का मौक़ा मिला.

"उन दिनों भारत विश्व की सबसे ताक़तवर टीमों में से एक थी. मुझे भारतीय हॉकी की शैली समझनी थी. मैंने अपने पैसे ख़र्च कर पटियाला में पढ़ने का फ़ैसला किया."

पटियाला के इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्पोर्ट्स में टीचर रहे ओलंपियन बालकिशन सिंह से किम ने शिक्षा ली थी.

कोरिया से ऐसा करने वाले वो पहले व्यक्ति थे. चीन से पहले किम सांग राइल कोरियाई टीम का भी कोच रह चुके हैं.

वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान की मोहताज कोरियाई टीम किम सांग राइल के नेतृत्व में साल 1988 का ओलंपिक खेली थी, जिसमें वो 10वें नंबर पर रही थी. साल 2000 में यह टीम ओलंपिक में कामयाबी के झंडे गाड़ने में सफल रही और सिल्वर मेडर अपने नाम किया.

कोरिया के बाद, चीनी टीम की कमान संभाले उन्हें 10 साल से ज़्यादा हो गए हैं.

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भाषा की दिक़्क़त

पटियाला आना और भाषाई दिक़्क़त का सामना कैसे किया? इस सवाल पर उन्होंने कहा, "यही सबसे बड़ी चुनौती थी. हिंदी मुझे आती नहीं और अंग्रेज़ी में हाथ एकदम तंग था. लेकिन वहां मुझे एक लड़का मिला, दीपक. आप यक़ीन नहीं करेंगीं लेकिन वह रोज़ शाम को मुझे अंग्रेज़ी में पढ़ाता था. वह ख़ुद वहां छात्र था और कमाल का दोस्त था."

तो इस खेल को समझने में पटियाला से पढ़कर उन्हें कितना फ़ायदा हुआ, किम कहते हैं, "हर देश की खेलने की शैली अलग-अलग होती है लेकिन भारत से की हुई पढ़ाई ने खेल के मूलभाव को समझने में मदद की और खेल के पीछे के पीछे के विज्ञान को जाना."

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विश्वकप में कहां खड़ा है चीन?

चीनी टीम को क़रीब 10 साल तक तराशने के बाद, चीन इस साल पहली बार हॉकी विश्वकप के लिए क्वालिफ़ाई कर पाई है और अपना पहला विश्वकप खेलने के लिए भुवनेश्वर आई हुई है.

चीन ने 2006 में दोहा में हुए एशियाड में सिल्वर मेडल जीता था, 1982 और 2009 में एशिया कप में कांस्य पदक हासिल किया था.

लेकिन टीम विश्वकप में वह इस साल अपनी पहचान बनाने उतरी है.

पूल बी(ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, आयरलैंड और चीन) जैसे मुश्किल पूल में होने के बाद भी टीम 30 नवंबर को इंग्लैंड के साथ हुए मैच को ड्रा करने में सक्षम रही.

आयरलैंड के ख़िलाफ़ भी 1-1 से मैच ड्रा किया था लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने 11-0 से चीन को धो डाला था.

अपने पूल में तीसरे स्थान पर क़ाबिज़ चीनी टीम सोमवार को फ्रांस के ख़िलाफ़ खेल के मैदान में उतरी थी, जिसमें उसे हार का सामना करना पड़ा और अब वो विश्वकप के रेस से बहार है.

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