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कॉमनवेल्थ गेम्स में साड़ी नहीं पहनेंगी भारतीय महिला एथलीट्स
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"बात 2004 की है. मैं ख़ुद भारतीय दल में महिला खिलाड़ियों का प्रतिनिधित्व कर रही थी. मैंने साड़ी और उसके ऊपर ब्लेज़र पहना था. भारतीय दल में सबसे आगे होने की वजह से मुझे दोनों हाथों से झंडा भी पकड़ना था. उस वक़्त मुझे थोड़ी दिक्कत ज़रूर हुई थी. हर कदम को आगे बढ़ाते हुए मुझे गिरने का डर लग रहा था."
भारतीय महिला एथलीट अंजू बॉबी जॉर्ज के साथ ये वाकया हुआ 2004 के ओलंपिक में. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने इस घटना का ज़िक्र किया.
भारतीय महिला खिलाड़ियों के इसी तरह के अनुभव को आधार बनाते हुए इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन यानी आईओए ने ये फ़ैसला किया है कि इस बार ऑस्ट्रेलिया में होने जा रहे कॉमनवेल्थ गेम्स में भारतीय महिला एथलीट्स साड़ी नहीं, बल्कि पुरुष एथलीट्स की तरह ट्राउज़र और ब्लेज़र पहनेंगी.
ऑस्ट्रेलिया में कॉमनवेल्थ गेम्स 4 अप्रैल से होने हैं.
'कपड़ों के बारे में सोचने का वक़्त नहीं होता'
आईओए के सचिव राजीव मेहता ने बीबीसी से कहा, "ये फ़ैसला एथलीट कमीशन की सिफ़ारिश के आधार पर लिया गया है. इस कमीशन के सदस्य देश के रिटायर्ड ओलंपियन हैं."
हालांकि एसोसिएशन की बात एक तरफ. जिन खिलाड़ियों को साड़ी से कभी थोड़ी दिक्कत भी आई है, वो इसे सुखद ही मानते हैं.
अंजू ने बताया कि 'खेलों के महाकुंभ में उन्होंने दो बार लहंगा भी पहना था. वो कहती हैं कि दुनिया के सामने देश के लिए मार्च करना अपने आप में ऐसा अनुभव होता है कि पहनावे के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं होता.'
लेकिन इसके साथ ही वो एक बात और जोड़ती हैं, "ओपनिंग और क्लोज़िंग सेरिमनी में साड़ी पहननी हो तो इससे कोई परहेज़ नहीं है, लेकिन मदद करने के लिए कोई हो, ये मैं ज़रूर चाहूंगी."
साड़ी और ट्राउज़र में अंजू की पंसद क्या होगी? इस सवाल के जवाब में हंसते हुए अंजू ने कहा, "आपने मुझे पकड़ ही लिया."
उन्होंने थोड़ा रुककर जवाब दिया, "मैं ट्राउज़र पहनना ही पसंद करूंगी." उनकी बात से साफ़ था, नियम एक तरफ़ है और पसंद दूसरी तरफ़.
'सिर्फ़ साड़ी क्यों, लहंगा क्यों नहीं?'
बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा भी ऐसी ही सोच रखती हैं.
इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के फ़ैसले पर ज्वाला कहतीं है, "मुझे लगता है कि ये फ़ैसला खिलाड़ियों पर छोड़ देना चाहिए या फिर आम राय से भी एक नतीजे पर पहुंचा जा सकता है."
2006 में हुए मेलबर्न कॉमनवेल्थ गेम्स में ज्वाला ने लहंगा पहना था. उस दिन को याद करते हुए ज्वाला कहती हैं, "सिर्फ़ ट्राउजर और साड़ी ही क्यों? लंहगा क्यों नहीं?"
ज्वाला आगे कहतीं है, "मुझे उस दिन भी तैयार होने में 10 मिनट लगा था और साड़ी पहनने में भी 10 मिनट ही लगता है."
साड़ी के बारे में तीरंदाज़ी करने वाली डोला बनर्जी की राय अंजू और ज्वाला से थोड़ी अलग है.
'साड़ी पहनने में दिक्कत क्या है?'
बीबीसी से बातचीत में डोला कहती हैं, "साड़ी पहनने में आपत्ति क्या है? ऐसे किसी आयोजन में साड़ी पहनना ही ज़्यादा बेहतर है. किसी भी ऐसे प्लेटफॉर्म में हम देश का प्रतिनिधित्व करते हैं. वहां हमें देश की संस्कृति और पहनावे को ही दिखाना चाहिए."
कई महिला खिलाड़ियों को साड़ी पहनने में दिक्कत आ सकती है, ऐसे में सभी पर एक फैसला थोपना कितना सही है?
इस पर डोला तपाक से जवाब देती हैं, "साड़ी पहनकर केवल कुछ कदम चलना ही तो होता है. किसी भी खिलाड़ी से साड़ी में उसके खेल को खेलने के लिए नहीं बोला जाता. कुछ मिनटों के लिए ऐसा करने में मुझे नहीं लगता किसी को कोई दिक्कत होनी चाहिए."
कैसे तय होता है ड्रेसकोड?
खेल के इस तरह के किसी भी आयोजन में खिलाड़ियों के दल में एकरूपता लाने के लिए ड्रेस कोड तय किया जाता है.
आम तौर पर इस तरह के खेल समारोह के आयोजन में हिस्सा लेने वाले खिलाड़ियों का नाम तय होने के बाद, खेल से सम्बन्ध रखने वाले एसोसिएशन एक डिज़ाइनर तय करते हैं. उसके बाद खिलाड़ियों को अपना नाप देने को कहा जाता है. लेकिन इसके लिए कोई दर्ज़ी नहीं आता. एक तय फ़ॉर्मैट होता है और उसके हिसाब से ही साइज़ मिलता है.
एक बार डिजाइनर से कपड़े बन कर आने के बाद उसमें बदलाव की जो भी गुंजाइश होती है, वैसे बदलाव कर दिए जाते हैं.
ख़ास बात ये कि पहने गए कपड़े खिलाड़ी हमेशा अपने साथ याद के तौर पर रख सकते हैं.
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