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महेंद्र सिंह धोनी ने महात्मा गांधी से सीखी "उचित असहमति"
- Author, सुनंदन लेले
- पदनाम, खेल पत्रकार
टीम इंडिया के सबसे सफल कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के जीवन में भी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का प्रभाव रहा है. महात्मा गांधी का ज़िक्र होते ही उनकी आंखों के आगे वो व्यक्तित्व आ जाता है जिसने दुनिया को सही बातों के लिए लड़ना सीखाया है.
महात्मा गांधी के विचारों का धोनी जिंदगी में क्या प्रभाव पड़ा और आज के समय में महात्मा गांधी के विचार कितने मायने रखते हैं, इस पर बीबीसी ने उनसे बात की.
धोनी के शब्द
अहिंसा, ईमानदारी, दृढता, निश्चय और लड़ते रहना. मतलब किसी चीज़ में अगर आप विश्वास करते हैं तो उसे पाने की दृढ इच्छा वो महात्मा गांधी जी में थी.
जैसे ही महात्मा गांधी का ज़िक्र होता है, उनके व्यक्तित्व को अगर बताना हो तो ये सभी शब्द तुरंत आपके आंखों के सामने आ जाते हैं.
जो भी करें बहुत लगन से करें
दो चार चीज़ें जिनका अक्सर मैं ज़िक्र किया करता हूं, जिनमें से एक है कि मैं बहुत ज़्यादा अपने वर्तमान पर ध्यान देता हूं.
क्योंकि जो हो चुका है वो मेरे नियंत्रण में नहीं है और जो होने वाला है उस पर मेरा क़ाबू नहीं.
जहां तक वर्तमान का सवाल है यानी कि अभी जो मैं करने वाला हूं उसके ऊपर मेरा 100 फ़ीसदी नियंत्रण है.
मैं जो भी करने वाला हूं पूरा सोच समझ कर और लगन के साथ करूं तो बहुत हद तक नियंत्रण होगा.
"फुल एफर्ट इस फुल विक्ट्री"
आज की दुनिया नतीजा देखती है. अगर छात्र है तो केवल उसके प्राप्त अंक दर्शाए जाते हैं. अगर आपको 90 फ़ीसदी अंक आए तो आप अच्छे स्टूडेंट हैं.
अगर गांधी जी के विचारधारा की बात की जाए कि "फुल एफर्ट इस फुल विक्ट्री" यानी अगर मैं अपनी ओर से सब कुछ कर रहा हूं, मैं पूरी कोशिश कर रहा हूं, मेरी तैयारी अच्छी है, पूरे लगन से काम कर रहा हूं, उसके बाद नतीजा आता है हमें उसे स्वीकार करना चाहिए.
नतीजे से ये नहीं अनुमान निकाला जाना चाहिए कि वो ऐसा है या वैसा है. हमेशा इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि उसने इसके लिए कितनी कोशिश की है.
उचित सलाह ज़रूर लें
टीम परिस्थिति की बात करें तो "उचित असहमति" बहुत महत्वपूर्ण है. टीम सेलेक्शन में अंतिम एकादश में किस कॉम्बिनेशन से खेलें इस पर कई बार कन्फ़्यूज़ हो जाते हैं.
आप सीनियर प्लेयर के पास जाते हैं, जूनियर प्लेयर भी आकर कभी कभी आपको सलाह देते हैं.
बतौर कप्तान मैंने जिन ग्यारह खिलाड़ियों को खिलाने का फ़ैसला किया उस पर दूसरों को सहमत होना ही होगा यह ज़रूरी नहीं है.
अगर मैं कप्तान नहीं हूं और एक खास कंडीशन में कभी मैं महसूस करता हूं कि किसी अमुक खिलाड़ी की जगह दूसरा टीम में रहे टीम का ओवरऑल प्रदर्शन बेहतर हो सकता है तो सलाह देनी चाहिए.
"उचित असहमति" से मेरा यही तात्पर्य है.
किसी बहस की जगह ईमानदार अहसमति से क्रिकेट में या किसी बिज़नेस में इसका बड़ा प्रभाव पड़ सकता है.
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